script70 year old started studying in Durg district | सीखने की ललक ऐसी की 70 की उम्र में अंगूठा लगाना छोड़ हाथों में थामी कलम, दूसरों को भी पढऩे-लिखने कर रहे प्रेरित | Patrika News

सीखने की ललक ऐसी की 70 की उम्र में अंगूठा लगाना छोड़ हाथों में थामी कलम, दूसरों को भी पढऩे-लिखने कर रहे प्रेरित

सरकार के पढऩा-लिखना अभियान (padhna likhna abhiyan) से उन्हें अवसर मिला और कनक यादव न सिर्फ पढ़ लेते है, बल्कि अब अंगूठा न लगाकर हस्ताक्षर भी कर लते हैं।

दुर्ग

Published: November 17, 2021 04:59:34 pm

दुर्ग. ग्राम नंदकटठी के रहने वाले 70 वर्षीय कनक यादव ने अपने सीखने की ललक से एक अलग ही मिसाल कायम की है। पहले ग्रामीण अंचल में शिक्षा का विस्तार इतने बड़े पैमाने पर नहीं हुआ था जिसके चलते कनक यादव शिक्षा से वंचित रह गए थे। लेकिन आने वाली शिक्षित पीढिय़ों को देखकर उनके अंतर्मन में भी पढऩे की ललक थी। सरकार के पढऩा-लिखना अभियान से उन्हें अवसर मिला और कनक यादव न सिर्फ पढ़ लेते है, बल्कि अब अंगूठा न लगाकर हस्ताक्षर भी कर लते हैं। जब पढऩा लिखना अभियान की शुरुआत ग्राम नंदकटठी में हुई तो स्वयं सेवी शिक्षिका दीपाली निषाद उनके घर पहुंची, जहां उन्होंने कनक यादव के सामने पढऩे-लिखने का प्रस्ताव रखा।
सीखने की ललक ऐसी की 70 की उम्र में अंगूठा लगाना छोड़ हाथों में थामी कलम, दूसरों को भी पढऩे-लिखने कर रहे प्रेरित
सीखने की ललक ऐसी की 70 की उम्र में अंगूठा लगाना छोड़ हाथों में थामी कलम, दूसरों को भी पढऩे-लिखने कर रहे प्रेरित
उम्र की दहलीज को देखते हुए असहजता के कारण उन्होंने शुरुआत में पढऩे के लिये मना कर दिया। उनका कहना था कि इस उम्र में पढ़ाई करके मैं क्या करूंगा, लेकिन स्वयं सेवी शिक्षिका दीपाली ने उन्हें बताया कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती, पढने-लिखने के कई फायदे हैं, सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि आप आने वाली पीढिय़ों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलते हैं। कनक यादव अपने पोते-पोतियों को स्कूल जाते हुए देखते थे और यही कारण था कि सीखने की इच्छा उनके मन में कहीं दबी हुई थी। शिक्षिका की समझाइश पर उन्होंने पढऩे के लिए हामी भर दी। यह उनके जीवन का एक अनोखा अनुभव था, जिसे वह पूरी तरीके से जी रहे थे। वह साक्षरता केन्द्र में सबसे पहले पहुंच जाते थे और मन लगाकर पढऩे की कोशिश करते थे। पढऩे की ललक और मेहनत ने आज उन्हें निरक्षर से साक्षर बना दिया।
पहले लगाना पड़ता था अंगूठा
कनक बताते हैं कि पहले बैंक, शासकीय या अशासकीय कार्यों के फॉर्म में उन्हें अपने हस्ताक्षर की जगह अंगूठा लगाना पड़ता था, लेकिन अब उन्होंने हस्ताक्षर करना सीख लिया है। उन्होंने इतना अक्षर ज्ञान अर्जित कर लिया है कि वह पढ़ भी लेते हैं। वह जब पढऩे साक्षरता केन्द्र में जाते हैं तो अपने अनुभव को अन्य असाक्षर साथियों के साथ साझा करते हैं।
पढ़ाई से आया जीवन में उजाला
कनक का कहना हैं कि उनके समय में शिक्षा को लेकर इतनी जागरूकता नहीं थी लेकिन जो अवसर उन्हें बचपन में नहीं मिला आज राज्य शासन की योजना के द्वारा मिल रहा है। कनक यादव आज भी मजदूरी करते हैं लेकिन उम्र के इस पड़ाव में भी राज्य शासन के पढऩा लिखना अभियान ने उनके जीवन में उजाला ला दिया है।
संभालकर रखा आखर झांपी
वो बताते हैं कि आखर झांपी पुस्तक को उन्होंने संभालकर रखा है, यह वह पुस्तक है जिसे वह शाम को पढऩे के लिए ले जाते हैं। वो छोटे-छोटे बच्चों को भी बताते हैं कि मंै पढऩे जाता हूं। कनक ने परीक्षा महा-अभियान में भी पेपर दिया, जिसमें उन्होंने पूरे निर्धारित समय का उपयोग किया।

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