बहुचर्चित अंत्यावसायी घोटाला, 22 साल बाद फैसला, सीइओ व मैनेजर समेत 13 को मिली सजा, पढि़ए क्या है पूरा मामला

बहुचर्चित अंत्यावसायी घोटाला, 22 साल बाद फैसला, सीइओ व मैनेजर समेत 13 को मिली सजा, पढि़ए क्या है पूरा मामला

Dakshi Sahu | Publish: Apr, 17 2019 11:06:18 AM (IST) Durg, Durg, Chhattisgarh, India

जिले का बहुचर्चित अंत्यावसायी घोटला में 22 साल बाद मंगलवार को फैसला सुनाया गया।

दुर्ग. जिले का बहुचर्चित अंत्यावसायी घोटला में 22 साल बाद मंगलवार को फैसला सुनाया गया। न्यायालय ने जिला अंत्यावसायी सहकारी समिति के तत्कालीन सीईओ नीलमचंद गजभिये व दुर्ग-राजनादगांव ग्रामीण बैंक के तत्कलीन मैनेजर किसुन मेश्राम समेत 13 लोगों को दोषी पाकर एक-एक साल कैद की सजा सुनाई।

सजा पाने वाले अन्य दोषी लोगों में अंत्यावसायी विभाग का क्लर्क राजकिशोर तिवारी, फिल्ड ऑफिसर पितांबर राम यादव, भृत्य मानवेन्द्र चक्रवर्ती, लेखापाल शनिराम सुमन, फिल्ड ऑफिसर केएसजी वर्गीस, मोहन अग्रवाल और धोखाधड़ी कर कू टरचित दस्तावेज तैयार करने में सहयोग करने वाले मनोज सोनी, रवि उर्फ शेखर टंडन व सुदेश मराठे शामिल हैं। दोषियों को २-२ हजार रुपए अर्थदंड भी सुनाया गया।

हितग्राहियों का ऋण मंजूर किया
अर्थदंड अदा न करने पर २-२ माह अतिरिक्त कारावास भुगतना पड़ेगी। यह फैसला न्यायाधीश मोहन सिंह कोर्राम के न्यायालय में सुनाया गया। अभियुक्तों ने हितग्राहियों के लिए ऋण के रुप में जारी की गई राशि को फर्जी चि_ी तैयार कर बैंक से आहरित किया था। गड़बड़ी १९ लाख रुपए की थी। जिला अंत्यावसायी सहकारी समिति में 19 लाख घोटाले का खुलासा 1996 में हुआ था। तब बसंत प्रताप सिंह कलेक्टर थे। जिला अंत्यावसायी विभाग ने चिन्हित हितग्राहियों का ऋण मंजूर किया था।

फर्जी तरीके से खता खोल लिया
प्रकरण के आधार पर स्वीकृत ऋण की अनुदान राशि का चेक विभाग ने ऋण देने वाली बैंक को नियमानुसार जारी किया था। बाद में यह गड़बड़ी की गई कि विभाग द्वारा जारी अनुदान राशि के चेक को कूटरचित पत्र लिखकर बैंक से वापस ले लिया गया, फिर सिविक सेंटर भिलाई स्थित यूको बैंक और चंदखुरी स्थित दुर्ग-राजनांदगांव ग्रामीण बैंक में विभाग के नाम पर फर्जी तरीके से खाता खोल लिया गया। उस खाते में वापस ली गई राशि का चैक जमा कर उसे आहरित कर लिया गया।

अमानत में खयानत का अपराध दर्ज किया
तत्कालीन कलेक्टर बीपी सिंह ने मामले की जांच के आदेश दिए थे। बाद में कलेक्टर ने बीच में ही जांच को बंद करने का आदेश दिया। जांच रोकने का मुख्य कारण संभाग आयुक्त द्वारा प्रकरण की जांच के लिए सीआर नवरत्न कमेटी का गठन करना था। नवरत्न कमेटी की जांच के बाद रिपोर्ट के आधार पर सिटी कोतवाली पुलिस ने १४ लोगों के खिलाफ अपराध दर्ज कर न्यायालय में चालान पेश किया था।

कमेटी की जांच रिपोर्ट में मामले का खुलासा करने वाले जिला अंत्यावसायी विकास सहकारी समिति के तत्कालीन सीईओ नीलमचंद गजभिये को भी आरोपी बनाया गया। मामले में उसके खिलाफ भी अमानत में खयानत का अपराध दर्ज किया गया।

सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत किया आवेदन
प्रकरण के आरोपी सीईओ जेसी मेश्राम को हाईकोर्ट ने मामले से उन्मुक्त कर दिया। इसी प्रकरण में एक अन्य आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में भी आवेदन प्रस्तुत किया। आवेदन के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने त्वरित सुनवाई कर निराकरण करने के लिए गाइड लाइन जारी की। इस प्रकरण में खास बात यह है कि 217 से डे टू डे गवाही चल रही थी। केवल न्यायाधीश के अवकाश में रहने और कोर्ट बंद होने की दशा में ही सुनवाई स्थगित रहती थी। न्यायालय की कार्यवाही का विवरण हर रोज हाईकोर्ट को भेजा जाता था।

चेक क्लीयरेंस के लिए आया तब हुआ खुलासा
यह घोटाला जिला अंत्यावसायी सहकारी समिति के तत्कालीन सीईओ जेसी मेश्राम के कार्यकाल में शुरू हुआ था। उनके स्थानांतरण के बाद पदभार संभालने वाले एनसी गजभिए ने मामले को सार्वजनिक किया। दरअसल नेहरु नगर स्थित यूनियन बैंक के अधिकारियों ने यह कहते हुए सीईओ से मुलाकात की थी कि उनके पास 8.83 लाख का ड्राफ्ट क्लीयरेंस के लिए आया है। ड्राफ्ट यूको बैंक से आया है।

अगर विभाग अनुमति दे तो वे अपनी शाखा में खाता खोलने के लिए तैयार हैं। एनसी गजभिए ने यूको बैंक में खाता नहीं खोलने के बाद भी खाता के संचालन पर आश्चर्य व्यक्त किया और जांच शुरू की। दरअसल सीईओ और कलक्टर के फर्जी हस्ताक्षर वाले पत्र से खाता खोलकर अनुदान राशि का चैक संबंधित बैंक से वापस लेकर उसी चैक को फर्जी खाता के माध्यम से आहरण कर विभाग को चूना लगाया जा रहा था।

मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव बीपी सिंह की भी हुई थी गवाह
इस प्रकरण में कुल 138 गवाह थे, लेकिन 101 गवाहों का बयान ही न्यायालय में दर्ज हुआ। आखरी गवाह के रुप में न्यायालय के बुलावे पर 25 मई 2018 को मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव बसंत प्रताप सिंह उपस्थित हुए थे। घोटाला के समय बसंत प्रताप सिंह दुर्ग के कलेक्टर थे। इस मामले में उनकी गवाही चार घंटे से भी अधिक समय तक चली थी।

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