धरोहर:15 वीं सदी के मंदिर, ये शिलालेख चीख रहे सहेज लो मुझे वरना फिर नहीं मिलेंगे निशान

धमधा के शिव मंदिर और तितुरघाट के विष्णु मंदिर के प्राचीन शिलालेख के संरक्षण के लिए सरकार की ओर से अब तक कोई प्रयास नहीं किया गया है।

भिलाई.धमधा विकासखंड के पौराणिक स्थल विलुप्त होने के कगार पर हैं। धमधा के शिव मंदिर और तितुरघाट के विष्णु मंदिर के प्राचीन शिलालेख के संरक्षण के लिए सरकार की ओर से अब तक कोई प्रयास नहीं किया गया है। देखरेख और सुरक्षा के अभाव में शिलालेख तहस नहस हो गए हंै। कई शिलालेख मंदिर परिसर से गायब भी हो गए हैं।
 these inscriptions are saved scream again or else I will
15 सदी की पौराणिक कथा
इस धरोहर के बारे में पौराणिक कथा प्रचलित है कि 1544 वीं शताब्दी में हैहय वंश 36 गढ़ रियासत खैरागढ़ से रतनपुर तक फैली हुई थी। तब हैहय वंश के राजा ने साहड़ा देव तालाब धमधा के बीचो बीच महल बनाया था। तालाब के किनारे में त्रिमूति महामाया (लक्ष्मी, सरस्वती और काली) मंदिर बनवाया। शिवनाथ नदी के किनारे मंदिर निर्माण कर तितुरडीह में चतुर्भुजी विष्णु की प्रतिमा स्थापित करने के प्रमाण हैं। 1790 में नागपुर के मराठा शासक रघुजी भोंसले ने आक्रमण किया।

13 वें शासक को हराया

सेनापति भास्कर पंत ने गोंड़वाना राजघराने के 13वें व अंतिम शासक  दशवंत को हराकर धमधागढ़ को राज को अपने कब्जे में लिया। रघुजी भोसले के पुत्र बिंबाजी ने गोंड़वाना राजघराने के सभी प्राचीन स्मारकों के साथ मंदिर को भी नष्ट कर दिया। इसके बाद से ग्रामीणों ने टूटे मंदिर के गुंबद और प्रतिमा की सुरक्षा के लिए मंदिर बनाया। चतुर्भुजी विष्णु मंदिर आज भी अंचल में आस्था का केंद्र बना हुआ है।

अष्टकोणीय गुबंद
पुरोहित नरसिंह दुबे का कहना है कि छत्तीसगढ़ पुरातत्व विभाग से मंदिर के अष्टकोणीय गुबंद, बलुआ पत्थर पर उकेरी गई नर्तक-नर्तकियों की भाव भंगिमाएं और शिलालेख के आधार पर प्राचीन व संरक्षित स्थल घोषित करने की मांग की थी, लेकिन पुरातत्व वेत्ताओं ने प्राचीन स्मारक मानने से इंकार दिया है। अब गांववाले ही समिति बनाकर प्रतिमा की देखरेख कर रहे हैं। मान्यता के अनुसार हर साल माघ पूर्णिमा पर मेला लगता है। राज्यभर के लोग देखने के लिए पहुंचते हैं। पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना से पहुंच मार्ग बनाया जा रहा है।

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Satya Narayan Shukla Desk/Reporting
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