भिलाई नरबलि कांड: तांत्रिक दंपती की फांसी की सजा उम्र कैद में बदली

रुआबांधा के बहुचर्चित नरबलि मामले में आरोपी तांत्रिक दंपती ईश्वरी यादव एवं किरण बाई की सजा फांसी से उम्रकैद में बदल गई।

By: Satya Narayan Shukla

Published: 30 Nov 2016, 11:52 PM IST

दुर्ग/बिलासपुर. रुआबांधा के बहुचर्चित नरबलि मामले में आरोपी तांत्रिक दंपती ईश्वरी यादव एवं किरण बाई की सजा फांसी से उम्रकैद में बदल गई। बिलसपुर हाईकोर्ट ने दो अन्य आरोपियों महानंद ठेठवार एवं राजेंद्र महार को दोषमुक्त कर दिया। नरबलि का यह दिल दहला देने वाला मामला वर्ष 2010 का है। दो वर्ष पहले इस मामले में जिला न्यायालय
ने आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई थी। आरोपियों ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की थी।

बिलासपुर हाईकोर्ट खंडपीठ का फैसला
बिलासपुर हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और संजय के अग्रवाल की खंडपीठ ने तांत्रिक आरोपी रुआबांधा निवासी किरण उर्फ गुरुमाता 31 साल उसके पति ईश्वरी 38 साल को फांसी की जगह ताउम्र जेल में रखने का फैसला सुनाया है। वहीं हनोदा निवासी महानंद यादव 31 साल व आजद चौक रुआबांधा निवासी राजेन्द्र महार 23 साल को इस मामले से दोषमुक्त कर दिया है। एक वर्ष तक हाईकोर्ट में चले सुनवाई के बाद प्रकरण में बुधवार को फैसला सुनाया गया।

शव घर के आंगन में ही दफना दिया था

खास बात यह है कि रुआंबाधा में नर बली की दो घटना हुई थी। पहली घटना में तांत्रिक दंपती व अन्य आरोपियों ने तंत्र-मंत्र के नाम पर मासूम की बलि ले ली थी। उसका शव घर के आंगन में ही दफना दिया गया था। घटना के बाद जनाक्रोश भड़कने के भय से पुलिस ने मामले में तत्परता दिखाई और सभी आरोपियों को गिरफ्तार किया। दूसरे प्रकरण में फैसला गुरुवार को सुनाए जाने की संभवाना है।

जाने जिला न्यायालय के फैसले को
इस मामले में 25 सिंतबर 2014 को तत्कालीन सत्र न्यायाधीश गौतम चौरडिय़ा ने चार लोगों को फांसी की सजा सुनाई थी। न्यायाधीश ने भौतिक साक्ष्य व डीएनए टेस्ट को आधार बनाया था। प्रकरण में पुलिस ने खुलासा किया था कि घटना के मास्टमाइंड यादव दंपती स्वयं को काली का उपासक मानते थे। दोनों ने बली के बाद धन मिलने का सपना आने की बात कही थी। इस घटना को अंजाम देने के लिए पहले तांत्रिक दंपती ने सह आरोपी बने युवकों को अपना शिष्य बनाया था।

सांई मंदिर के सामने से हुई थी घटना
घटना के समय मासूम अपने माता पिता के साथ साईं मंदिर के सामने कसारीडीह में थी। उसकी मां दुर्गा उसे शौच कराने सड़क किनारे लेकर गई थी। मंदिर वापस पहुंचने पर आरोपियों ने मासूम का अपहरण कर लिया। अपहरण करने के बाद आरोपी सीधे गुरुमाता के घर रुआबांधा पहुंचे थे। जहां तीन दिन बाद मासूमा की बली दी गई।

ऐसे दी थी बलि
पुलिस ने न्यायालय को जानकारी दी थी कि अपहरण के बाद तांत्रिक ने पूजा की। इसके बाद ईश्वरी लाल ने धारदार चाकू से मासूम के दोनों गाल व कानको काटा। फिर जीभ को काटा। इसके बाद ईश्वरी लाल की पत्नी किरण ने उसी चाकू से मासूम का सिर धड़ से अलग कर दिया। बलि देते समय उसके दोनो शिष्य कमरे में ही मौजूद थे। बाद में साक्ष्य छिपाने के उद्देशय से आरोपियों ने तांत्रिक के आवास में ही क्रब खोदकर शव को दफना दिया। खून व घटना स्थल की मिट्टी का मिश्रण कर ताबीज तैयार किया गया।

हुआ था डीएनए टेस्ट
मासूम का शव पुलिस को नहीं मिला था। एसडीएम की उपस्थिति में हुई खुदाई में केवल हड्डी का ढांचा मिला था। ढंाचे के साथ मिले कपड़ों को देख दुर्गा देवार ने उसे  मासूम का कपड़ा होना कहा था, लेकिन न्यायालय में यह बात साबित नहीं हो रहा था कि हड्डी मासूम की ही है। रायपुर फोरेसिंक टेस्ट में उम्र का सही आकलन किया था। इसके बाद न्यायालय की अनुमति से डीएनए टेस्ट कराया गया। मासूम की मां की रक्त को जांच के लिए भेजा गया। रक्त व हड्डी का परीक्षण के बाद स्पष्ट हुआ कि कंकाल मासूम का है।

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Satya Narayan Shukla Desk/Reporting
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