ट्रेन हादसे में पैर कटा, इलाज में झोपड़ी बिकी पर न्याय की थी आस, काले कोर्ट ने थामा हाथ तो बुजुर्ग महिला के सामने झुकना पड़ा रेलवे को

ट्रेन हादसे में पैर कटा, इलाज में झोपड़ी बिकी पर न्याय की थी आस, काले कोर्ट ने थामा हाथ तो बुजुर्ग महिला के सामने झुकना पड़ा रेलवे को

Dakshi Sahu | Publish: Mar, 16 2019 12:00:47 PM (IST) Durg, Durg, Chhattisgarh, India

आखिर आठ साल बाद रेलवे ने इस वृद्ध महिला को 1.60 लाख रुपए का मुआवजा दिया। मया बाई का कहना है कि वह टूट चुकी थी पर भगवान कृष्ण पर भरोसा था।

दुर्ग. कहते हैं मुसीबत में अपनी परछाई भी साथ छोड़ देती है। ऐसा ही कुछ बिन्दा नगर बोरसी निवासी मया बाई के साथ हुआ। ट्रेन दुर्घटना में जब वह अपाहिज हो गई तो एक-एक कर सब साथ छोड़ते गए। इस बीच पति की भी मौत हो गई। उधर इलाज के खर्च में एक छप्पर का घर था वह भी बिक गया। कहीं से मदद की उम्मीद खत्म हो गई। इसके बाद भी मया बाई ने हिम्मत नहीं हारी। संघर्ष जारी रखा।

खत्म हो चुका था समय
आखिर आठ साल बाद रेलवे ने इस वृद्ध महिला को 1.60 लाख रुपए का मुआवजा दिया। मया बाई का कहना है कि वह टूट चुकी थी पर भगवान कृष्ण पर भरोसा था। उसी से हिम्मत मिलती थी। डेढ़ साल पहले अपने घर से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर रहने वाली अधिवक्ता श्यामला चौधरी के पास पहुंची। उसे अपनी समस्या बताई। अधिवक्ता ने उसे यह कहते हुए मना कर दिया कि रेलवे क्लैम्स ट्रिब्यूनल भोपाल में दावा करने का समय खत्म हो चुका है।

सात साल से अधिक समय होने के कारण दावा स्वीकार नहीं होगा। इसके बाद अपाहिज मया बैसाखी के साहरे वापस लौट आई। मयाबाई ने बताया कि पति की मृत्यु कई साल पहले हो चुकी है। वह एक झोपड़ी में रहती थी। मजदूरी कर जीवन यापन कर रही थी। एक्सीडेंट के बाद इलाज के नाम पर उसकी झोपड़ी बिक गई।

इसके बाद उसकी बहन की बेटी ने अपने घर में आश्रय दिया। एक कमरे को रहने को दिया। उम्र के अंतिम पड़ाव में उसकी इच्छा थी कि कही से आर्थिक मदद मिल जाती तो बचे जीवन के लिए वह किसी के सामने हाथ नहीं फैलाएगी। रास्ता निकला और अधिवक्ता से संपर्क करने के बाद उसे मुआवजा मिलने की उम्मीद जागी।

पहले लौटाने के बाद खुद उनसे मिलने गई अधिवक्ता
मया बाई के लौटाने के बाद अधिवक्ता श्यामला से रहा नहीं गया। वह खुद मयाबाई से दो बार मिली और कोई रास्ता निकालने का भरोसा दिलाया। उससे फीस नहीं लेने का भरोसा दिलाया और उसे न्याय दिलवाने में जुट गई। वह महिला के समस्याओं को लेकर कानूनी लड़ाई लड़ती रही। आखिरकार उनका संघर्ष रंग लाया। रेलवे ने मयाबाई को १.६० लाख रुपए मुआवजा दिया। रेलवे बोर्ड के आदेश पर राष्ट्रीयकृत बैंक में राशि जमा है। वह फिक्स राशि की मिलने वाली ब्याज से जीवनयापन कर रही है।

तीन माह लगे दस्तावेज संकलन करने में
अधिवक्ता ने बताया कि वह मयाबाई के प्रकरण के सिलसिले में वह राजनादगांव रेलवे स्टेशन पहुंची। जीआरपी राजनादगांव में अधिकारियों से संपर्क किया। अधिकारियों ने दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने की बात कही। तब श्यामला ने सूचना के अधिकार के तहत आवेदन प्रस्तुत कर घटना का उल्लेख करते हुए रेलवे पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई की सत्यापित प्रति मांगी।

उनका कहना है कि तीन माह बाद वह इस प्रकरण को भूल सी गई थी। इसी बीच राजनादगांव रेलवे पुलिस ने उसके दफ्तर में आकर जानकारी दी कि महिला का प्रकरण बेड टिकट के साथ रिकार्ड रुम में था। वे कलेक्ट कर लें। इसके बाद अधिवक्ता ने मयाबाई को लेकर भोपाल गई और उसी दस्तावेज के आधार पर मुआवजा के लिए प्रकरण प्रस्तुत किया।

टिकट के अलावा कुछ नहीं था
अधिवक्ता श्यमला ने बताया कि महिला के पास केवल डिस्चार्ज टिकट था। दुर्घटना के बाद वह जिला अस्पताल में भर्ती थी। ठीक होने के बाद उसे अस्पताल से छुट्टी दी गई। इसी दौरान दस्तावेज के रुप में महिला को डिस्चार्ज टिकट दिया गया था। इसके अलावा उसके पास कुछ नहीं था।

अधिवक्ता श्यामला ने इस प्रकरण को स्टैंड करने में भोपाल के अधिवक्ता एसके सिंह की मदद ली। उनके प्रयास से ही रेलवे क्लैम्स ट्रिब्यूनल भोपाल बेंच ने परिवाद को स्वीकार किया और रेल दावा अधिकरण भोपाल पीठ के सदस्य डॉ. डीके त्रिपाठी ने प्रतिकर राशि को स्वीकृत किया। सुनवाई में अधिवक्ता श्यामला अपने खर्च पर परिवादी महिला को भोपाल लेकर पहुंची थी।

यह है मामला
कामाख्या-एलटीटी सुपर फास्ट एक्सप्रेस में जनरल टिकट लेकर मयाबाई यात्रा कर रही थी। 25 अक्टूबर 2010 को वह बेलपहाड़ से दुर्ग के लिए ट्रेन में बैठी थी। ट्रेन का स्टापेज दुर्ग में नहीं होने के कारण ट्रेन आगे निकल गई। वह दरवाजे के पास खड़ी थी। ट्रेन मुढ़ीपार स्टेशन पहुंची और स्पीड कम हो गई। ट्रेन की रफ्तार लगभग 20 किलोमीटर प्रतिघंटा थी। कुछ यात्री मुढ़ीपार स्टेशन में उतरे। इसी बीच यात्रियों की आपाधापी में मया बाई नीचे गिर गई और उसका पैर ट्रेन के पहिए में आ गया। महिला का आधा पंजा कट चुका है। डॉक्टरों ने 40 प्रतिशत विकलांगता निर्धारित किया है।

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