रात के अंधेरे में शिव जी पूजा करने आते हैं अश्‍वत्थामा, जानें मंदिर से जुड़ी 10 रोचक बातें

रात के अंधेरे में शिव जी पूजा करने आते हैं अश्‍वत्थामा, जानें मंदिर से जुड़ी 10 रोचक बातें

Soma Roy | Publish: Jul, 26 2019 12:22:30 PM (IST) | Updated: Jul, 26 2019 12:23:06 PM (IST) दस का दम

  • khereshwar temple secrets : कानपुर के खेरेश्वर धाम मंदिर में शिव पूजन का है विशेष महत्व
  • 200 साल पुराना है यह मंदिर, जमीन से निकले थे शिवलिंग

नई दिल्ली। अश्‍वत्थामा ने महाभारत में छल से पांडवों के पुत्र की हत्या कर दी थी। तभी भगवान श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को श्राप दिया वह धरती पर तब तक पीड़ा झेलते हुए जीवित रहेगा, जब तक स्वयं महादेव उसे पापों से मुक्ति न दिलाएं। तभी कानपुर के एक मंदिर में अश्‍वत्थामा रात के अंधेरे में शिव जी की पूजा करने आते हैं। तो कौन-सा है ये मंदिर और क्या है इससे जुड़ी खास बातें आइए जानते हैं।

1.पौराणिक कथाओं के अनुसार अश्‍वत्थामा को इस दुनिया के अंत तक इस धरती पर मौजूद रहने का ईश्वर से आदेश मिला है। चूंकि शिव को आदि और अंत का प्रतीक माना जाता है। इसलिए अश्‍वत्थामा खुद शिव जी की पूजा करते हैं।

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2.बताया जाता है कि उत्तर प्रदेश के कानपुर के शिवराजपुर जगह में शिव जी का यह मंदिर स्थित है। इसका नाम खेरेश्वर धाम मंदिर है। माना जाता है कि अश्‍वत्थामा यहां खुद भगवान भोलेनाथ की पूजा करते हैं।

3.अश्वत्थामा रात के अंधेरे में चुपके से आकर भगवान शंकर की पूजा करते हैं। वे उन्हें फूल-माला चढ़ाने के अलावा मंत्र का जाप करते हैं। तभी सुबह मंदिर के कपाट खोलने पर चीजें बिखरी हुईं मिलती हैं।

4.मंदिर के पुजारी और स्थानीय लोगों के मुताबिक इस अद्भुत घटना को देखने की आज तक किसी में हिम्मत नहीं हुई। जिस किसी ने भी ईश्वर को चुनौती देनी चाही उसे अपनी आंखों की रौशनी गंवानी पड़ी।

5.बताया जाता है कि रात के अंधेरे में इस मंदिर में कुछ अजीब घटनाएं होती है। अचानक से घंटियां बजने लगती हैं। धूप-दीप की महक आती है आदि। ऐसे में जब भी पुजारी या किसी और ने इस बात का सच जानने की कोशिश की। उसे अपनी दृष्टि गंवानी पड़ी है।

kkhereshwar mandir

6.मंदिर के पुजारी के मुताबिक अश्‍वत्थामा को भोलेनाथ का पूजन करते देखना आम बात नहीं है। इस अद्भुत दृश्य को देखने की क्षमता व्यक्ति में नहीं होती है।

7.मंदिर के बारे में हैरान करने वाली एक बात यह भी कि सुबह कपाट खोलने पर मुख्य शिवलिंग अभिषेक हो चुका होता है। उन पर ताजे पुष्प चढ़े हुए होते हैं।

8.यह मंदिर काफी प्राचीन है लगभग 200 साल पुराना है। कहा जाता है द्वापर युग में गुरु द्रोणाचार्य की कुटी यही हुआ करती थी। अश्‍वत्थामा का जन्म यही पर हुआ था। इसीलिए वे यहां पूजा करने आते हैं।

9.मंदिर में स्थापित शिवलिंग की उत्पत्ति जमीन से हुई है। बताया जाता है कि मंदिर के आस-पास पहले जब भी कोई गाय गुजरती थी तब वो अपने थन से शिवलिंग पर दूध चढ़ाती थी। बाद में जमीन की खुदाई में शिवलिंग की प्राप्ति हुई।

10.मान्यता है कि जो भी भक्त इस मंदिर में दर्शन के लिए आता है। उसके सभी कष्ट दूर होते हैं। सावन में मंदिर में विशेष पूजा की व्यवस्था की जाती है।

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