नीति आयोग के उपाध्यक्ष का बड़ा बयान इस वजह के चलते आसान नही पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाना

नीति आयोग के उपाध्यक्ष का बड़ा बयान इस वजह के चलते आसान नही पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाना

Ashutosh Kumar Verma | Updated: 26 Jun 2018, 09:37:51 AM (IST) अर्थव्‍यवस्‍था

नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने अपने एक बयान में कहा है कि पेट्रोल-डीजल पर जीएसटी लगाना अव्यवहारिक है।

नर्इ दिल्ली। काफी लंबे समय से ये बहस चल रही है की पेट्रोलियम पदार्थ को आखिर क्यो जीएसटी के दायरे में नही लाया जा रहा है । कई बार इसे लेकर कई बड़े नेताओं ने कहा है की सरकार अपनी पूरी कोशिश में लगी हुई है । लेकिन पेट्रोलियम पदार्थ को जीएसटी में लाने के बारे में नीति आयोग के उपाध्यक्ष ने कुछ दिनों पहले एक बड़ा बयान देते हुए कहा था की पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाना बहुत मुश्किल है क्योकि केंद्र और राज्य सरकारे पेट्रोल-डीजल पर कुल 90 फीसदी टैक्स लगाती है ।


राज्यों के लिए टैक्स में कटौती करना आसान नहीं

समाचार एजेंसी आर्इएएनएस को दिए गए एक इंटरव्यू में कुमार ने कहा, ये समझना मुश्किल है कि अाखिर कैसे कोर्इ राज्य अपने टैक्स में इतनी बड़ी कटौती करने के लिए तैयार होगा क्योंकि जीएसटी के अंतर्गत जो सबसे अधिक टैक्स की व्यवस्था है वो 28 फीसदी है। इसके लिए एक नए जीएसटी स्लैब को तैयार करना होगा जो कि अपने आप में एक बड़ा कदम होगा। हालांकि उन्होंने पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने के आइडिया से सहमति जतार्इ। उन्होंने आगे कहा कि जो लोग इसकी बात कर रहे हैं वो इस समस्या के बारे में नहीं सोचे होंगे।


केन्द्र व राज्य तेल से मिलने वाले टैक्स पर कम बनें निर्भर

'मैने पहले भी कर्इ बार कहा है कि इसके लिए सबसे बेहतर ये होगा कि पहले हम पेट्रोलियम पदार्थों पर लगने वाले टैक्स को धीरे-धीरे कम करें। सभी राज्य तेल पर मूल्यानुसार टैक्स लगाते हैं अौर जब तेल के दाम में बढ़ोतरी होती है तो उनकी अच्छी कमार्इ होती है। इसको तर्कपूर्ण करना होगा आैर खासकर राज्यों को अपने टैक्स में कटौती करनी चाहिए।' कुमार ने कहा कि राज्य आैर केन्द्र, दोनों को तेल पर लगाए जाने वाले टैक्स पर निर्भरता कम करनी चाहिए।

 

तेल पर लगने वाले टैक्स को कम करना होगा

उनके अनुसार, मौजूदा समय में केन्द्र सरकार तेल पर टैक्स से 2.5 लाख करोड़ रुपए जुटाती है जिसमें से करीब दो लाख करोड़ रुपए राज्यों को जाते हैं। आखिर वो इसकी भरपार्इ कहां से करेंगे? एेसे में यदि तेल पर लगने वाले टैक्स को धीरे-धीरे कम किया जाए तो अर्थव्यवस्था पर इसका बोझ कम होगा। तेल पर लगने वाला उच्च दाम देश की अर्थव्यवस्था पर टैक्स लगाने जैसा है। यदि तेल के दामों में कमी की जाती है तो इससे अर्थव्यवस्था में भी सुधार होगा। यदि इसे एक बार पूरा कर लिया जाए आैर दूसरे जगहों से राजस्व में बढ़ोतरी होने लगेगी जिसके बाद अर्थव्यवस्था की रफ्तार में भी तेजी आएगी। तब तेल के दाम को जीएसटी के दायरे में लाया जा सकता है। ये इतना आसान नहीं है।


मंत्री से लेकर भाजपा अध्यक्ष तक भी जाता चुके हैं सहमति

अापको बता दें कि पिछले साल 1 जुलार्इ को नर्इ टैक्स व्यवस्था के लागू करने के बाद से ही पेट्राेल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने को लेकर बहस चल रही है। कर्इ वरिष्ठ अधिकारी आैर मंत्री भी इससे सहमति जता चुके हैं। हालांकि विपक्षी पार्टियाें का इस पर अलग-अलग राय रहा है। पिछले साल दिसंबर में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने राज्य सभा कहा था कि सरकार पेट्रोलियम पदार्थाें को जीएसटी के दायरे में लाने के लिए तैयार है लेकिन इसके लिए सबसे पहले राज्यों से सहमति लेनी होगी। अभी अप्रैल माह में ही जब पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हो रही थी तब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह मुंबर्इ में एक रैली के दौरान कहा था कि पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने की तैयारी चल रही है।

Show More
खबरें और लेख पढ़ने का आपका अनुभव बेहतर हो और आप तक आपकी पसंद का कंटेंट पहुंचे , यह सुनिश्चित करने के लिए हम अपनी वेबसाइट में कूकीज (Cookies) का इस्तेमाल करते हैं। हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति (Privacy Policy ) और कूकीज नीति (Cookies Policy ) से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned