भरोसे का प्रतीक

जो बीज में होता है, वही पेड़ में प्रकट होता है। फूलों एवं फलों में प्रकट होता है। बीज बोने और फल आने में एक काल चाहिए। प्रतीक्षा के लिए धैर्य और पालन-पोषण के लिए परिश्रम और स्नेह चाहिए, प्रार्थना चाहिए।

By: Gulab Kothari

Published: 07 Mar 2020, 11:21 AM IST

- गुलाब कोठारी

प्रिय पाठको...

जो बीज में होता है, वही पेड़ में प्रकट होता है। फूलों एवं फलों में प्रकट होता है। बीज बोने और फल आने में एक काल चाहिए। प्रतीक्षा के लिए धैर्य और पालन-पोषण के लिए परिश्रम और स्नेह चाहिए, प्रार्थना चाहिए। और सब कुछ आत्मभाव से चाहिए। शरीर से श्रम, मन से स्नेह तथा आत्मा से प्रार्थना। फल मूलत: प्रार्थना के रस से मीठा होता है। भोक्ता को सुख प्रदान करता है।

राजस्थान पत्रिका का बीजारोपण स्वंतत्र, स्वस्थ और निर्भीक पत्रकारिता के संकल्प के साथ हुआ। संकल्प को ही मन का बीज कहते हैं। पत्रिका का विस्तार इसी स्वप्न का, पाठकों के प्रति निष्ठा का विस्तार ही कहा जाएगा। श्रद्धेय बाबू सा. (कर्पूर चंद्र कुलिश) के इस वृक्ष ने समय-समय पर मीठे फल ही दिए हैं। आंधी-तूफान और ओलावृष्टि तक सहे हैं। आज भी सह रहा है, आगे भी अडिग़ खड़ा रहेगा। जो बढ़ता जाए, वही ब्रह्म है।

स्नेह का कार्य जोडऩा है। पत्रिका ने जोड़ा है। प्रदेशवासियों को माटी से जोड़ा है, प्रवासी राजस्थानियों को जोड़ा है। इससे भी आगे बढक़र प्रदेशों को जोड़ा है, उत्तर को दक्षिण से जोड़ा है। पाठकों को विकास के साथ-साथ संस्कृति से जोड़ा है। एक ओर जीवन को सचाई और विश्वास से जोड़ा है, तो दूसरी ओर सामाजिक कार्यों के माध्यम से सेवा और श्रमदान से जोड़ा है। राष्ट्रीय योजनाओं, अपराध-निवारण अभियानों एवं लोकतंत्र में भागीदारी से जोड़ा है। संवाद सेतु के जरिए जहां गांव-शहरों को आपस में जोडक़र उनकी समस्याओं को मजबूती से समाधान के लिए सरकार के सामने रखा वहीं दिशा बोध के माध्यम से देश के नौजवानों को सही दिशा देने का मजबूत प्रयास किया। टीवी और डिजीटल भी इसमें जुड़े। पाठक-श्रोता-दर्शक समय-समय पर यही हमें लौटाते भी रहे हैं।

पत्रिका आज एक परिवार रूप संहित वृक्ष बन गया है। हर पत्ते का जड़ से जीवन भर का नाता हो गया है। श्रद्धेय बाबूसा. का परिवार का सपना, यानी कि नि:स्वार्थ भाव से एक-दूसरे के लिए कर्म करना था। फल समाज को पहुंचेंगे। अत: पाठक सदा सर्वोपरि रहा।

देश का मीडिया जहां आज लोकतंत्र का चौथा पाया बन गया है, पत्रिका आज भी लोकतंत्र के प्रहरी के रूप में काम कर रहा है। सरकारों के साथ भागीदारी पत्रिका का लक्ष्य नहीं है, न ही होगा। जनता और सरकारों के मध्य सेतु है, सेतु ही रहेगा। पाया बनने में संघर्ष नहीं है। सेतु बनने में संघर्ष है। लेकिन पत्रकारिता के मूल्यों और जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए हमें स्वीकार्य है। जैसे काले कानून का संघर्ष। हमारा श्रम पाठक की आराधना है। प्रात: पाठक द्वारा पत्रिका की प्रतीक्षा करना, प्रात: पठन करना इसका सुखद फल है। ईश्वर इस डोर को, इस ग्रन्थिबन्धन को सदा-सदा दृढ़ और पवित्र बनाए रखे। जिस सम्मान के साथ पिछले छह दशक गुजरे हैं, आगे और भी स्नेह गहरा होता रहे। नमस्कार!

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