Kerala Assembly Elections 2021 : खाली हाथ भाजपा को प्रवेश द्वार से आस, सहानुभूति के भरोसे कांग्रेस

Kerala Assembly Elections 2021 : दक्षिण में उत्तर भारत जैसा मुकाबला, पीएम मोदी की रैली से पहले कार्यकर्ताओं ने कन्याकुमारी में कुछ इस तरह से तैयारी की।

By: सुनील शर्मा

Published: 05 Apr 2021, 07:40 AM IST

- राजेन्द्र गहरवार

Kerala Assembly Elections 2021 : कोच्चि। दक्षिण में भारत की धरती का आखिरी छोर कन्याकुमारी एक बार फिर भाजपा और कांग्रेस के बीच जंगी चुनावी मुकाबले का मैदान बन गया है। कांग्रेस सांसद वसंतकुमार के निधन से खाली हुई लोकसभा सीट पर कांग्रेस ने सहानुभूति को भुनाने के लिए उनके बेटे विजय वसंत को मैदान में उतारा है तो तमिलनाडु में भाजपा को इसी सीट से प्रवेश दिलाने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री पी राधाकृष्णन फिर किस्मत आजमाने उतरे हैं। दोनों ही द्रविड़ पार्टियों के अपने खेमों के किनारे में खड़े होने के कारण उत्तर भारत जैसी चुनावी लड़ाई हो गई है। यही स्थिति कन्याकुमारी जिले की 6 विधानसभा सीटों की भी है जिनके लिए 6 अप्रेल को वोट डाले जाएंगे।

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कन्याकुमारी तीन समुद्रों हिंद महासागर, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर का मिलन बिंदु है। तीनों पानी के रंग से अपनी पहचान छोड़ते हैं। ऐसे ही यहां के चुनावी समीकरण भी हैं। एक छोर पर नडार क्रिश्चियन तो दूसरे पर नडार हिंदू हैं। तीसरा छोर मछुआरों का है और यहां की राजनीति इन्हीं ध्रुवों से तय होती है पर सबसे अधिक असर मिशनरी और चर्च का है। इन्हें साधने के लिए भाजपा और कांग्रेस भर ही नहीं बल्कि द्रविड़ पार्टियां भी जोर लगा रही हैं। तमिलनाडु की राजनीति में खाली हाथ भाजपा को दो बार मौका कन्याकुमारी लोकसभा सीट से ही मिला। पहली बार 1999 और फिर 2014 में पी. राधाकृष्णन यहां से संसद पहुंचे और केंद्र में मंत्री भी बने। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर भी उनकी नैया पार नहीं लगा पाई थी। कांग्रेस के वसंतकुमार भारी बहुमत से जीते थे पर उपचुनाव में हालात बदले हुए हैं। सामाजिक आंदोलन से जुड़े बर्लिन कहते हैं कि वोटरों के ध्रुवीकरण की वैसी कोशिश नहीं हो रही है इसलिए कोई बड़ी हलचल नहीं हो रही है। भाजपा नडार हिंदुओं को एकजुट करने के लिए बस्तियों में अभियान चला रही है। लेकिन पहले जैसी आक्रामकता नहीं है।

भाजपा के लिए गले की फांस बना कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट
चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट प्रोजेक्ट का है। सीधे मछुआरों से मामला जुड़ा होने के कारण यह भाजपा के लिए गले की फांस बन गया है। इसके खिलाफ आंदोलन चलाने वाले इफरेम कहते हैं कि पोर्ट के निर्माण से मछुआरों की आजीविका पर संकट आने वाला है। इसे लेकर मछुआरे भी एकजुट हैं। उनका मानना है कि विस्थापन के साथ उनके मछली मारने के लिए बाधा खड़ी होगी। इस मुद्दे के चुनावी असर का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और भाजपा के घटक एआइएडीएमके के नेता पलानीसामी हाल ही में चुनावी रैली में सफाई देते हुए वादा कर चुके हैं कि कंटेनर पोर्ट का निर्माण नहीं कराया जाएगा। उन्होंने तो यहां तक आरोप लगाया कि डीएमके और कांग्रेस झूठ बोलकर लोगों में भ्रम पैदा कर रही है।

कांग्रेस के सामने भी चुनौती कम नहीं
सहानुभूति पाने के लिए कांग्रेस ने दिवंगत सांसद वसंतकुमार के फिल्म अभिनेता बेटे को मैदान में उतारने का दांव उल्टा पड़ता दिखाई दे रहा है। अनुराव बताते हैं कि इस बार कांग्रेस से टिकट की दावेदारी नडार क्रिश्चियन कम्युनिटी के एक प्रभावशाली नेता की थी। लेकिन ध्रुवीकरण के डर से कांग्रेस ने कदम पीछे खींच लिए, इससे क्रिश्चियन कम्युनिटी में नाराजगी है। वहीं, मछुआरा समुदाय से किसी को भी विधानसभा का टिकट डीएमके की ओर से नहीं दिए जाने से उसकी भी नाराजगी झेलनी पड़ रही है। जबकि यह दोनों समुदाय डीएमके-कांग्रेस गठबंधन का कोर वोट बैंक है।

पहली बार कम्युनिस्ट दल चुनाव से बाहर
कन्याकुमारी के इतिहास में पहली बार कम्युनिस्ट दल चुनाव से बाहर हैं। माकपा और भाकपा इस बार डीएमके-कांग्रेस गठबंधन का हिस्सा हैं, समझौते में उन्हें कन्याकुमारी जिले में कोई सीट नहीं मिली लिहाजा उनका कोई भी प्रत्याशी चुनाव मैदान में नहीं है। हालांकि कम्युनिस्ट काडर भारी मन से गठबंधन के लिए काम करने की बात कह रहा है। मार्क्सवादी लेनिनवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने जरूर प्रत्याशी उतारे हैं।

भाजपा के गांधी के चर्चे
दोनों गठबंधन डीएमके और एआइएडीएमके ने आपस में बराबर सीटें बांटी हैं। जिले की 6 विधानसभा सीटों में से 3-3 पर इनके प्रत्याशी मैदान में तो उनके सहयोगी दल कांग्रेस और भाजपा के भी तीन-तीन उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं परन्तु सबसे अधिक चर्चा में भाजपा के प्रत्याशी एमआर गांधी हैं। इसकी वजह गांधी उपनाम होना है। वे जनसंघ के जमाने से जुड़े हुए हैं और पार्टी के पदाधिकारी भी रहे हैं।

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सुनील शर्मा
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