Kerala Assembly Elections 2021 : वार - ना पलटवार, पोस्टरों में सिमटा प्रचार

Kerala Assembly Elections 2021 : चुनाव सिर पर होने के बावजूद राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता घर बैठे हुए हैं। ऐसे में चुनावी फिजां क्या होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। न तो यहां चुनावी सभाएं हो रही हैं, न नारेबाजी और न ही जनसम्पर्क।

By: सुनील शर्मा

Published: 03 Apr 2021, 09:49 AM IST

- हरेन्द्रसिंह बगवाड़ा

Kerala Assembly Elections 2021 : कोच्ची। नारियल की धरती याने केरल को कोरोना ने बुरी तरह से झकझोर रखा है। करीब एक साल से पर्यटकों की रौनक गायब है। गर्म मसालों की महक फीकी पड़ी हुई है। नारियल और केले की फसल के दाम जमीन पर हैं। और तो और चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार बजाय चुनाव मैदान के बिस्तर में पड़े रहने को मजबूर हैं। देश के दूसरे राज्यों में कोरोना का कहर कुछ समय के लिए थमा था लेकिन केरल में लगातार हाल बेहाल हैं। मतदान में तीन दिन का समय बचा है लेकिन हाल ये है कि राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता भी बीमार हैं। सत्ता कब्जाने की होड़ में जुटने वाले दोनों मोर्चों के कार्यकर्ता सहमे - सहमे से हैं। चिंता इस बात की भी है कि कोरोना का कहर कहीं मतदान प्रतिशत को प्रभावित न कर दे।

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गुरुवार को मैं यूडीएफ के टिकट पर चुनाव लड़ रहे टोनी चेमम्डी से मिलने पहुंचा। पता लगा कि वो कोरोना पॉजिटिव हैं। मुझे आश्चर्य तब हुआ जब किसी ने बताया कि कलाईसेरी से एलडीएफ के उम्मीदवार पी राजीव समेत कई नेता कोरोनाग्रस्त होने के कारण जनता के बीच नहीं आ रहे। स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में देशभर में एक नम्बर पर माने जाने वाले केरल के ज्यादातर अस्पताल कोरोना सेन्टरों में तब्दील हो चुके हैं। हालांकि यहां बेहतर चिकित्सा सेवाओं के कारण कोरोना से होने वाली मौतों की संख्या बहुत कम हैं। कोरोना की दूसरी लहर के कारण भी लोग भयभीत हैं। यही कारण है कि चुनाव सिर पर होने के बावजूद राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता घर बैठे हुए हैं। ऐसे में चुनावी फिजां क्या होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। न तो यहां चुनावी सभाएं हो रही हैं, न नारेबाजी और न ही जनसम्पर्क। बस इलाकों में पोस्टर लगे हैं और इक्का-दुक्की गाडिय़ां घूमती दिखी जिससे यह आभास होता है कि यहां छह अप्रेल को वोटिंग होगी। वैसे भी केरल के मतदाताओं के बारे में कहा जाता है कि वे पढ़े लिखे होते हैं और चुनावी भीड़ से दूरी बना कर रखते हैं। अब बात करते हैं केरल की राजनीति की। यहां मुख्य मुकाबला सत्ताधारी एलडीएफ और कांग्रेस, मुस्लिम लीग समेत अन्य दलों के गठबन्धन यूडीएफ के बीच है। सत्तारुढ़ एलडीएफ वामपंथी गठबंधन है। सीपीआई और सीपीएम इसके मुख्य घटक हैं।

वैसे केरल में पिछले कई वर्षों का चलन देखा जाए तो यहां एक बार कांग्रेस और दूसरी दफा वामपंथियों के बीच सत्ता का आना -जाना लगा रहता है। लेकिन इस बार यह सिलसिला टूटता सा लग रहा है। एलडीएफ फिर से सत्ता पर काबिज होती लग रही है। एलडीएफ की कमान वर्तमान मुख्यमंत्री पी विजयन के हाथों में सुरक्षित लग रही है। जनता का मानना है कि विजयन पुरानी पीढ़ी के मजबूत नेताओं में से हैं जो केरल को सही दिशा में ले जा रहे हैं। केरल में जहां भाजपा अपना अस्तित्व तलाश रही है, वहीं कांग्रेस बिखरी हुई है। कांग्रेस का एक धड़ा जिसे मणि कांग्रेस कहा जाता है, वह एलडीएफ के साथ मिल कर चुनाव लड़ रहा है। शबरीमाला, लवजिहाद, आर्थिक परेशानियां, भ्रष्टाचार जैसे कई मुद्दे हैं, लेकिन कोरोना के नीचे ये सब बुरी तरह से दबे हुए हैं।

महिला मतदाता मौन
आमतौर पर राजनीति में सक्रिय रहने वाली यहां की महिलाओं पर भी कोरोना महामारी का असर दिखाई दे रहा है। चुनावी चर्चा छेड़ने पर अधिकांश का जवाब, "देखेंगे" में ही मिलता है। पिछले विधानसभा चुनाव में पुरुषों के मुकाबले यहां महिलाओं का मतदान ढ़ाई फीसदी अधिक रहा था।

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