scriptKnow these mafia of Purvanchal who became honorable | Uttar Pradesh Assembly Elections 2022: जानें पूर्वांचल के इन माफिया को जो बन गए माननीय, मोदी लहर में भी हासिल की जीत | Patrika News

Uttar Pradesh Assembly Elections 2022: जानें पूर्वांचल के इन माफिया को जो बन गए माननीय, मोदी लहर में भी हासिल की जीत

Uttar Pradesh Assembly Elections 2022: पूर्वांचल की राजनीति की बात करें तो तकरीबन तीन-चार दशक से माफिया का जबरदस्त वर्चस्व है। माफिया से माननीय बनने वालों का सिलसिला जारी है। हालांकि पिछले पांच सालों में योगी आदित्यनाथ सरकार ने इन माफिया के खिलाफ सख्त कार्रवाई की है। लेकिन ये वो माफिया हैं जिन्होंने 2017 के विधानसभा चुनाव में मोदी लहर में भी जीत हासिल की, तो जानते हैं इन बाहुबली नेताओं के बारे में...

वाराणसी

Updated: December 24, 2021 01:05:27 pm

पत्रिका न्यूज नेटवर्क

वाराणसी. Uttar Pradesh Assembly Elections 2022: यूपी की सियासत, पूर्वांचल के बगैर पूरी नहीं हो सकती। लेकिन इस पूर्वांचल में माफिया से माननीय बने दबंगों के वर्चस्व की कहानी कुछ अलग ही है। इसमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने मोदी लहर में भी अपना परचम लहराया। यूं कहें कि सियासत में कदम रखने के बाद से ये अब तक अजेय माने जाते रहे हैं। हालांकि योगी आदित्यनाथ के पांच साल के कार्यकाल में पूर्वांचल के माफिया नेताओं पर जबरदस्त कार्रवाई हुई। अब बदले हुए राजनीतिक परिवेश में इन माफिया से माननीय बनने वाले दबंग नेताओं पर सबकी नजर टिकी है, तो जानते हैं यूपी की राजनीति के इन नेताओं की जो माफिया से माननीय बने और 2017 तक अजेय रहे।
मोख्तार अंसारी और विजय मिश्र
मोख्तार अंसारी और विजय मिश्र
माफिया से माननीय बने मोख्तार जिसने मोदी लहर में भी विजय पताका फहराई

माफिया से माननीय बनने वालों में सबसे पहले जिसका नाम लिया जाएगा वो हैं मऊ के विधायक मोख्तार अंसारी। करीब डेढ दशक से जेल में बंद मोख्तार की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो वो गाजीपुर के प्रतिष्ठित परिवार से ताल्लुक रखते हैं। मोख़्तार अंसारी के दादा डॉक्टर मुख़्तार अहमद अंसारी स्वतंत्रता सेनानी थे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी के आंदोलन से जुड़े और 1926-27 में कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। वहीं मोख़्तार के नाना ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को 1947 की लड़ाई में शहादत के लिए महावीर चक्र से नवाज़ा जा चुका है। मोख्तार के पिता सुभानउल्ला अंसारी गाजीपुर में अपनी साफ सुधरी छवि वाली राजनीति के लिए जाने जाते रहे। इतना ही नहीं देश के उपराष्ट्रपति रहे हामिद अंसारी से भी मोख्तार के बेहद करीबी रिश्ते हैं। दोनों रिश्ते में चाचा-भतीजा लगते हैं।
पहली बार बसपा के टिकट पर 1996 में विधायक बने

लेकिन खुद मोख्तार की पहचान बाहुबली नेताओं में होती है। 1996 में बसपा के टिकट पर पहली बार चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचने वाले मोख्तार ने 2002, 2007, 2012 और 2017 में भी मऊ विधानसभा सीट से जीत हासिल की। खास ये कि 2007 से 2017 के बीच के तीन चुनाव उन्होंने जेल में रहते हुए जीते। सियासी कवच ने मोख्तार को जरायम की दुनिया का खास चेहरा बना दिया। मोख्तार अंसारी का नाम 2002 में अपराध जगत से जुड़ा। लेकिन वह चर्चा में आए 2004 में जब लाइट मशीन गन (एलएमजी) केस में उनका नाम आया। फिर 2005 में भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की हत्याकांड में उन्हें आरोपी बनाया गया।
लेकिन पिछले पांच साल में यूपी की सियासत ने नई करवट ली है और सीएम योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल में लगातार मोख्तार और उनके परिवार तथा संपर्कियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई चल रही है। विधायक और उनके परिवार ही नहीं बल्कि उनके गुर्गों को भी सबक सिखाया जा रहा है। दे दना दन बुल्डोजर चल रहा। बावजूद इसके 2022 के विधानसभा चुनाव को लेकर मोख्तार अंसारी का नाम फिर से चर्चा में हैं। देखना दिलचस्प होगा कि मोदी लहर में जीत का परचम लहराने वाले मोख्तार पर योगी सरकार की कार्रवाई का कितना असर पड़ेगा।
मोख्तार पर लगे आरोप

1-22 जनवरी 1997-वाराणसी के भेलूपुर इलाके में पूर्वांचल के सबसे बड़े कोयला व्यापारी और विश्व हिंदू परिषद के कोषाध्यक्ष नंदकिशोर रुंगटा हत्याकांड। मोख्तार बरी

2-22 जनवरी 1997-वाराणसी के भेलूपुर इलाके में पूर्वांचल के सबसे बड़े कोयला व्यापारी और विश्व हिंदू परिषद के कोषाध्यक्ष नंदकिशोर रुंगटा हत्याकांड हुआ. इसमें भी बरी
3-29 नवंबर 2005 बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय की हत्याकांड। मामले की जांच सीबीआई से हुई, लेकिन 7 शवो से 67 गोलियां और मौके से 400 से ज्यादा खोखे बरामद होने के बावजूद कोई दोषी नहीं मिला और मुख्तार अंसारी बरी हो गया।
4-2003 में लखनऊ के जेलर एसके अवस्थी संग जेल में मारपीट गाली-गलौज और पिस्तौल तानने के मामले में आलमबाग थाने में एफआईआर हुई। लेकिन मुख्तार अंसारी बरी हो गय।

5- 1999 में डीआईजी जेल एसपी सिंह पुंडीर ने लखनऊ के कृष्णानगर कोतवाली में मुख्तार अंसारी पर धमकी देने का केस। इसमें भी बरी।
6- जिस मुख्तार अंसारी पर कभी 46 मुकदमे दर्ज थे, आज उस पर 10 मुकदमे रह गए हैं। फिर भी मोख्तार की मुश्किलें खत्म हो नहीं हुई है। इन 10 मुकदमों में गाजीपुर के 5, वाराणसी के 2, आजमगढ़ का 1 और 2 केस मऊ के हैं। इन मुकदमों में चार गैंगस्टर से जुड़े मामले हैं जिसमें तीन गैंगस्टर के मामले गाजीपुर से एक मामला मऊ का है।
7- 3 अगस्त 1991, वाराणसी के चेतगंज में कांग्रेस के पूर्व विधायक अजय राय के भाई अवधेश राय हत्याकांड में मोख्तार की मुश्किलें बड़ी हैं। अजय राय की तरफ से मुख्तार अंसारी, भीम सिंह, कमलेश, अब्दुल कलाम को नामजद किया गया है। राय खुद वादी हैं। खुद ही पैरवी कर रहे हैं। गवाही पूरी हो चुकी है। कार्रवाई अंतिम दौर में है।
8-2009 मऊ का तिहरा हत्याकांड, जिसमें जिले के सबसे बड़े ठेकेदार अजय प्रकाश सिंह उर्फ मुन्ना सिंह को बाइक सवार बदमाशों ने एके-47 से छलनी कर मौत के घाट उतार दिया था। मुन्ना सिंह हत्याकांड के चश्मदीद गवाह उसके मुनीम और गनर सतीश की भी साल भर के भीतर ही गोली मारकर हत्या कर दी गई। मुन्ना सिंह हत्याकांड के बाद हुए इस दोहरे हत्याकांड में मामला ट्रायल पर है और मुख्तार अंसारी पर अदालत का निर्णय आना शेष है।
विजय मिश्र पर हैं 71आपराधिक मामले

विजय मिश्र ने तीस साल पहले भदोही से कांग्रेस ब्लॉक प्रमुख के रूप में राजनीतिक सफर शुरू किया। वह ज्ञानपुर सीट से समाजवादी पार्टी के टिकट पर 2002, 2007 और 2012 में विधानसभा चुनाव चुनाव में फतह हासिल की।
लेकिन पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने 2017 के चुनाव से पहले ही विजय को 'बाहुबली मानते हुए और जनता के बीच अपनी साफ-सुथरी दिखाने के लिए उनका टिकट काट दिया। लेकिन विजय भी कहां चुप बैठने वालों में से थे। उन्होंने निषाद पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा और अपने रसूख को कायम रखते हुएर मोदी लहर में भी चुनाव जीते।
बताते हैं कि विजय मिश्र के राजनीतिक गुरु पंडित कमलापति त्रिपाठी रहे। पंडित त्रिपाठी ही रहे जिन्होंने विजय मिश्र को राजनीतिक सफर शुरू करने की राय दी। उन्होंने ही टिकट दिलवाया। उसका ही परिणाम रहा कि 1990 आते-आते वो ब्लाक प्रमुख बन गए। वैसे कांग्रेस से विजय मिश्र के अच्छे ताल्लुकात रहे। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी तक उनकी पहुंच रही। लेकिन राजीव गांधी की हत्या के बाद 2009 में वो मुलायम सिंह के संपर्क में आए और समाजवादी बन गए।
2010 में बसपा सरकार में नंद कुमार नंदी पर हुए जानलेवा हमले में सबसे पहले विजय मिश्र का नाम आया। उस हमले में दो लोग मारे गए थे। इस मामले में 2012 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले विजय ने कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया। लेककिन जेल में रहते हुए सपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत भी गए।
विजय मिश्रा के खिलाफ 71आपराधिक मामले चल रहे हैं।

सबसे लोकप्रिय

शानदार खबरें

Newsletters

epatrikaGet the daily edition

Follow Us

epatrikaepatrikaepatrikaepatrikaepatrika

Download Partika Apps

epatrikaepatrika

बड़ी खबरें

Copyright © 2021 Patrika Group. All Rights Reserved.