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Uttar Pradesh Assembly Elections 2022: ...तो क्या सूबे की सुरक्षित सीटें तय करेंगी कौन होगा यूपी का शहंशाह

यूपी में हैं 86 सुरक्षित सीटें, पिछले तीन चुनाव परिणाम बताते हैं कि ये दलित जिधर गए सरकार उसकी बनी। ऐसे में अबकी सभी दल दलित वोटबैंक पर गड़ाए हैं नजरें। देखना रोचक होगा कि अंतिम तौर पर ये दलित किस पाले में जाते हैं। तो जानते हैं, कहां क्या चल रहा...

वाराणसी

Published: January 25, 2022 03:11:01 pm

वाराणसी. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 अब धीरे--धीरे अपने शबाब पर पहुंचने लगा है। डिजिटली प्रचार संग अब निर्वाचन आयोग की गाइडलाइन के तहत 10-10 की टोली में फिजिकल प्रचार भी शुरू हो गया है। अब राजनीतिक पंडित चुनाव की गतिविधियों पर नजरें गड़ाए बैठे है। खास तौर पर जिस तरह से समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने गैर यादव पिछड़ी जाति के वोटबैंक में सेंधमारी के लिए जातीय क्षत्रपों को अपने पाले में किया है, उसके बाद अब दलित वोटबैंक पर सभी की नजरें गड़ी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इस बार दलित वोटबैंक कहीं ज्यादा निर्णायक साबित हो सकता है। इसके पीछे उनका तर्क पिछले तीन चुनाव परिणाम भी हैं। उनका तो यहां तक कहना है कि सूबे की 86 सुरक्षित सीटें सत्ता सिंहासन पर कौन बैठेगा इसमें अहम् भूमिका निभा सकती हैं।
Uttar Pradesh Assembly Elections
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लंबे समय से बसपा का रहा कैडर वोटबैंक
दलित लंबे समय से बसपा का वोटबैंक रहा है दलित। कांशीराम ने दलित उद्धार और दलितों को मुख्यधारा में लाने के उद्देश्य से ही बहुजन समाज पार्टी का गठन किया। इसी वोटबैंक पर अब तक मायावती सूबे की सियासत में अपना परचम लहराती रहीं हैं। हालांकि बसपा के अस्तित्व में आने के पहले ये वोटबैंक कांग्रेस के सिरमाथे पर सत्ता की कुंजी सौंपता रहा है। लेकिन पिछले 2012 के बाद से दलित वोटबैंक मायावती के हाथ से खिसकता चला गया। लेकिन ये दलित अब भी सत्ता हासिल करने की प्रमुख कुंजी है।
दलित वोटबैंक पर सबकी निगाह
दलित वोटबैंक पर सभी सियासी दलों की निगाह है। एक तरफ जहां मायावती अपने दरकते वोटबैंक को सहेजने में जुटी हैं तो वहीं अखिलेश की निगाह भी इन्हीं पर है। वहीं बीजेपी और कांग्रेस भी इसी तिकड़म में है कि किस तरह से वोटबैंक को अपने पाले में किया जाए। इस बीच ओवैसी और चंद्रशेखर ने भी मायावती के वोटबैंक माने जाने वाले इस वर्ग में सेंधमारी के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। ओवैसी ने तो जय भीम-जय मीम का नारा तक दे दिया है। वो मुस्लिम-दलित कार्ड खेलने की तैयारी में हैं। वहीं चंद्रशेखर मायवती को अपना सीनियर मानने के साथ ही उनके वोटबैंक पर पूरी तरह से काबिज होने की रणनीति के तहत काम कर रहे हैं। ये काम उन्होंने 2019 के आम चुनाव से ही शुरू कर दिया था।
सपा की रणनीति
इस अति महत्वपूर्ण दलित वोटबैंक को साधने के लिए समाजवादी पार्टी ने पूरी ताकत झोंक दी है। पार्टी के दलित नेताओं ने वर्चुअल रैली शुरू कर दी है। पार्टी अध्यक्ष अखिलेश लगातार आरक्षण को लेकर भाजपा पर हमलावर हैं। वो बार-बार कहते हैं कि भाजपा आरक्षण समाप्त करने की साजिश रच रही है। दलित वोटबैंक साधने के लिए उन्होंने भीम आर्मी पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर को भी जोड़ने की कोशिश की लेकिन बात नहीं बनी तो उन्होंने पूर्व सांसद सावित्री बाई फुले को चेहरा बना कर आगे कर दिया है। सावित्रि बाई फुले सपा गठबंधन के साथ हैं। उनका आक्रामक तेवर दिखने भी लगा है।
चंद्रशेखर की नीति
वहीं चंद्रशेखर की सपा से बात नहीं बनी तो वो एकला चलो की राह पर निकल लिए। वो बीजेपी, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस को निशाने पर लिए हैं। ये दीगर है कि वो अक्सर ये भी कहते रहते हैं कि उनकी लड़ाई बीजेपी से है। इसी कड़ी में उन्होंने गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ के खिलाफ चुनाव लड़ने का ऐलान कर बीजेपी को सोचने पर मजबूर तो कर ही दिया है।
भाजपा को अपने काम पर ज्यादा भरोसा
वहीं भाजपा की बात करें तो उसे अपने काम पर ज्यादा भरोसा है। मसलन गांवों में पट्टे पर अपनी गृहस्थी चलाने वालों को न उजाड़ना, राजधानी लखनऊ में डॉ अम्बेडकर के भव्य स्मारक का निर्माण, महर्षि बाल्मीकि जयंती पर विविध आयोजन, चित्रकूट में वाल्मीकि आश्रम जीर्णोद्धार, यूपी अनुसूचित जाति-जाति जनजाति आयोग को मजबूती, दलितों को त्वरित न्याय जैसे कामों की बदौलत उसे पूरा भरोसा है कि दलित उनके ही पाले में आएंगे। वहीं आउट सोर्सिंग व ठेके की नौकरियों में दलितों को आरक्षण न मिलना, लंबित प्रोन्नति में आरक्षण, सूबे के आरक्षित पदों पर समयबद्ध भर्ती न होना जैसे मसले हैं जो भाजपा के लिए चुनौती पेश कर सकते हैं।
सुरक्षित सीटों की गणित
बता दें कि यूपी में कुल 86 सुरक्षित सीटें हैं। इन सुरक्षित सीटों पर दलितों के अलावा इतर आधार वोटबैंक वाली पार्टी का मिलन बड़ा गुल खिलाने में कामयाब होता रहा है। वो चाहे मुस्लिम हो या ब्राह्मण या अन्य कोई बड़ा वोटबैंक। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि जो भी इस सुरक्षित सीटों को साध लिया उसकी सरकार बननी तय है।
कब किसने दलित वोटबैंक के सहारे बनाई सरकार
चुनावी आंकड़े बताते हैं कि सबसे पहले 2007 में मायावती ने अपनी सोशल इंजीनियरिंग को मजबूत कर अपने परंपरागत दलित वोटबैंक के साथ मिलाते हुए सत्ता हासिल की। उस वक्त बसपा ने 61 सुरक्षित सीटों पर कब्जा किया नतीजा सबके सामने है। तब बसपा की सोशल इंजीनियरिंग ही रही कि उसे 30.43 फीसद वोट मिले। ठीक उसी तर्ज पर 2012 में सपा चली और 58 सुरक्षित सीटों पर कब्जा कर सत्ता का सिंहासन हासिल कर लिया। फिर पूर्व के चुनावों के जीत के समीकरण को साधते हुए भाजपा ने 2017 में 69 सुरक्षित सीटों पर फतह हासिल कर पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली।
अब देखना है दलित वोटबैंक 2022 में क्या गुल खिलाता है
बता दें कि जिस दलित वोटबैंक को यूपी की सियासत में बसपा का परंपरागत वोटबैंक माना जाता रहा है उसमें 2012 सेंधमारी शुरू हो गई। अगर ये कहें कि बसपा का ये वोटबैंक धीरे-धीरे दरकता गया। उदारहण स्वरूप 2007 का बसपा की जीत का 30.43 फीसद वोट शेयर, 2012 में 25.9 फीसद तक रह गया। वहीं 2017 में ये घट कर महज 23 फीसद पर आ गिरा। नतीजा 2017 में बसपा को मात्र 19 सीट से संतोष करना पड़ा। ऐसे में राजनीतिक पंडितों का कहना है कि इस बार भी इस दलित वोटबैंक को जिसने ठीक से साध लिया वो ही मीर साबित होगा।

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