दुनिया को हंसाने वाले चार्ली चैपलिन से क्यों नाराज हुआ अमरीका, घर वापसी पर लगा दी थी रोक, जानें ऐसे ही किस्से

By: पवन राणा
| Published: 18 Apr 2020, 09:37 PM IST
दुनिया को हंसाने वाले चार्ली चैपलिन से क्यों नाराज हुआ अमरीका, घर वापसी पर लगा दी थी रोक, जानें ऐसे ही किस्से
दुनिया को हंसाने वाले चार्ली चैपलिन से क्यों नाराज हुआ अमरीका, घर वापसी पर लगा दी थी रोक, जानें ऐसे ही किस्से

जयंती पर याद आए कॉमेडी किंग चार्ली चैपलिन, करुणा से उठते कहकहे

-दिनेश ठाकुर
कोरोना काल में कहकहों के शहंशाह चार्ली चैपलिन की 131वीं जयंती गुरुवार को चुपचाप गुजर गई। लता मंगेशकर समेत कुछ हस्तियों ने उन्हें ट्विटर पर याद किया। संकट के दौर से गुजर रही दुनिया के लिए चार्ली चैपलिन का जीवन-दर्शन उस ऊंची मीनार की तरह है, जो रोशनी और हौसले का पता देती है। अपनी आत्मकथा में उन्होंने एक जगह लिखा है- 'यह जानने के लिए मुझे कोई किताब नहीं पढऩी पड़ी कि कॉमेडी का जन्म करुणा से होता है।' यानी कहकहों की फसल दर्द की जमीन पर लहलहाती है। इंसान आंसू पीकर हंसना और दूसरों को हंसाना सीखता है। जिंदगी में गुजर-बसर जितनी सहज होगी, फन में उतनी सहजता होगी।

चार्ली चैपलिन को यह सबक बेहद अभावों से गुजरे बचपन ने सिखा दिया था। शराबी पति से परेशान उनकी मां गुजर-बसर के लिए एक छोटी थिएटर कंपनी में बतौर गायिका काम करती थीं। एक बार गाते हुए उनका गला बैठ गया तो दर्शक अंडे-टमाटर फेंककर हो-हल्ला मचाने लगे। हालात संभालने के लिए थिएटर के मैनेजर ने पांच साल के चार्ली को स्टेज पर उतार दिया। मासूम चार्ली ने डरते-डरते उस दौर का मशहूर 'जैक जॉन्स' गाना शुरू किया। गाने की शुरुआती पंक्तियां सुनते ही दर्शक खुशी से उछल पड़े और उन्होंने स्टेज पर सिक्कों की बौछार कर दी। चार्ली ने गाना रोका, दर्शकों से मुखातिब हुए- 'माफ कीजिए, बाकी गाना बाद में.. पहले मैं यह सिक्के बटोर लूं।' यह सब इतनी सहजता से कहा और किया गया कि दर्शकों ने तालियां बजाते हुए फिर सिक्कों की बारिश कर दी। इस घटना के बाद चार्ली चैपलिन ने पीछे मुड़कर नहीं देखा, रास्ते खुलते गए और कहकहों का कारवां बनता गया।

मूक सिनेमा के दौर में शुरू हुआ लाजवाब कॉमेडी फिल्मों का सिलसिला सिनेमा को जुबान मिलने के बाद और मुखर, प्रखर होता गया। उनकी 'गोल्डरश', द किड, ए वुमैन ऑफ पेरिस, द किड, सिटी लाइट्स, मॉडर्न टाइम्स, द ग्रेट डिक्टेटर, लाइमलाइट, सर्कस, 'ए किंग इन न्यूयॉर्क' और 'ए काउंटेस फ्रॉम हांगकांग' जैसी फिल्मों ने दुनिया को हंसते-हंसते रोने और रोते-रोते हंसने के आदाब सिखाए। चार्ली चैपलिन उम्र में अपने से चार दिन छोटे एडॉल्फ हिटलर की तानाशाही के धुर विरोधी रहे।

अपनी सियासी कॉमेडी 'द ग्रेट डिक्टेटर' (1940) में उन्होंने हिटलर की नीतियों पर मजाक-मजाक में जो कोड़े बरसाए, उससे वे दुनियाभर की कई बड़ी हस्तियों में भी लोकप्रिय हो गए। इनमें महात्मा गांधी, आइंस्टाइन, चर्चिल, जॉर्ज बर्नाड शॉ और जवाहर लाल नेहरू शामिल थे। जब भारत में स्वाधीनता संग्राम चल रहा था, लंदन में महात्मा गांधी के साथ ऐतिहासिक मुलाकात में चैपलिन ने कहा था- 'मैं गांधी की फौलादी इच्छाशक्ति का आदर करता हूं। मुझे भारत की आजादी की आकांक्षा के प्रति सहानुभूति है।' लेकिन 'द ग्रेट डिटेक्टर' को लेकर अमरीका की भृकुटियां तन गईं और चार्ली चैपलिन को वामपंथी करार दिया गया। उन्हीं दिनों वे यूरोप दौरे पर गए तो उनकी अमरीका वापसी पर रोक लगा दी गई। नतीजतन उन्हें स्विट्जरलैंड में बसना पड़ा और वहीं 88 साल की उम्र में उन्होंने आखिरी सांस ली। फिल्मों की तरह उनकी आत्मकथा भी जीवन-दर्शन का नायाब दस्तावेज है, जिसके ढेरों जुमले मंत्र की तरह उच्चारे जा सकते हैं। मसलन कहीं वे कहते हैं- 'हंसी के बगैर गुजारे गए दिन का मतलब है दिन बर्बाद किया गया' तो कहीं उनका मत है- 'इस दुनिया में कुछ भी स्थाई नहीं है, आपकी परेशानियां भी नहीं।'