International Literacy Day : साक्षरता के महत्व पर भारी पड़ती पेट की भूख

International Literacy Day : साक्षरता के महत्व पर भारी पड़ती पेट की भूख

Anoop Kumar | Publish: Sep, 08 2018 03:38:57 PM (IST) Faizabad, Uttar Pradesh, India

जब तक रोटी की जरूरत शिक्षा के महत्व पर भारी पड़ेगी तब तक अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस जैसे दिन इन मासूम बच्चों के लिए सिर्फ एक दिन बनकर आते और जाते रहेंगे

फैजाबाद : अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस International Literacy Day के मौके पर पूरे देश ही नहीं पूरी दुनिया में विविध प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं , जिनके माध्यम से साक्षरता के प्रति आम जनमानस को जागरुक करने का प्रयास किया जा रहा है | शिक्षा हर व्यक्ति का मूलभूत अधिकार है ,समाज में अशिक्षित होना एक बहुत बड़े अभिशाप की तरह है |बावजूद इसके आज भी हमारे बीच ही समाज में निम्न वर्ग का एक ऐसा तबका भी है जो चाहे मजबूरियों की वजह से और यह अज्ञानता की वजह से आज भी शिक्षा के महत्व को नहीं समझ पा रहा है और अपने मासूम बच्चों को जिस उम्र में स्कूल भेजना चाहिए उस उम्र में रोजगार काम धंधे पर लगाकर उनसे मेहनत मजदूरी करवा रहा है | अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस के मौके पर हमारी टीम ने फैजाबाद अयोध्या शहर की सड़कों पर जब नजर डाली तो देखा कि सड़क पर ऑटो रिक्शा चलाने वाले पान की दुकान चलाने वाले सब्जी बेचने वाले और फल बेचने वालों के अलावा भीख मांगने वालों बच्चों की भी एक अच्छी खासी तादात है | जो स्कूल के बारे में कुछ जानते ही नहीं और स्कूल जाने की जगह मेहनत मजदूरी कर पैसे कमा रहे हैं |

जब तक रोटी की जरूरत शिक्षा के महत्व पर भारी पड़ेगी तब तक अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस जैसे दिन इन मासूम बच्चों के लिए सिर्फ एक दिन बनकर आते और जाते रहेंगे

कैमरे के सामने यह बच्चे कुछ भी बोलने से कतराते रहे लेकिन ठेले पर फल बेच रहे राजू ने बताया कि उसके परिवार में पिता नहीं है दो बहने और मां है जिसके कारण उसे मेहनत मजदूरी करनी पड़ती है | कुछ ऐसी ही कहानी संतोष की भी है पिता बीमार है मां है नहीं दो भाई और एक बड़ी बहन की परवरिश की जिम्मेदारी उसके कंधों पर है इसलिए पान बेच रहा है | वही नाबालिग होने के बावजूद ऑटो रिक्शा चला रहे सुरेश ने बताया कि अगर स्कूल जाकर वह पढ़ाई करेगा तो भूखे पेट सोना पड़ेगा | पढ़ाई के लिए भी पैसे की जरूरत है जो उसके पास है नहीं इसलिए ऑटो रिक्शा चलाता है खुद नहीं पढ़ सकता लेकिन अपने भाई-बहनों को पढ़ा रहा है | यह समाज की वह तस्वीर है जो सरकारों के सर्व शिक्षा अभियान को मुंह चिढ़ा रही हैं | अब यह मजबूरी ही है जिसके चलते यह बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे और अपना और अपने परिवार का पेट पालने के लिए मेहनत मजदूरी कर रहे हैं | जब तक रोटी की जरूरत शिक्षा के महत्व पर भारी पड़ेगी तब तक अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस जैसे दिन इन मासूम बच्चों के लिए सिर्फ एक दिन बनकर आते और जाते रहेंगे |

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