बसंत पंचमी 2021(माघ शुक्ल पंचमी) आज : जानें पूजा का शुभ मुहुर्त और कैसे करें पूजा

रवि योग और अमृत सिद्धि योग का खास संयोग...

By: दीपेश तिवारी

Updated: 16 Feb 2021, 11:25 AM IST

आज माघ मास की शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि को यानि 16 फरवरी 2021, मंगलवार के दिन उत्तर भारत के कई राज्यों में आज बसंत पंचमी का त्योहार मनाया जा रहा है। इस दिन लोग खासकर छात्र-छात्रा विद्या की देवी सरस्वती की आराधना करते हैं। बच्चों की शिक्षा प्रारंभ करने या किसी नई कला की शुरुआत के लिए इस दिन को काफी शुभ माना जाता है। श्रद्धालु इस दिन पीले, बसंती या सफेद वस्त्र धारण करते हैं और विद्या की देवी का पूजन करते हैं। यह मां सरस्वती की पूजा का पर्व माना जाता है। मान्यता के अनुसार इस दिन देवी सरस्वती प्रकट हुई थीं, इसलिए इसे श्री पंचमी भी कहते हैं।

वसंत पंचमी को वागीश्वरी जयन्ती के रूप में भी मनाया जाता है। वागीश्वरी देवी सरस्वती का ही एक अन्य नाम है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी इसे देवी सरस्वती के प्राकट्य दिवस बताया गया है। ऋषि-मुनियों और देवताओं ने वेदों की ऋचाओं से देवी सरस्वती की स्तुति की थी। देवी सरस्वती माघ महीने की पंचमी तिथि पर प्रकट हुई थीं. उन्हीं के साथ सृष्टि में संगीत, विद्या और ज्ञान भी आया। देवी सरस्वती ने संसार में आनंद की भावना भर दी।

इस बार बसंत पंचमी के मौके पर रवि योग और अमृत सिद्धि योग का खास संयोग बन रहा है। वहीं पूरे दिन रवि योग रहने के कारण इसका महत्व और बढ़ गया है। सुबह 6 बजकर 59 मिनट से दोपहर 12 बजकर 35 मिनट तक पूजा का शुभ मुहूर्त है, जानकारों के अनुसार इस मुहुर्त में पूजा करने से अधिक लाभ की प्राप्ति होगी। वहीं इस साल बसंत पंचमी यानि आज के दिन चतुष्ग्रही योग बन रहा है। इस दिन बुध, गुरु, शुक्र व शनि चार ग्रह शनि की राशि मकर में चतुष्ग्रही योग बना रहे हैं। आज मंगलवार है और मंगल अपनी स्वराशि मेष में विराजमान रहेंगे।

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बसंत पंचमी: ऋतुराज बसंत के आगमन की सूचना...
यह पर्व वास्तव में ऋतुराज बसंत के आगमन की सूचना देता है। बसंत को ऋतुओं का राजा माना जाता है। वैसे बसंत ऋतु के अंतर्गत चैत्र और वैशाख के माह भी आते हैं, फिर भी माघ शुक्ल पंचमी को ही यह उत्सव मनाया जाता है।

भगवान श्रीकृष्ण इस उत्सव के अधिदेवता माने जाते है। इसलिए ब्रज क्षेत्र में आज के दिन राधा और कृष्ण के आनंद—विनोद की लीलाएं बड़ी धूमधाम से मनाई जाती हैं। इस दिन से ही होरी तथा धमार गीत शुरु किए जाते हैं।
बसंत ऋतु में प्रकृति का सौंदर्य निखर उठता है। लोग प्रसन्नचित्त होकर नाच उठते हैं। पक्षियों के ककलरव , भौरों का गुंजन औश्र पुष्पों की मादकता से युक्त वातावरण बसंत ऋतु की अपनी विशेषता है।

बसंत पंचमी के समय बौराए आमों पर मधुर गुंजार और कोयल- मूक मुखरित होने लगती है। गुलाब, मालती में फूल खिल जाते हैं। खेतों में सरसों के फूल की स्वर्णमयी कांति और चारों ओर पृथ्वी की हरियाली मन में उल्लास भरने लगती है। वृक्षों में नई नई कोपलें फूटने लगती हैं। और बाग—बगीचों में अपूर्व लावण्य छिटकने लगता है।

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जानकारों के अनुसार बसंत ऋतु कामोद्दीपक होती है, इसके प्रमुख देवता काम तथा रति है। बसंत कामदेव का सहचर है इसलिए इस दिन कामदेव और रति की पूजा करके उनकी प्रसन्नता प्राप्त करनी चाहिए।

इस दिन भगवान विष्णु के पूजन का विशेष महत्व है। इस दिन सुबह तेल उबटन लगाकर स्नान करना चाहिए और पवित्र वस्त्र धारण करके भगवान नारायण का विधिपूर्वक पूजन करना चाहिए। इसके बाद पितृ तर्पण और ब्रह्मभोज का विधान है।

इस दिन मंदिरों में भगवान की प्रतिमा का बसंती वस्त्रों और पुष्पों से श्र्ृंगार किया जाता है और गाने बजाने के साथ बड़ा उत्सव मनाया जाता है। वहीं उत्तर प्रदेश में इस दिन से फाग उड़ाना शुरू कर देते है।जिसक क्रम फाल्गुन की पूर्णिमा तक चलता है।

बसंत पंचमी के दिन किसान अपने खेतों से नया अन्न लाकर उसमें गुढ़-घी मिलाकर उेसे अग्नि, पितरों और देवों को अर्पित करते है और नया अन्न खाते हैं।

इसके साथ ही इस दिन वाणी की अधिष्ठात्री देवी माता सरस्वती के पूजन का भी विशेष महत्व है। सरस्वती पूजन के लिए एक दिन पूर्व से ही नियमपूर्वक रहें, फिर दूसरे दिन नित्यकर्मों से निवृत्त होकर विधिपूर्वक कलश की स्थापना करके गणेश, सूर्य विष्णु और शंकर की पूजा करके बाद में सरस्वती पूजन करना चाहिए।

मधु—माधव शब्द मधु से बनें हैं और 'मधु' का तात्पर्य है एक विशिष्ट रस जो जड़—चेतन को उन्मत्त करता है। जिस ऋतु से उस रस की उत्पत्ति होती है, उसे 'बसंत ऋतु' कहते हैं।
इस प्रकार बसंत पंचमी वह सामाजिक त्यौहार है जो हमारे आनंद के अतिरेक का प्रतीक है। सभी भारतीय इस पर्व को बड़े ही हर्षोल्लास से मनाते हैं।

बसंत पंचमी की कथा...
कहा जाता है कि भगवान विष्णु की आज्ञा से प्रजापति ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना करके जब उसे देखा तो चारों ओर सुनसान और निर्जन ही दिखाई दिया। उदासी से सारा वातावरण मूक सा हो गया था। जैसे किसी की वाणी ही न हो।

यह देख ब्रह्माजी ने उदासी और मलीनता को दूर करने के लिए अपने कमंडल से जल छिड़का उन जलकणों के पड़ते ही वृक्षों से एक शक्ति उत्पन्न हुई, जो दोनों हाथों से वीणा बजा रही थी और दो हाथें में क्रमश: पुस्तक और माला धारण किए हुए थी। ब्रह्माजी ने उस देवी से वीणा बजाकर संसार की मूकता और उदसी दूर करने को कहा।

तब उस देवी ने वीणा के मधुर नाद से सब जीवों को वाणी प्रदान की, इसलिए उस देवी को सरस्वती कहा गया। यह देवी विद्या-बुुद्धि को देने वाली है, अत: इस दिन देवी सरस्वती की पूजा की जाती है।

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दीपेश तिवारी
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