Devshayani ekadashi 2019 : इस विधि से श्री हरी की पूजा और व्रत, जानें शुभ मुहूर्त और व्रत कथा

Devshayani ekadashi 2019 : इस विधि से श्री हरी की पूजा और व्रत, जानें शुभ मुहूर्त और व्रत कथा

Tanvi Sharma | Publish: Jul, 10 2019 01:17:02 PM (IST) त्यौहार

चार माह तक विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन सहीत कई शुभ कार्यों पर लग जाएगी रोक

12 जुलाई को देवशयनी एकादशी है। इस दिन सभी लोग भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा अर्चना करते हैं। मान्यताओं के अनुसार इस एकादशी ( ekadashi ) से भगवान विष्णु निद्रा में चले जाते हैं, इसी कारण इसे देवशयनी या हरिशयनी ( hari shayani ekadashi ) कहा जाता है। इसी के साथ हिंदू धर्म में इस एकादशी से सभी मांगलिक कार्य बंद हो जाते हैं। चार माह तक विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन सहीत कई शुभ कार्यों पर रोक लग जाती है। देवशयनी एकादशी ( devshayani ekadashi 2019 ) से लेकर अगले चार महीने देवउठनी या देवप्रबोधनी एकादशी तक भगवान निद्रा में चले जाते हैं।

देवशयनी एकादशी पर शुभ मुहूर्त:

हरिशयनी एकादशी 11 जुलाई 2019 की रात 3:08 से 12 जुलाई रात 1:55 मिनट तक रहेगी। वहीं प्रदोष काल शाम साढ़े 5 से साढ़े 7 बजे तक रहेगा।

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देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु की इस विधि से करें पूजा

पदम् पुराण के अनुसार देवशयनी एकादशी के दिन कमललोचन भगवान विष्णु का कमल के फूलों से पूजन करने से तीनों लोकों के देवताओं का पूजन हो जाता है। इसलिए इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में भगवान की खास पूजा की जाती है। देवशयनी एकादशी के दिन उपवास करके भगवान विष्णु की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान करवाएं। इसके पश्चात् पीत वस्त्रों व पीले दुपट्टे से सजाकर श्री हरि की आरती उतारनी चाहिए।

भगवान को पान-सुपारी अर्पित करने के बाद यह स्तुति करें-

'सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत सुप्तं भवेदिदम।
विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत सर्वं चराचरम।'

स्वर्गलोक की होती है प्राप्ति

देवशयनी एकादशी के दिन रात में जागरण करके विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें और जमीन पर बिस्तर लगाकर ही सो जाएं। पुराणों के अनुसार जो भी भक्त एकादशी का उपवास रखता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। साथ ही सभी पापों का नाश भी हो जाता है और स्‍वर्गलोक की प्राप्ति होती है। देवशयनी एकादशी को कई नामों से जाना जाता है। इस एकादशी को आषाढ़ी, हरिशयनी एकादशी से भी जाना जाता है।

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देवशयनी एकादशी व्रत कथा

पद्मपुराण के उत्तरखंड में योगिनी एकादशी की व्रत कथा का वर्णन मिलता है। जिसके अनुसार योगिनी एकादशी की कथा भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई थी। जिसमें श्रीकृष्ण कहते हैं कि स्वर्ग की अलकापुरी नाम की नगरी में एक कुबेर नाम का राजा था। वह भगवान शिव का भक्त था। जिसके यहां हेम नाम का माली पूजा के लिए फूल लाया करता था। हेम की विशालाक्षी नाम की सुंदर पत्नी थी। एक दिन वह मानसरोवर से फूल लेकर तो आ गया, लेकिन काम भाव में पड़ने के कारण वह अपनी पत्नी के साथ आनंद की प्राप्ति में रम गया। इधर पूजन में देरी होता देख राजा ने अपने सेवकों को उस माली के न आने का कारण जानने के लिए भेजा।

सेवकों ने आकर राजा को पूरी घटना बता दी। यह सुनकर राजा कुबेर बहुत अधिक गुस्से में आ गए और माली को श्राप दिया कि “तू स्त्री वियोग से दुखी होकर धरती पर जाकर कोढ़ी बनेगा।” इस श्राप से हेम माली उसी वक्त धरती पर गिर गया। जिसके बाद वह कोढ़ी बन गया। धरती पर बहुत दिनों तक हेम माली कष्ट भोगता रहा, लेकिन उसे पूर्व जन्म की बात याद न रही। एक दिन वह घूमते हुए मार्कण्डेय ऋषि के आश्रम में पहुंचा।

उसे देखकर मार्कण्डेय ऋषि बोले- ‘तू ऐसा कौन सा पाप किया है जिस कारण तुम्हें ऐसा कष्ट भोगना पड़ रहा है।’ हेम माली ने ऋषि को पूरी बात सुनाई। उसकी व्यथा सुनकर मार्कण्डेय ऋषि ने उसे योगिनी एकादशी का व्रत करने के लिए कहा। जिसके बाद हेम माली ने पूरे विधि-विधान से योगिनी एकादशी का व्रत रखा। इस व्रत के प्रभाव से वह अपनी पुरानी अवस्था में आ गया और अपनी पत्नी के साथ सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करने लगा।

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