त्याग और बलिदान का पर्व है ईदुल अजहा

त्याग और बलिदान का पर्व है ईदुल अजहा

Rakesh Mishra | Updated: 13 Jan 2015, 11:45:00 AM (IST) त्यौहार

ईदुल अजहा जिलहिज्जा (जो चन्द्र वर्ष का बारहवां महीना है) की दस तारीख को होती है

ईदुल अजहा जिलहिज्जा (जो चन्द्र वर्ष का बारहवां महीना है) की दस तारीख को होती है। यह वह दिन है जब मक्के में हाजी हज के अरकान से फुरसत पा जाते हैं और "मीना" जो मक्का से चार मील पर शहर से बाहर है, अल्लाह की याद, इबादत, कुर्बानी और अल्लाह की नेअमतों के प्रयोग और खाने पीने में व्यस्त होते हैं। ईदुल अजहा तीन दिन मनाई जाती है। बकरईद की नमाज तो दस तारीख को ही पढ़ी जाती है,लेकिन कुरबानी बारह तारीक के सूर्यास्त हो सकती है। बकरईद के मौके पर नौ तारीख को फर्ज से तेरह तारीख की अस्र तक हर फर्ज नमाज के बाद कुछ विशेष शब्द बुलन्द आवाज में कहे जाते हैं। जिन में खुदा की बड़ाई का ऎलान और उसकी प्रशंसा व वन्दना का तराना है। इनको "तकबीराते तशरीक" कहते हैं। इनके अर्थ इस प्रकार हैं : "अल्लाह सबसे बड़ा है,अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह के सिवा कोई पूजने योग्य नहीं,अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है और अल्लाह ही के लिए प्रशंसा है।"

ईदुल अजहा पैगम्बर हजरत इब्राहिम द्वारा अल्लाह के लिए प्रस्तुल की गई महान कुरबानी की याद में मनाई जाती है। हजरत इब्राहिम ने सपने में देखा कि वे अपने पुत्र इस्माईल को कुरबान कर रहे हैं। यह ईश्वर की ओर से उनकी परीक्षा थी। उन्होंने अल्लाह के आदेशनुसार अपने प्रिय पुत्र को कुरबानी के लिए प्रस्तुत कर दिया, लेकिन अल्लाह ने इस्माईल के स्थान पर दुम्बा (भेड़ जैसा जानवर) भेज दिया और इब्राहिम के बलिदान को स्वीकार कर लिया।

कई दिन पहले से ईद की तैयारी शुरू हो जाती है, लेकिन ईद की रात में बड़ी हमाहमी और बाजारों और घरों में चहल-पहल होती है। सुबह से ईद की तैयारी शुरू हो जाती है, स्नान किया जाता है और इस दिन नया जोड़ा पहनते हैं। नहा धोकर, कपड़े पहनकर खुशबू लगाकर लोग ईदगाह को प्रस्थान करते हैं। ईद की नमाज सूर्य चढ़ने के बाद अदा की जाती है। ईद की सबसे बड़ी जमाअत शहर या कस्बे की ईदगाह में होती है। मुसलमान ईद की नमाज पढ़ने जाते और वहां से आते समय अल्लाह की प्रशंसा और कृतज्ञता के शब्द कहते हुए जाते हैं। सुन्नत तरीका यह है कि रास्ते से ईदगाह जाएं और दूसरे रास्ते से वापस आएं ताकि दोनों ओर अल्लाह की बड़ाई और मुसलमानों की एकता और इबादत के शौक की अभिव्यक्ति हो जाए। इससे यह भी लाभ है कि यातायात में कठिनाई नहीं होती।

पांच वक्त की नमाजों और जुमा के विपरीत ईदुल फित्र और ईदुल अजहा की नमाज से पहने न अजान है न इकातम न कोई सुन्नत,न नफिल नमाज है जैसे ही मुसलमान जमा हो जाते है या नमाज का समय हो जाता है,इमाम आगे बढ़ जाता है और नमाज शुरू कर देता है। सलाम फेरने (नमाज पूरी होने) के बाद फौरन इमाम मिम्बर (मंच) पर चला जाता है और ईद का खुत्बा (सम्बोधन) देता है। जो जुमा की तरह दो हिस्सो में बंटा है। एक खुत्बा देकर कुछ सेकेंड के लिए इमाम बैठ जाता है, फिर खड़ा हो जाता है और दूसरा खुतबा देता है।

जुमे में पहला खुत्बा है, फिर नमाज। ईद में पहले नमाज और फिर खुत्बा। खुत्बे में ईद और उसके संदेश, औश्र सम-सामयिक विषयों पर प्रकाश डाला जाता है।

ईदुल फित्र और ईदुल अजहा में अंतर केवल कुरबानी का है। ईदगाह से लौटकर कुरबानी की जाती है। कुरबानी के गोश्त के तीन हिस्से किए जाते हैं। एक हिस्सा घर वालो और अपने लिए, एक हिस्सा मित्रों के लिए और एक हिस्सा दीन-दुखियों के लिए। यह दिन खाने-पीने के गिने गए हैं, अंत: इस दिन रोजा रखना निषिद्ध है। ईद और बकरईद दोनों मुसलमानों के अंतरराष्ट्रीय त्योहार हैं, जिनसे कोई देश, कोई कौम और तब्का अलग नहीं और सारे देशों में चाहे वह मुस्लिम बहुल देश हों अथवा मुस्लिम अल्पसंख्यक, ये त्योहार मनाए जाते हैं।

ईदुन अजहा त्याग एवं बलिदान का पर्व है। यह केवल जानवर की बलि देने या गोश्त खाने का दिन नहीं है, अपितु यह कुरबानी इस संकल्प का प्रतीक है कि यदि आवश्यकता पड़ी तो सम्य मार्ग में हम अपनी प्रियतम वस्तु और और अपनी जान भी बलिदान कर देंगे। यह एक अकेले ईश्वर की आराधना के संकल्प का दिन है। यह ईश्वर के साथ किसी अन्य को पूजा में शरीक न करने के संकल्प का दिन है। यह दिन है गरीबों और मोहताजों की सहायता के लिए अपना धन खर्च करने का। यह दिन है प्रेम, भाईचारे और एकता का। यह दिन है अपने अंदर की बुराइयों के त्याग का। आइये इस अवसर पर हम संकल्प करें कि अल्लाह से प्रेम की खातिर हम अपने अंदर की बुराइयो का त्याग करेंगे, मानव मित्र से प्रेम करेंगे और सत्य मार्ग में आने वाली हर कठिनाई का केवल अल्लाह की प्रसन्नता के लिए हंसते हुए बर्दाश्त करेंगे।
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