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Ganga Saptami 2021 Date: गंगा सप्तमी 18 मई को, जानिए महत्व, शुभ मुहूर्त और मंत्र

इस दिन को गंगा जयंती के रूप में भी मनाया जाता है...

भोपाल

Published: May 17, 2021 12:06:18 pm

स्वर्ग से देवी माता गंगा का धरती पर आना हिंदू धर्म में अति विशेष माना जाता है, मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु के अंगुठे से निकलकर देवी माता गंगा पृथ्वी पर आईं थीं। जहां उन्हें भगवान शिव ने अपनी जटाओं पर धारण किया था, ताकि गंगा का वेग कहीं पृथ्वी को ही रसातल में न ले जाए।

ganga saptami
ganga saptami 2021

ऐसे में वैशाख शुक्ल की सप्तमी तिथि को Hindu Panchang के अनुसार मां गंगा स्वर्ग लोक से भगवान शिव की जटाओं में विराजमान हुई थीं। जिस कारण ये दिन गंगा सप्तमी Ganga Saptami के रूप में मनाया जाता है। वहीं मां गंगा के शिव की जटाओं से धरती पर आने को गंगा दशहरा के नाम से जाना जाता है।

इस साल यानि 2021 में मंगलवार 18 मई को गंगा सप्तमी का पर्व है। यूं तो हर वर्ष गंगा सप्तमी का त्यौहार पूरे देश में विशेष पूजन अर्चन करके मनाया जाता है। लेकिन वर्ष 2020 की तरह ही इस वर्ष भी corona pandemic के चलते लोगों का घरों से बाहर निकलना मुश्किल दिख रहा है ऐसे में आप अपने घर में भी मां गंगा का पूजन कर सकते हैं।

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https://www.patrika.com/dharma-karma/vaisakha-som-pradosh-2021-importance-6845576/गंगा सप्तमी के दिन सुबह एवं शाम के समय गंगाजल मिले जल से स्नान करने के बाद अपने घर के पूजा स्थल पर एक कटोरी में थोड़ा सा गंगाजल रखें। अब उसी Ganga Jal के बीच में दो बत्ती वाला गाय के घी का एक दीपक जलाएं और गंगाजल का विधिवत पूजन करें। गंगा मैया की कृपा से सभी कामनाएं पूरी होगी।
गंगा सप्तमी 2021 का शुभ मुहूर्त- गंगा सप्तमी
सप्तमी प्रारंभ: मंगलवार,18 मई 2021 को दोपहर 12 बजकर 32 मिनट से
सप्तमी समापन: बुधवार, 19 मई 2021 को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट तक

गंगाजी का मंत्र-
'ॐ नमो भगवति हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे माँ पावय पावय स्वाहा'।।
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घर में ऐसे करें पूजन:
दोपहर के समय अपने घर में ही उत्तर दिशा में एक लाल कपड़े पर गंगा जल मिले कलश की स्थापना करें। 'ऊँ गंगायै नमः' मंत्र का उच्चारण करते हुए जल में थोड़ा सा गाय का दूध, रोली, चावल, शक्कर, इत्र और शहद मिलाएं।

अब कलश में अशोक या फिर आम के 5-7 पत्ते डालकर उस पर एक पानी वाला नारियल रख दें। अब इस कलश का पंचोपचार पूजन करें। गाय के घी का दीपक, चंदन की सुगंधित धूप, लाल कनेर के फूल, लाल चंदन, ऋतुफल एवं गुड़ का भोग लगावें।

इस विधि से पूजन करने के बाद मां गंगा के इस मंत्र- 'ऊँ गं गंगायै हरवल्लभायै नमः' का 108 बार जप जरूर करें। इस दिन अपने सभी तरह के दुखों एवं पापों से मुक्ति पाने के लिए अपने ऊपर से 7 लाल मिर्ची बहते हुये जल में प्रवाहित कर दें।

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इस बार घर पर ही करें ये

पंडित एसके पांडे के अनुसार इस दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व माना गया है, मान्यता है कि इस तिथि पर गंगा स्नान, तप ध्यान तथा दान-पुण्य करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है, लेकिन कोरोना के इस संकट काल में ऐसा करना मुमकिन नहीं होगा। अत: आप घर में बाल्टी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान करें, ऐसा करने से मां गंगा की अनुकंपा आप पर बनी रहेगी।

मान्यता के अनुसार ये वही तिथि है जब भगीरथ अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए मां गंगा को स्वर्ग से लेकर आएं थे, जिसके चलते इस दिन को गंगा जयंती के रूप में भी मनाया जाता है।

वर्तमान समय में देश में कोरोना महामारी फैली हुई, इस कारण गंगा नदी में जाकर पूजन व स्नान आदि संभव नहीं है। ऐसे अपने घर में ही इस उपाय को करने पर मां गंगा की कृपा से सभी इच्छाएं पूरी होने लगती है।

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गंगा सप्तमी की पौराणिक कथा: Ganga Saptami Story
प्राचीन काल में भगीरथ नामक एक प्रतापी राजा थे। वे राजा सगर के वंशज थे, राजा सगर के पुत्रों को कपिल मुनि ने किन्हीं कारणोंवश श्राप देकर भस्म कर दिया था। ऐसे में राजा भगीरथ भस्म कर दिए गए अपने उन पूर्वजों को जीवन-मरण के दोष से मुक्त करने के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाना चाहते थे।

इसके चलते उन्होंने कठोर तपस्या आरम्भ की। उनकी इस तपस्या से मां गंगा प्रसन्न हुईं और स्वर्ग से पृथ्वी पर आने के लिए तैयार हो गईं। लेकिन, उन्होंने भागीरथ से कहा कि यदि वे सीधे स्वर्ग से पृथ्वी पर आएंगीं तो पृथ्वी उनका वेग सहन नहीं कर पाएगी और रसातल में चली जाएगी।

यह सुनकर भागीरथ सोच में पड़ गए। गंगा को यह अभिमान था कि कोई उसका वेग सहन नहीं कर सकता। तब उन्होंने भगवान भोलेनाथ की उपासना शुरू कर दी। संसार के दुखों को हरने वाले भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर भागीरथ से वर मांगने को कहा। भागीरथ ने अपना सब मनोरथ उनसे कह दिया।

गंगा जैसे ही स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरने लगीं गंगा का गर्व दूर करने के लिए भगवान शिव ने उन्हें जटाओं में कैद कर लिया। वह छटपटाने लगी उन्होंने शिव जी से माफी मांगी। तब भगवान शिव ने उन्हें जटा से एक छोटे से पोखर में छोड़ दिया, जहां से गंगा सात धाराओं में प्रवाहित हुईं। इस प्रकार भगीरथ पृथ्वी पर गंगा का वरण करके भाग्यशाली हुए।

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