छप्पन भोग के लिए सजने लगा है गोवर्धन का सप्त कोसी परिक्रमा मार्ग

Sunil Sharma

Publish: Sep, 02 2017 04:19:00 (IST)

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छप्पन भोग के लिए सजने लगा है गोवर्धन का सप्त कोसी परिक्रमा मार्ग

इसमें द्वापर का वह जीवंत दृश्य दिखाई पडऩे लगता है जिसमें श्यामसुन्दर के कहने पर ब्रजवासियों ने गिर्राज महाराज की पूजा की थी

गिरि गोवर्धन की तलहटी में अनंत चतुर्दशी को होने वाले अलौकिक छप्पन भोग महोत्सव के लिये सप्त कोसी परिक्रमा मार्ग सजने लगा है। इस बार अनन्त चतुर्दशी का पर्व पांच सितंबर को है। छप्पन भोग गिर्राज की आराधना का सबसे उत्तम पर्व माना जाता है। इसमें सामूहिक आराधना की जाती है इसलिए इसमें द्वापर का वह जीवंत दृश्य दिखाई पडऩे लगता है जिसमें श्यामसुन्दर के कहने पर ब्रजवासियों ने गिर्राज महाराज की पूजा कर उन्हें नाना प्रकार के व्यंजन अर्पित किये थे तथा सुरभि गाय ने उनका दुग्धाभिषेक किया था। उस समय इन व्यंजनों की संख्या 56 हो गई थी पर अब व्यंजनों की संख्या अधिक हो जाती है।

माना यह जाता है कि जितना अधिक ठाकुर को समर्पण होता है उतनी ही ठाकुर की कृपा की वर्षा भक्तों पर होती है। वैसे तो अनन्त चतुर्दशी से होली तक लगभग हर माह मथुरा और अन्य प्रांतों के विभिन्न संगठनों के लोग छप्पन भोग का आयोजन करते हैं मगर वर्ष का प्रथम छप्पन भोग होने तथा गिर्राज जी का अनुपम एवं अलौकिक श्रृंगार करने के कारण इसने अपनी अलग ही पहचान बना ली है तथा इसे देखने के लिए लाखों तीर्थयात्री विभिन्न प्रांतों से आते हैं।

समिति के संस्थापक अध्यक्ष मुरारी अग्रवाल ने बताया कि इस छप्पन भोग की विशेषता शुचितापूर्ण तरीके से ठाकुर को अर्पित किया जाने वाला 21 हजार किलो छप्पन भोग है जो विभिन्न व्यंजनों से परिपूर्ण होता है। व्यंजन बनाने के लिए अन्नपूर्णा रथ प्रसाद सामग्री लेकर वैदिक मंत्रों एवं गाजे बाजे के मध्य गोवर्धन न केवल रवाना हो चुका है बल्कि पूर्ण शुचितापूर्ण माहौल में प्रसाद सामग्री का बनना शुरू हो गया है।

इस तीन दिवसीय छप्पन भोग महोत्सव के कार्यक्रम के बारे में समिति के अध्यक्ष दीनानाथ अग्रवाल ने बताया कि कार्यक्रम की शुरुआत तीन सितंबर को गिर्राज जी की सप्त कोसी परिक्रमा में निकलने वाले ब्रज के डोले से होगी जिसके साथ भक्तिपूर्ण संगीत के मध्य हजारों भक्त गिर्राज परिक्रमा करते हैं। चार सितंबर को सप्त नदियों गंगा ,यमुना, चिनाव, अलखनंदा, ब्रह्मपुत्र ,घाघरा एवं गोमती के पवित्र जल और कामधेनु गाय के दूध, केसर, शहद और उत्तराखंड की दुर्लभ जड़ी बूटियों से गिर्राज प्रभु का पंचामृत महाभिषेक होगा। मुख्य छप्पन भोग पांच सितंबर को होगा जबकि दर्शन दोपहर तीन बजे से रात्रि 12 बजे तक होंगे।

छप्पन भोग के लिए पिछले एक माह से कोलकाता और उड़ीसा के कारीगर राजमहल रूप का आकर्षक पंडाल तैयार कर रहे है जहां शुद्ध गाय के घी से 21000 किलो व्यंजन तैयार कर प्रभु को अर्पित किए जाएंगे तथा असली दुर्लभ रत्नों हीरा, पन्ना, मोती, नीलम, गोमेद, पुखराज आदि से प्रभु का श्रृंगार द्वारिकाधीश की राजाधिराज शैली में होगा। पूरे परिसर के लिए जहां देश के विभिन्न भागों में होने वाले आकर्षक फूलों को मंगाया गया है वहीं थाईलैंड और मलेशिया से भी फूल मंगाये जा रहे हैं।

कार्यक्रम में शास्त्रीय संगीत की धुन के साथ कन्नौज के केवड़ा इत्र की बारिश से तलहटी महकाने का अनूठा प्रयास इस वर्ष किया जाएगा। बच्चों एवं युवा पीढ़ी को संस्कारयुक्त बनाने के लिए छप्पन भोग महोत्सव को इस बार मेले का स्वरूप भी दिया जा रहा है।

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