5 से 21 सितंबर के बीच श्राद्ध पक्ष में कभी भी करें ये काम, हमेशा के लिए चमक जाएगी किस्मत

Sunil Sharma

Publish: Sep, 03 2017 12:19:00 (IST)

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5 से 21 सितंबर के बीच श्राद्ध पक्ष में कभी भी करें ये काम, हमेशा के लिए चमक जाएगी किस्मत

विष्णु पुराण में कहा गया है कि श्राद्ध तथा तर्पण से तृप्त होकर पितृगण समस्त कामनाओं को पूर्ण कर देते हैं

दिवंगत पूर्वजों के निमित्त श्रद्धापूर्वक किए दान को ही श्राद्ध कहा जाता है। ब्रह्मपुराण में कहा गया है कि श्राद्ध के द्वारा प्रसन्न हुए पितृगण मनुष्यों को पुत्र, धन, विद्या, आयु, आरोग्य, लौकिक सुख, मोक्ष तथा स्वर्ग आदि प्रदान करते हैं। पितृश्वरों के आशीर्वाद से ही जन्म कुंडली में निर्मित पितृदोष के दुष्परिणामों से बचा जा सकता है।

आश्विन कृष्ण पक्ष में किए जाने वाले श्राद्ध पार्वण श्राद्ध कहलाते हैं जबकि वार्षिक श्राद्ध एकोदिष्ट होते हैं। याज्ञवल्क्य का कथन है कि श्राद्ध देवता श्राद्धकत्र्ता को दीर्घ जीवन, आज्ञाकारी संतान, धन विद्या, संसार के सुख भोग, स्वर्ग तथा दुर्लभ मोक्ष भी प्रदान करते हैं। इस वर्ष श्राद्ध पक्ष ६ सितम्बर से शुरू हो रहा है।

आहूति देकर करें तर्पण
विष्णु पुराण में कहा गया है कि श्राद्ध तथा तर्पण से तृप्त होकर पितृगण समस्त कामनाओं को पूर्ण कर देते हैं। श्राद्ध में पितरों की तृप्ति ब्राह्मणों के द्वारा ही होती है अत: श्राद्ध के अवसर पर दिवंगत पूर्वजों की मृत्यु तिथि को निमंत्रण देकर ब्राह्मण को भोजन, वस्त्र एवं दक्षिणा सहित दान देकर श्राद्ध कर्म करना चाहिए।

इस दिन पांच पत्तों पर अलग-अलग भोजन सामग्री रखकर पंचबलि करें। इसके बाद अग्नि में भोजन सामग्री, सूखे आंवले तथा मुनक्का का भोग लगाएं। श्राद्ध में एक हाथ से पिंड तथा आहूति दें परन्तु तर्पण में दोनों हाथों से जल देना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार वर्ष में जिस भी तिथि को वे दिवंगत होते हैं, पितृपक्ष की उसी तिथि को उनके निमित्त विधि-विधान पूर्वक श्राद्ध कार्य सम्पन्न किया जाता है। इसका निर्वहन दिवंगतों के प्रति श्रद्धांजलि का भी द्योतक है।

श्राद्ध काल में ये करें
श्राद्ध के दौरान कुछ नियमों का भी पालन किया जाए तो पितृ प्रसन्न होकर आशीर्वाद देने लगते हैं। ग्रंथों के अनुसार श्राद्ध अपने ही घर में करना चाहिए, दूसरे के घर में करने का निषेध है। श्राद्ध केवल अपरान्ह काल में ही करें। श्राद्ध में दुहिता पुत्र, कुतपकाल (दिन का आठवां भाग) तथा काले तिलों को सबसे पवित्र वस्तुएं माना है।

श्राद्ध में क्रोध और जल्दबाजी बिल्कुल नहीं करनी चाहिए। श्राद्ध काल में गीताजी, श्रीमद्भागवत पुराण, पितृ सूक्त, पितृ संहिता, रुद्र सूक्त, ऐंन्द्र सूक्त, मधुमति सूक्त आदि का पाठ करना मन, बुद्धि एवं कर्म तीनों की शुद्धि के लिए अत्यन्त फलप्रद है। श्राद्ध काल में ॐ क्रीं क्लीं ऐं सर्वपितृभ्यो स्वात्म सिद्धये ॐ फट।। ॐ सर्व पितृ प्रं प्रसन्नो भव ॐ का जाप भी लाभ देता है। इस काल में शांति का खासा महत्त्व भी है।

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