ओणम उत्सव का दिलचस्प हिस्सा है अरण्मुला वल्लमकली, जानें इससे जुड़ी कुछ खास बातें

ओणम उत्सव का दिलचस्प हिस्सा है अरण्मुला वल्लमकली, जानें इससे जुड़ी कुछ खास बातें

Tanvi Sharma | Publish: Aug, 06 2018 05:59:02 PM (IST) त्यौहार

ओणम उत्सव का दिलचस्प हिस्सा है अरण्मुला वल्लमकली, जानें इससे जुड़ी कुछ खास बातें

देशभर में कई संस्कृति और उनसे जुड़े कई त्योहार मनाए जाते हैं। ऐसे ही सावन माह आते ही चारों तरफ हरियाली छा जाती है और सभी लोग शिव की भक्ती में लीन हो जाते हैं। सावन माह का हर जगह कई तरह से स्वागत किया जाता है। वैसे ही बदलते मौसम और प्रकृति के अद्भुत नजारों के लिए जाना जाता है केरल, केरल में इस ऋतु का कुछ अलग तरीके से स्वागत किया जाता है। यहां जब सावन का महीना आता है तो बारिश में सराबोर यहां के लोग अपनी खुशी को पर्व के रूप में जाहिर करते हैं।
यहां केरल राज्य में मानसून आने की खुशी में सबसे ज्यादा त्योहार मानसून में ही आयोजित किए जाते हैं। केरल में सावन में होने वाला ओणम का त्योहार और इसके दौरान होने वाले 10 दिवसीय उत्सव देशभर में प्रसिद्ध है। केरल में होने वाली प्रसिद्ध बोट रेस भी बारिश के मौसम में ही होती हैं। इस रेस को यहां 'वल्लमकली' कहते हैं और ओणम के दौरान यहां अराण्मुला वल्लमकली होती है। वहीं वल्लमकली को देखने देशभर से लोग यहां आते हैं। इस उत्सव में उपयोग में आने वाली नावें सर्पाकार की होती हैं। इन नावों को कई नाविक खेते हैं तथा उससे ज्यादा लोग इसे देखने के लिए किनारों पर जमा होते हैं। ये लोग पारंपरिक गीत, मंत्र आदि गाते रहते हैं और पारंपरिक सफेद वस्त्र मंडु तथा टर्बन पहने होते हैं। नाव को सुंदर सुनहरे लेस तथा झंडे और छतरी से सजाया जाता है। वल्लमकली कई तरह से आयोजित होती है, आइए जानते हैं केरल के इस खास उत्सव वल्लमकली के बारे में....

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अराण्मुला वल्लमकली

ओणम के दौरान (अगस्त-सितंबर के महीने में) केरल में सबसे पुराना भव्य नावों की दौड़ अरण्यमूल वल्लमकली आयोजित होती है। केरल में यह बोट रेस अपनी प्राचीन परंपरा और भव्यता के लिए जानी जाती है। नावों को भगवान कृष्ण और अर्जुन के मंदिर – अरण्यमूल के पास से शुरु किया जाता है, इसीलिए इसका नाम अरण्यमूल वल्लमकली पड़ा है। यह रेस कम और पारंपरिक रस्म ज्यादा है। अर्णामुला में पंबा नदी में होने वाला यह आयोजन दरअसल ओणम का हिस्सा है।

‘अरण्यमूल केरल की राजधानी तिरुअनंतपुरम से लगभग 128 किमी की दूरी पर स्थित है। यहाँ पंपा नदी बहती है। अरण्यमूल के प्रसिद्ध मंदिर में अर्जुन के सारथी भगवान कृष्ण की आराधना की जाती है। अनुमानित आंकड़ों के अनुसार, यह मंदिर लगभग 1700 वर्ष पुराना है।’ इस नाव दौड़ में भाग लेने वाली नावों में नारियल और मछली का तेल, कुछ अंडे तथा कालिख का लेप लगाया जाता है, जिससे यह मजबूत और चिकना बना रहे और इस पर पानी का प्रभाव न पड़े। इस नावों की दौड़ को देखने के लिए दर्शक पूरे वर्ष इंतजार करते हैं।

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नेहरू ट्रॉफी बोट रेस

केरल में अल्लपुझा के बैकवॉटर की पुन्नमड झील में होने वाली यह बोट रेस सबसे प्रसिद्ध है। ये रेस हर साल अगस्त के दूसरे शनिवार को होती है। इस आयोजन में चुंदन वेलोम (स्नेक बोट) की पारंपरिक दौड़ के अलावा पानी पर झांकियां भी होती हैं। इस कॉम्पिटीशन के नजारे वाकई अद्भुत होते हैं।

पय्यपड़ बोट रेस

अलप्पुझा में ही पय्यपड़ नदी में एक अन्य बोट रेस होती है। केरल में नेहरू ट्रॉफी बोट रेस के बाद स्नेक बोट की सबसे बड़ी रेस यही है इस रेस की शुरुआत हरीपाद मंदिर और सुब्रह्मण्य स्वामी मंदिर में मूर्ति की स्थापना से हुई, कहते इस मूर्ति स्थापना के दौरान वहां ग्रामीणों को एक सपना आया, जिसके बाद वे कायमकुलम झील में एक चक्रवात तक पहुंचे, जहां उन्हें मूर्ति प्राप्त हुई। उसी समय से यहां बोट रेस की परंपरा चली आ रही है।

कुमारकोम बोट रेस

पय्यपड़ में बोट रेस वाले दिन वहां प्रसिद्ध रिजॉर्ट कुमारकोम में भी श्री नारायण जयंती बोट रेस होती है। यह रेस केरल में होने वाली बाकी रेसों से अलग होती है। यह रेस महान समाज सुधारक श्री नारायण गुरु के गांव में आने की याद में आयोजित की जाती है। हर साल श्री नारायण गुरु की जयंती पर उनको याद किया जाता है।

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