परिवर्तिनी एकादशी 29 अगस्त को, जानिये महत्व, पूजा विधि, कथा और पारण का समय

भगवान विष्णु की पूजा करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है...

By: दीपेश तिवारी

Published: 27 Aug 2020, 02:02 PM IST

हिन्दू धर्मशास्त्रों में शरीर और मन को संतुलित करने के लिए व्रत और उपवास के नियम बनाये गए हैं। तमाम व्रत और उपवासों में सर्वाधिक महत्व एकादशी का है, जो माह में दो बार पड़ती है, इनमें शुक्ल एकादशी,और कृष्ण एकादशी हैं। माह में 2 एकादशियां यानि आपको माह में बस 2 बार और वर्ष के 365 दिनों में मात्र 24 बार ही नियमपूर्वक एकादशी व्रत रखना है। हालांकि प्रत्येक तीसरे वर्ष अधिकमास होने से 2 एकादशियां जुड़कर ये कुल 26 होती हैं।

- पुराणों के अनुसार जो व्यक्ति एकादशी करता रहता है, वह जीवन में कभी भी संकटों से नहीं घिरता और उसके जीवन में धन और समृद्धि बनी रहती है। ऐसे में इस बार 29 अगस्त 2020, शनिवार को परिवर्तिनी एकादशी (Parivartini Ekadashi) का व्रत रखा जाएगा। आमतौर पर यह व्रत भगवान विष्णु के भक्त यानी वैष्णव रखते हैं।

मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु देवशयनी एकादशी के दिन 4 महीनों के लिए सो जाते हैं। देवउठनी एकादशी पर उठते हैं। वहीं परिवर्तिनी एकादशी के संदर्भ में माना जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु सोते हुए करवट बदलते हैं।

स्थान में परिवर्तन होने की वजह से ही इस एकादशी को परिवर्तिनी नाम दिया गया है। एकादशी तिथि भगवान विष्णु को बहुत प्रिय है। इसलिए ही उनके भक्त इस दिन व्रत कर उन्हें प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं।

महत्व : परिवर्तिनी एकादशी : Parivartini Ekadashi Ka Mahatva/ Parsva Ekadashi Ka Mahatva
मान्यता के अनुसार परिवर्तिनी एकादशी के दिन व्रत कर भगवान विष्णु की पूजा करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। इस तिथि का महत्व बहुत अधिक माना गया है। परिवर्तिनी एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा-आराधना करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

भगवान विष्णु या उनके अवतारों की पूजा करने वाले भक्तों की भगवत दर्शन की इच्छा होती है। मान्यता है कि परिवर्तिनी एकादशी के प्रभाव से यह इच्छा पूर्ण होती है। इसके साथ ही यह भी माना जाता है कि इसी दिन भगवान अपने पांचवें अवतार यानी वामन अवतार में पृथ्वी पर आए थे, इसीलिए इस दिन वामन जयंती भी मनाई जाती है।

परिवर्तिनी एकादशी की पूजा विधि : Parivartini Ekadashi Puja Vidhi/ Parsva Ekadashi Puja Vidhi
पंडित सुनील शर्मा के अनुसार परिवर्तिनी एकादशी की पूजा के कुछ खास नियम हैं, जिन्हें पूरा करने पर ही सम्पूर्ण फल प्राप्त होता है। इसके तहत...
– इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें।
– जिस स्थान पर पूजा करनी है उस स्थान की सफाई करें। साथ ही गंगाजल डालकर पूजन स्थल को पवित्र करें।
– इसके बाद एक चौकी लें और उस पर पीले रंग का कपड़ा बिछाएं।
– भगवान लक्ष्मी नारायण की प्रतिमा उस पर विराजित करें।
– दीपक जलाएं और प्रतिमा पर कुमकुम या चंदन का तिलक लगाएं।
– हाथ जोड़कर भगवान विष्णु का ध्यान करें। प्रतिमा पर तुलसी के पत्ते और पीले फूल अर्पित करें।
– फिर विष्णु चालीसा, विष्णु स्तोत्र और विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें।
– इस दिन भगवान विष्णु के मंत्रों या नाम का जाप अवश्य करें।
– इसके बाद विष्णु जी की आरती करें। उनसे पूजा में हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगें।
– किसी पीले फल या मिठाई का भोग लगाएं।

परिवर्तिनी एकादशी शुभ मुहूर्त : Parivartini Ekadashi shubh muhurat

एकादशी तिथि आरंभ – 28 अगस्त, शुक्रवार – सुबह 08 बजकर 38 मिनट से...
एकादशी तिथि समाप्त – 29 अगस्त, शनिवार – सुबह 08 बजकर 17 मिनट तक...
पार्श्व एकादशी पारणा मुहूर्त :05:58:16 से 08:31:29 तक 30, अगस्त को...
अवधि : 2 घंटे 33 मिनट

परिवर्तिनी एकादशी व्रत की कथा
महाभारत काल के समय पाण्डु पुत्र अर्जुन के आग्रह पर भगवान श्री कृष्ण ने परिवर्तिनी एकादशी के महत्व का वर्णन सुनाया। भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि- हे अर्जुन! अब तुम समस्त पापों का नाश करने वाली परिवर्तिनी एकादशी की कथा का ध्यानपूर्वक श्रवण करो।त्रेतायुग में बलि नाम का असुर था लेकिन वह अत्यंत दानी,सत्यवादी और ब्राह्मणों की सेवा करने वाला था। वह सदैव यज्ञ, तप आदि किया करता था। अपनी भक्ति के प्रभाव से राजा बलि स्वर्ग में देवराज इन्द्र के स्थान पर राज्य करने लगा। देवराज इन्द्र और देवता गण इससे भयभीत होकर भगवान विष्णु के पास गये। देवताओं ने भगवान से रक्षा की प्रार्थना की। इसके बाद मैंने वामन रूप धारण किया और एक ब्राह्मण बालक के रूप में राजा बलि पर विजय प्राप्त की।

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- वामन रूप लेकर मैंने राजा बलि से याचना की- हे राजन! यदि तुम मुझे तीन पग भूमि दान करोगे, इससे तुम्हें तीन लोक के दान का फल प्राप्त होगा। राजा बलि ने मेरी प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और भूमि दान करने के लिए तैयार हो गया। दान का संकल्प करते ही मैंने विराट रूप धारण करके एक पांव से पृथ्वी, दूसरे पांव की एड़ी से स्वर्ग तथा पंजे से ब्रह्मलोक को नाप लिया। अब तीसरे पांव के लिए राजा बलि के पास कुछ भी शेष नहीं था। इसलिए उन्होंने अपने सिर को आगे कर दिया और भगवान वामन ने तीसरा पैर उनके सिर पर रख दिया। राजा बलि की वचन प्रतिबद्धता से प्रसन्न होकर भगवान वामन ने उन्हें पाताल लोक का स्वामी बना दिया।

मैंने राजा बलि से कहा कि, मैं सदैव तुम्हारे साथ रहूंगा। परिवर्तिनी एकादशी के दिन मेरी एक प्रतिमा राजा बलि के पास रहती है और एक क्षीर सागर में शेषनाग पर शयन करती रहती है। इस एकादशी को विष्णु भगवान सोते हुए करवट बदलते हैं।

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दीपेश तिवारी
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