पर्युषण है क्षमा, समता और मैत्री का शक्ति पर्व, सिखाता है जीने की भी कला

Sunil Sharma

Publish: Aug, 27 2017 12:27:00 (IST)

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पर्युषण है क्षमा, समता और मैत्री का शक्ति पर्व, सिखाता है जीने की भी कला

‘धम्मपद’ के एक सूत्र का सार है कि वैर से वैर कभी शांत नहीं होता। मित्रता से वैर शांत होता है, यह शाश्वत सिद्धांत भी है।

पर्युषण आत्मशोधन का पर्व है, जो जैन-समुदाय द्वारा प्रतिवर्ष भाद्रपद मास में मनाया जाता है। इसमें साधक अपने आपमें निवास करने का अभ्यास करता है। इस प्रकार पर्युषण आत्मविकास का पर्व है, जागृति का पर्व है, चेतना को अन्तर्मुखी बनाने का पर्व है। इसके अन्तर्गत उपवास, प्रतिक्रमण (अतीत का सिंहावलोकन, भविष्य का संकल्प), स्वाध्याय, ध्यान, समता, क्षमापना, मैत्री आदि अनुष्ठान मनोयोगपूर्वक सम्पन्न किए जाते हैं।

श्वेताम्बर जैन समुदाय आठ दिन की उपासना के बाद सम्वत्सरी महापर्व की आराधना सम्पन्न कर मैत्री दिवस (क्षमापना) के साथ पर्व का समापन करता है। वहीं दिगम्बर समाज १० दिवसीय दशलक्षण पर्व की आराधना कर क्षमावाणी पर्व मनाता है। संपूर्ण अनुष्ठान में प्राणीमात्र के साथ समता व समत्वभाव का संबंध स्थापित करने का उपक्रम किया जाता है, जिससे जीवन बेहद सरल और सहज बन जाता है।

समत्व भाव से आती है सहजता
महावीर ने अहिंसा की साधना की पहली शर्त रखी थी, ‘आयतुले पयासु’ अर्थात प्राणिमात्र को अपने समान समझो। यानी सबका हित-चिंतन करो। यह समत्व भाव व्यक्ति के समता भाव को सहज बना देता है। सहिष्णुता के संस्कार को पुष्ट करता है। किसी के कटु, अनिष्ट, अप्रिय व्यवहार पर भी मन में आक्रोश या प्रतिशोध के निषेधात्मक भाव नहीं उभरते। व्यक्ति अनेकता में एकता खोजने का प्रयत्न करता है। दूसरों के दुख को अपने दुख के समान समझने लगता है। हानि-लाभ, जीवन-मरण, हित-अहित आदि सभी स्थितियां में वह समभाव में रहता है।

मैत्री से क्षमता और सहिष्णुता का विकास
समता और समत्व से ही मैत्री और क्षमा की विराट शक्तियां प्राप्त की जा सकती हैं। पर्युषण आराधना का महत्त्वपूर्ण घटक है मैत्री-भाव का विकास। मैत्री एक विराट और व्यापक शक्ति है, जिसका विकास समता और सहिष्णुता के धरातल पर होता है। हम मैत्री को दूसरे का हित साधने तक ही सीमित नहीं रखें, इसके व्यापक स्वरूप को समझने का प्रयत्न करें कि किसी को भी कष्ट या हानि नहीं पहुंचाने का संकल्प ही सार्वभौम मैत्री है, जो सबके साथ होती है। यह जीवन को सहज भी बनाती है।

अहंकार और क्रोध का शमन करता क्षमापर्व
पर्युषण क्षमा और मैत्री का शक्ति-पर्व है, जिसके साथ क्षमापना की परंपरा जुड़ी है। यह अहंकार विसर्जन, क्रोधशमन के विस्तार का सफल सूत्र है। यह इतना सशक्त है कि इससे अनगिनत सामाजिक दुविधाओं व राष्ट्रीय तथा अन्तरराष्ट्रीय समस्याओं का समाधान सहज हो सकता है। पर्युषण में जिन मानवीय सद्गुणों या धर्मों की आराधना की जाती है वे उत्कृष्ट सामाजिक आचार-संहिता के सिद्धांत ही हैं, जिनसे सामाजिक विवाद, पारिवारिक कलह, साम्प्रदायिक तनाव आदि का शमन सहज-सम्भव है।

इसमें समता दर्शन
अमरीकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन से उनके सलाहकारों ने कहा,‘आपके शत्रु बहुत हैं, आप उन्हें समाप्त क्यों नहीं कर देते? लिंकन बोले, ‘मैं उन्हें निरंतर समाप्त कर रहा हूं।’ लोग बोले, ‘कैसे’? लिंकन बोले, ‘अपने शिष्ट व्यवहार से सबका मन जीत रहा हूं, कुछ समय में वे मेरे मित्र बन जाएंगे। सब समाप्त हो जाएंगे।’ यह है मैत्री की विराट चेतना, अभय और समता का दर्शन है।

महान व्यक्तित्व की असाधारण प्रक्रिया
क्षमा और मैत्री की शक्ति एक ओर जहां परस्परता, समन्वय, समानता और सहयोग की भावना का विकास करती है, वहीं व्यक्ति के अन्त: करण में प्रेम, सौहार्द, भावात्मक एकता और विश्वबंधुत्व जैसी श्रेष्ठताओं का पोषण भी करती है। महावीर की विराट मैत्री का अमर उद्घोष है, ‘मेत्ति मे सव्वभूएसु वेरं मञ्झ न केणई।’ सब जीवों से मेरी मैत्री है, किसी के प्रति वैर नहीं है।

आचार्य महाप्रज्ञ कहते हैं,‘मैत्री की आराधना का अर्थ है शक्ति की आराधना। सहिष्णुता एक शक्ति है। शक्ति की जब तक उपासना नहीं होती, मैत्री का भाव स्थायी नहीं हो सकता। खमतखामणा पर्युषण की आराधना का महत्त्वपूर्ण सूत्र है। उसका तात्पर्य है कि किसी भी व्यक्ति के प्रति तुम्हारे मन में असहिष्णुता का भाव आ जाए, कलुषता का भाव जाग जाए, उसे ज्ञात हो या नहीं, वह जाने या न जाने, किन्तु तुम अपनी ओर से क्षमा मांग लो, सहन कर लो। अपनी मैत्री को मत खोओ। उसे शत्रु मत मानो। यह महान व्यक्तित्व की असाधारण प्रक्रिया है।

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