इस बार सोमवती अमावस्या पर है पूर्ण सूर्यग्रहण, इन उपायों से जाग जाएगा सोया भाग्य

Sunil Sharma

Publish: Aug, 19 2017 03:54:00 (IST)

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इस बार सोमवती अमावस्या पर है पूर्ण सूर्यग्रहण, इन उपायों से जाग जाएगा सोया भाग्य

इस दिन अमावस्या होने से सोमवती अमावस्या का योग बना है साथ ही इस पूर्ण सूर्य ग्रहण भी है

इस बार सोमवार को दो विशेष योग बन रहे हैं। पहला - इस दिन अमावस्या होने से सोमवती अमावस्या का योग बना है साथ ही इस पूर्ण सूर्य ग्रहण भी है। हालांकि यह सूर्य ग्रहण रात में होने के कारण भारत में नहीं दिखाई देगा परन्तु इस बार यह दुनिया के अधिकांश हिस्सों यथा दोनों अमरीकी महाद्वीप, यूरोप, उत्तर पूर्व एशिया, उत्तरी-पश्चिमी अफ्रीका, प्रशांत महासागर, अटलांटिक महासागर के अधिकांश हिस्सों में दिखाई देगा।

सूर्य ग्रहण का समय
भारतीय समयानुसार यह सूर्य ग्रहण 21 अगस्त की रात्रि 9 बजकर 16 मिनट से आरंभ होगा और रात्रि में 2 बजकर 34 मिनट पर समाप्त होगा। अतः भारत में इसका सूतक भी नहीं माना जाएगा। परन्तु सर्वव्यापी होने के कारण इसे तंत्र प्रयोगों के लिए अत्यन्त उपयुक्त तथा शुभ माना गया है। इस समय किए गए तंत्र तथा पूजा-पाठ के प्रयोग व्यक्ति के पूरे जीवन को बदलने की क्षमता रखते हैं। आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ प्रयोगों के बारे में जो आपका भाग्य सदा के लिए बदल देंगे।

ग्रहण में किए जाते हैं ये उपाय
ग्रहण के समय यदि सामर्थ्य हो तो भूमि, गांव, सोना, धान्य आदि दान करने चाहिए। गाय के दान से सूर्य लोक की प्राप्ति, बैल के दान से शिव लोक की प्राप्ति, स्वर्ण के दान से ऐश्वर्य की, स्वर्ण निर्मित सर्प के दान से राजपद, घोड़े के दान से बैंकुंठ की तथा अन्न दान करने से सभी सुखों की प्राप्ति होती है।

ग्रहण के समय भूल से भी न करें वर्जित कर्म
ग्रहण काल में सोना, भोजन करना, मूर्ति स्पर्श करना, मल मूत्र आदि त्यागना वर्जित है। इसमें बालक, वृद्ध और रोगी को छूट दी गई है। इसके अतिरिक्त ग्रहण काल में मैथुन एवं हास्य विनोद आदि का भी निषेध किया गया है। चंद्रग्रहण में 3 याम (प्रहर) पूर्व और सूर्य ग्रहण में 4 प्रहर पहले से अन्नादि का ग्रहण बाल, वृद्ध व रोगियों को छोड़कर नहीं करना चाहिए।

प्राचीन धर्मशास्त्रों में ग्रहण को बहुत ही महत्व दिया गया है। कहा गया है कि ग्रहण में किया गया सभी दान भूमि दान तुल्य, समस्त ब्राह्मण ब्रह्म के समान और समस्त जल गंगाजल के बराबर होता है।

इन्दोर्लक्षगुणं पुण्यं रवेर्दशगुणं तु तत:।
गंगादि तीर्थ सम्प्राप्तौ प्रौक्तं कोटिगुणं भर्वे।।

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