भौम प्रदोष 2020 आज : जानें पुरुषोत्तम मास में प्रदोष की महिमा

अधिकमास में आने वाला प्रदोष कई कारणों से विशेष...

By: दीपेश तिवारी

Published: 29 Sep 2020, 03:09 AM IST

सनातन धर्म में प्रदोष व्रत का अपना खास महत्व है। ऐसे में अधिकमास में आने वाला प्रदोष कई कारणों से ज्यादा ही विशेष कहलाता है। दरअसल अधिकमास जिसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है, इस मास के देव श्री हरि विष्णु माने गए हैं। वहीं इस समय प्रदोष का होना काफी खास है, एक ओर जहां भगवान शिव भगवान विष्णु को अपना आराध्य मानते हैं वहीं विष्णु जी भी अपने अवतारों में भगवान शिव को अपना प्रभु माना है।

ऐसे में भगवान विष्णु के माह में प्रदोष का होना भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अत्यंत खास माना जाता है। वहीं इस पुरुषोत्तम मास में प्रदोष व्रत 29 सितंबर, मंगलवार को है। मंगलवार के दिन पड़ने के कारण यह भौम प्रदोष व्रत भी कहा गया है। माना जाता है कि इस व्रत को रखने से व्यक्ति को आरोग्य की प्राप्ति होती है।

प्रदोष व्रत को हम त्रयोदशी व्रत के नाम से भी जानते हैं। यह व्रत माता पार्वती और भगवान शिव को समर्पित होता है। पुराणों के अनुसार इस व्रत को करने से बेहतर स्वास्थ और लम्बी आयु की प्राप्ति होती है। शास्त्रों के अनुसार प्रदोष व्रत एक साल में कई बार आता है। प्रायः यह व्रत महीने में दो बार आता है।

ऐसे समझें प्रदोष...
मान्यता है कि चंद्रदेव ने सबसे पहले शिव कृपा दिलाने वाले प्रदोष को किया था। हिंदू पंचांग के अनुसार, त्रयोदशी तिथि के दिन प्रदोष व्रत पड़ता है। किसी भी दिन सूर्यास्त और रात्रि के संधिकाल को प्रदोष कहते हैं। प्रदोष काल में की जाने वाली शिव साधना अत्यंत ही शुभ और फलदायी मानी जाती है।

इस भौम प्रदोष : शुभ मुहूर्त...
प्रदोष व्रत पर भगवान शिव के पूजन का शुभ प्रदोष काल- 29 सितंबर, मंगलवार को 06:09 PM से 08:34 PM तक का है।

भौम प्रदोष महत्व
भौम प्रदोष के दिन यदि जातक भगवान शंकर की विधिवत पूजा करें तो जीवन में कर्ज से कभी परेशानी नहीं होती और ना ही कभी धन की कमी होती है. अगर कर्ज तले दबे हुए हैं तो भौम प्रदोष व्रत करना लाभदायी हो सकता है।इस दिन व्रत रखने से हर तरह के रोगों से मुक्ति मिलती है और स्वास्थ सम्बन्धी समस्याएं नहीं होती। बुधवार के दिन इस व्रत को करने से हर तरह की कामना सिद्ध होती है।

अलग-अलग तरह के प्रदोष व्रत और उनसे मिलने वाले लाभ
प्रदोष व्रत का अलग-अलग दिन के अनुसार अलग-अलग महत्व है। ऐसा कहा जाता है कि जिस दिन यह व्रत आता है उसके अनुसार इसका नाम और इसके महत्व बदल जाते हैं।

अलग-अलग वार के अनुसार प्रदोष व्रत के लाभ-

: जो उपासक रविवार को प्रदोष व्रत रखते हैं, उनकी आयु में वृद्धि होती है अच्छा स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है।
: सोमवार के दिन के प्रदोष व्रत को सोम प्रदोषम या चन्द्र प्रदोषम भी कहा जाता है और इसे मनोकामनायों की पूर्ती करने के लिए किया जाता है।
: जो प्रदोष व्रत मंगलवार को रखे जाते हैं उनको भौम प्रदोषम कहा जाता है। इस दिन व्रत रखने से हर तरह के रोगों से मुक्ति मिलती है और स्वास्थ सम्बन्धी समस्याएं नहीं होती। बुधवार के दिन इस व्रत को करने से हर तरह की कामना सिद्ध होती है।
: बृहस्पतिवार के दिन प्रदोष व्रत करने से शत्रुओं का नाश होता है।
: वो लोग जो शुक्रवार के दिन प्रदोष व्रत रखते हैं, उनके जीवन में सौभाग्य की वृद्धि होती है और दांपत्य जीवन में सुख-शांति आती है।
: शनिवार के दिन आने वाले प्रदोष व्रत को शनि प्रदोषम कहा जाता है और लोग इस दिन संतान प्राप्ति की चाह में यह व्रत करते हैं। अपनी इच्छाओं को ध्यान में रख कर प्रदोष व्रत करने से फल की प्राप्ति निश्चित हीं होती है।

भौम प्रदोष व्रत विधि...
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें. भगवान शिव का पूजन करें. व्रत का संकल्प लें. दिन भर व्रत रखें. इसकी मुख्य पूजा शाम को प्रदोष काल में होती है. इसलिए शाम को फिर स्नान करें. भगवान शिव का पूजन करें. प्रदोष व्रत की कथा सुनें या पढ़ें. ॐ नम: शिवाय मंत्र का जप करें. भगवान शिव के साथ मां पार्वती का भी पूजन करें. भगवान शिव को फल एवं मिष्ठान चढ़ाएं.

प्रदोष व्रत के नियम व विधि...
शाम का समय प्रदोष व्रत पूजन समय के लिए अच्छा माना जाता है क्यूंकि हिन्दू पंचांग के अनुसार सभी शिव मन्दिरों में शाम के समय प्रदोष मंत्र का जाप करतेहैं।

: प्रदोष व्रत करने के लिए सबसे पहले आप त्रयोदशी के दिन सूर्योदय से पहले उठ जाएं।
: स्नान आदि करने के बाद आप साफ़ वस्त्र पहन लें।
: उसके बाद आप बेलपत्र, अक्षत, दीप, धूप, गंगाजल आदि से भगवान शिव की पूजा करें।
: इस व्रत में भोजन ग्रहण नहीं किया जाता है।
: पूरे दिन का उपवास रखने के बाद सूर्यास्त से कुछ देर पहले दोबारा स्नान कर लें और सफ़ेद रंग का वस्त्र धारण करें।
: आप स्वच्छ जल या गंगा जल से पूजा स्थल को शुद्ध कर लें।
: अब आप गाय का गोबर ले और उसकी मदद से मंडप तैयार कर लें।
: पांच अलग-अलग रंगों की मदद से आप मंडप में रंगोली बना लें।
: पूजा की सारी तैयारी करने के बाद आप उतर-पूर्व दिशा में मुंह करके कुशा के आसन पर बैठ जाएं।
: भगवान शिव के मंत्र ऊँ नम: शिवाय का जाप करें और शिव को जल चढ़ाएं।

ऐसे समझें प्रदोष व्रत...
प्रत्येक महीने की कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष को त्रयोदशी मनाते है। प्रत्येक पक्ष की त्रयोदशी के व्रत को प्रदोष व्रत कहा जाता है। सूर्यास्त के बाद और रात्रि के आने से पहले का समय प्रदोष काल कहलाता है। इस व्रत में भगवान शिव कि पूजा की जाती है। हिन्दू धर्म में व्रत, पूजा-पाठ, उपवास आदि को काफी महत्व दी गयी है। ऐसा माना जाता है कि सच्चे मन से व्रत रखने पर व्यक्ति को मनचाहे वस्तु की प्राप्ति होती है। वैसे तो हिन्दू धर्म में हर महीने की प्रत्येक तिथि को कोई न कोई व्रत या उपवास होते हैं लेकिन लेकिन इन सब में प्रदोष व्रत की बहुत मान्यता है।

शास्त्रों के अनुसार महीने की दोनों पक्षों की त्रयोदशी तिथि में शाम के समय को प्रदोष कहा गया है। ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव प्रदोष के समय कैलाश पर्वत स्थित अपने रजत भवन में नृत्य करते हैं। इसी वजह से लोग शिव जी को प्रसन्न करने के लिए इस दिन प्रदोष व्रत रखते हैं। इस व्रत को करने से सारे कष्ट और हर प्रकार के दोष मिट जाते हैं। कलयुग में प्रदोष व्रत को करना बहुत मंगलकारी होता है और शिव कृपा प्रदान करता है। सप्ताह के सातों दिन किये जाने वाले प्रदोष व्रत का विशेष महत्व है। प्रदोष को कई जगहों पर अलग-अलग नामों द्वारा जाना जाता है। दक्षिण भारत में लोग प्रदोष को प्रदोषम के नाम से जानते हैं।

दीपेश तिवारी
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