वट सावित्री व्रत: वट वृक्ष के नीचे बैठकर पढ़ें पौराणिक कथा, मनोकामनाएं होंगी पूर्ण

वट सावित्री के व्रत के दिन बरगद पेड़ के नीचे बैठकर पूजन, व्रत कथा सुनने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं

By: Tanvi

Updated: 03 Jun 2019, 10:29 AM IST

वट सावित्री व्रत के दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र की कामना करती है और बरगद के पेड़ की पूजा कर परिक्रमा करती हैं। वट सावित्री व्रत बहुत ही खास पर्व माना जाता है। कहा जाता है इससे पति को दीर्घायु होने का आशीर्वाद तो प्राप्त होता ही है इसके साथ परिवार में हमेशा ही सुख शांति बनी रहती है। इस व्रत में वट वृक्ष का बहुत महत्व माना जाता है क्योंकि पुराणों के अनुसार वट वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु व महेश तीनों का वास है। इस साल वट सावित्री व्रत 3 जून को मनाया जा रहा है।

 

vat savitri vrat

इस दिन महिलाएं वट वृक्ष के नीचे होती है। एक बांस की टोकरी में सात तरह के अनाज रखती हैं और दूसरी बांस की टोकरी में देवी सावित्री की प्रतिमा रखी जाती है। वट वृक्ष पर महिलायें जल चढ़ा कर कुमकुम, अक्षत चढ़ाती हैं। फिर सूत के धागे से वट वृक्ष को बांधकर उसके सात चक्‍कर लगाती हैं। सभी महिलायें वट सावित्री की कथा सुनती हैं और चने गुड़ का प्रसाद एक दूसरे को बांटती हैं।

वट सावित्री व्रत का महत्व

इस व्रत में बरगद पेड़ के चारों ओर घूमकर रक्षा सूत्र बांधा और आशीर्वाद मांगा। इस अवसर पर सुहागिनों एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। इसके अलावा पुजारी से सत्यवान और सावित्री की कथा सुनती हैं। नवविवाहिता सुहागिनों में पहली बार वट सावित्री पूजा का अलग ही उत्साह रहता है।

वट सावित्री के व्रत के दिन बरगद पेड़ के नीचे बैठकर पूजन, व्रत कथा सुनने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस व्रत में महिलाएं सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं। वट वृक्ष के नीचे बैठकर ही सावित्री ने अपने पतिव्रत से पति सत्यवान को दोबारा जीवित कर लिया था। दूसरी कथा के अनुसार मार्कण्डेय ऋषि को भगवान शिव के वरदान से वट वृक्ष के पत्ते में पैर का अंगूठा चूसते हुए बाल मुकुंद के दर्शन हुए थे, तभी से वट वृक्ष की पूजा की जाती है। वट वृक्ष की पूजा से घर में सुख-शांति, धनलक्ष्मी का भी वास होता है। वट वृक्ष रोग नाशक भी है। वट का दूध कई बीमारियों से हमारी रक्षा करता है।

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वट सावित्री व्रत कथा

बहुत पहले की बात है अश्‍वपति नाम का एक सच्चा ईमानदार राजा था। उसकी सावित्री नाम की बेटी थी। जब सावित्री शादी के योग्‍य हुई तो उसकी मुलाकात सत्‍यवान से हुई। सत्‍यवान की कुंडली में सिर्फ एक वर्ष का ही जीवन शेष था। सावित्री पति के साथ बरगद के पेड़ के नीचे बैठी थी। सावित्री की गोद में सिर रखकर सत्‍यवान लेटे हुए थे। तभी उनके प्राण लेने के लिये यमलोक से यमराज के दूत आये पर सावित्री ने अपने पति के प्राण नहीं ले जाने दिए। तब यमराज खुद सत्‍यवान के प्राण लेने के लिए आते हैं।

सावित्री के मना करने पर यमराज उसे वरदान मांगने को कहते हैं। सावित्री वरदान में अपने सास-ससुर की सुख शांति मांगती है। यमराज उसे दे देते हैं पर सावित्री यमराज का पीछा नहीं छोड़ती है। यमराज फिर से उसे वरदान मांगने को कहते हैं। सावित्री अपने माता पिता की सुख समृद्धि मांगती है। यमराज तथास्‍तु बोल कर आगे बढ़ते हैं पर सावित्री फिर भी उनका पीछा नहीं छोड़ती है। यमराज उसे आखिरी वरदान मांगने को कहते हैं तो सावित्री वरदान में एक पुत्र मांगती है। यमराज जब आगे बढ़ने लगते हैं तो सावित्री कहती हैं कि पति के बिना मैं कैसे पुत्र प्राप्ति कर स‍कती हूं। इसपर यमराज उसकी लगन, बुद्धिमत्‍ता देखकर प्रसन्‍न हो जाते हैं और उसके पति के प्राण वापस कर देते हैं।

 

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