VIDEO: चूड़ियों के लिए ही नहीं, बीमारियों की रामबाण दवा "लहसुन" करने में भी आगे है यह जिला, देश के कोने—कोने में होती है सप्लाई

VIDEO: चूड़ियों के लिए ही नहीं, बीमारियों की रामबाण दवा
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Amit Sharma | Publish: May, 04 2019 10:41:28 AM (IST) | Updated: May, 04 2019 12:14:18 PM (IST) Firozabad, Firozabad, Uttar Pradesh, India

— लहसुन व्यापारियों को फसल का नहीं मिल पा रहा सही दाम, अब सरकार पर जता रहे भरोसा।

Update

फिरोजाबाद। फिरोजाबाद केवल सुहाग की चूड़ियों के लिए ही नहीं बल्कि बीमारियों में रामबाण का इलाज करने वाले लहसुन पैदा करने के लिए भी जाना जाता है। यहां का लहसुन उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में ही नहीं बल्कि देश के कोने—कोने में सप्लाई किया जाता है। लहसुन को जगह—जगह पहुंचाने वाले किसान सरकार की उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं। इसके चलते उन्हें लहसुन की फसल का सही दाम नहीं मिल पा रहा है। किसानों ने सरकार से इस ओर ध्यान देने की मांग की है।

 

 

जसराना क्षेत्र में होता है लहसुन
जसराना क्षेत्र के गांव नगला कैंकन निवासी लहसुन पैदा करने वाले किसान विशुन दयाल कहते हैं कि हमारे क्षेत्र में करीब 70 प्रतिशत लहसुन की खेती होती है। यहां का लहसुन उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों के अलावा देश के कोने—कोने में जाता है। यहां के अधिकतर किसान लहसुन की खेती पर ही निर्भर हैं। वह लहसुन की खेती करने के बाद उसे बाहर भेजते हैं। किराया भाड़ा भी अधिक लग जाता है।

कई रोगों में कारगर है लहसुन
सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र अधीक्षक डॉ. संजीव वर्मा ने बताया कि लहसुन के सेवन से हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा, सैक्स रोग समेत विभिन्न बीमारियों में इसका उपयोग किया जाता है। किसानों का कहना है कि लहसुन करने वाले किसानों को राहत देने के लिए सरकार को सोचना चाहिए। जिस प्रकार गेहूं का समर्थन मूल्य घोषित किया गया है। उसी प्रकार लहसुन का भी समर्थन मूल्य घोषित किया जाए। जिससे लहसुन व्यापारियों और किसानों को राहत मिल सके।

अभी यह है बाजार भाव
किसान भाव सिंह ने बताया कि अभी मंडी में लहसुन की कीमत 50 से 80 रुपए है। समर्थन मूल्य घोषित न होने से लहसुन किसानों को उनकी लागत भी नहीं मिल पा रही है। सरकार द्वारा लहसुन का निर्धारित मूल्य इस प्रकार घाोषित किया जाना चाहिए कि किसान समीप ही मंडियों में उसे बेचकर लाभ कमा सकें। उन्हें दूर दराज न जाना पड़े। एक बीघा लहसुन में करीब 10 हजार रूपए का खर्चा आता है। इसी के हिसाब से सरकार को समर्थन मूल्य घोषित किया जाना चाहिए।

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