इतिहास के पन्नों से: 'सोने की चिड़िया' और 'सुहागनगरी' का जिक्र रुस्तम उस्ताद के बिना अधूरा है...

Amit Sharma

Publish: May, 17 2018 09:25:17 PM (IST)

Firozabad, Uttar Pradesh, India
इतिहास के पन्नों से: 'सोने की चिड़िया' और 'सुहागनगरी' का जिक्र रुस्तम उस्ताद के बिना अधूरा है...

सौ साल पहले रूस्तम उस्ताद नामक व्यक्ति ने शुरू किया था चूड़ी का कारोबार, उस समय सुहागनगरी की नालियों में बहता था सोना।

फिरोजाबाद। फिरोजाबाद से सुहागनगरी बनने की कहानी करीब सौ साल पुरानी है। रूस्तम उस्ताद नामक व्यक्ति ने फिरोजाबाद में चूड़ी बनाने का काम शुरू किया था। एक कोयले की भट्टी से शुरू हुआ चूड़ी का कारोबार आज सैकड़ों कारखानों में संचालित होता है। फिरोजाबाद की चूड़ियां केवल भारत में ही नहीं बल्कि देश विदेश में भी सुप्रसिद्ध हैं।

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राजस्थान और महाराष्ट्र से आता है कच्चा माल

चूड़ियों को बनाने के लिए कच्चा माल राजस्थान और महाराष्ट्र से आता है। इस कच्चे माल को भट्टियों के द्वारा पकाकर चूड़ियां तैयार करने का काम किया जाता है। कांच बनाने में रेता, सोडा और कलई का प्रयोग होता है। रेता एक रेतीला पदार्थ है जिसमें मिट्टी का अंश कम और पत्थर का अधिक होता है। यह दानेदार होता है। कहीं कहीं यह पत्थर को पीसकर भी बनाया जाता है। कांच बनाने के काम में आने वाला रेता भारत के कई प्रांतों में मिलता है। राजस्थान, मध्यभारत, हैदराबाद, महाराष्ट्र आदि। राजस्थान में कोटा , बूंदी और जयपुर की पहाड़ियों में अधिक मिलता है। राजस्थान में बसई के आस-पास मिलने वाले रेता में .046 प्रतिशत लौह का समावेश होता है और बूंदी के रेतों में .6 तक का कम लौहवाला रेता सफेद कांच और अधिक लौहवाला रंगीन कांच बनाने के काम में आता है।

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बहु रंग कांच की चूड़ियां

कांच में सफाई लाने के लिये सोडियम नाइट्रेट, कलमी शोरा, अथवा सुहागा का प्रयोग होता है। कलमी शोरा फर्रुखाबाद, जलेसर और पंजाब में मिलता है। सुहागा, जिसे बोरैक्स कहते हैं। यह अमेरिका से मंगाया जाता है। तीनों पदार्थ 1 मन रेता, 18 सेर सोडा और 3 सेर कलई के अनुपात से मिलाए जाते हैं। मिश्रण बड़ी बड़ी नादों में भर दिया जाता है। यह नांदें प्रांरभ में जापान से आती थीं। अब भारतवर्ष में बनने लगी हैं। इनमें वर्न एंड कंपनी जबलपुर से आनेवाली ईंटों का चूरा और दिल्ली से आने वाली एक विशेष प्रकार की मिट्टी का प्रयोग होता है। वर्न कंपनी, जबलपुर की ईंटों से ही कांच गलाने की भट्टी तैयार की जाती है।

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ऐसे बनती है चूड़ी

कांच निकालने से चूड़ी बनाने तक का सभी काम गरम काम कहलाता है। लबिया से जब गला कांच निकाला जाता है तो प्रारंभ में उसके किनारे पर थोड़ा कांच आता है। इसको थोड़ा ठंढा करके गोल सा कर लिया जाता है जिससे लबिया की नोंक पर एक घुंडी बन जाती है। घुंडी सहित लबिया दूसरे मजदूर को दे दी जाती है। वह पुनः उस घुंडी से कांच निकालता है। अबकी बार अधिक कांच आता है। इसे बबल कहते हैं। बबल तीसरे मजदूर को दे दिया जाता है। यह इसकी सहायता से पुनः कांच को पॉट से निकालता है। अबकी बार कांच और अधिक आता है। इसको लोम कहते हैं। लोमवाला मजदूर लोम को ले जाकर लोम बनाने वाले व्यक्ति को दे देता है। वह कांच को थोड़ा ठंडा करके एक फुट वर्ग के चार सूत मोटे लोहे के टुकड़े पर खुरपी जैसे लोहे के दस्ते से उसे गोपुच्छाकार बनाता है। यहां से चूड़ी निर्माण की वास्तविक क्रिया प्रारंभ होती है।

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ऐसे बनती हैं रंगीन चूड़ियां

अधिकतर चूड़ी रंगीन बनती है। किसी किसी चूड़ी में अनेक रंग होते हैं। चूड़ी के रंग इसी लोम पर दिए जाते हैं। यदि चूड़ी के भीतर रंग देना हो तो बबल पर दूसरे रंग की बत्ती लगाकर लोम उठाई जायगी ओर यदि ऊपर रंग देना होता है तो अन्य रंग की बत्तियां लोम पर लगाई जाती हैं। चूड़ी में जितने रंग डालने होते हैं उतने ही रंगों की अलग अलग बत्तियां लोम पर लगा दी जाती हैं। बत्ती लगाने के लिये कारीगर अलग होता है। बत्ती लगाने से लेकर आगे काम करने वाले मजदूर प्रशिक्षित होते हैं। रंगीन बत्ती एक सी लगे यही कारीगरी है। लोम बनाते समय जिस प्रकार चूड़ी के रंग निश्चित होते हैं उसी प्रकर उसका आकार भी निश्चित होता है। गोल चूड़ी के लिये लोम बनानी होगी, चैकोर आदि के लिये चैकोर आदि। गोलाई में लोम का जिस प्रकार का आकार होगा उसी प्रकर का आकार चूड़ी का होगा।

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तार बनने योग्य हो जाता है लोम

सिंकाई होने के बाद लोम तार बनने योग्य हो जाती है। लोम लेने वाला मजदूर सिंकाई भट्ठी से उसे लेकर तार लगाने वाले को देता है। तार लगाने वाला 25 से 40 रुपए प्रति दिन तक मजदूरी पाने वाला कारीगर है। चूड़ी बनाने वाले कारीगरों में सबसे अधिक वेतन पाने वाला यही व्यक्ति है। यही कांच की चूड़ी को प्रांरभिक रूप प्रदान करता है। तार लगाने वाले के अतिरिक्त दूसरा कारीगर बेलन चलाने वाला होता है। इसे बिलनियां कहते हैं। बेलन लोहे का होता है जिसमेें चूड़ियों के खाने बने होते हैं, एक बेलनियांं बेलन को एक ही निरंतर चाल से दो घंटे तक चलाता है। फिरते हुए बेलन पर तार लगाने वाला चूड़ी का तार खींचता है। तार खींचने की विशेषता यह हेती है कि उसकी मोटाई और गोलाई में समानता रहनी चाहिए।

आज हैं करीब 160 कारखाने

वर्तमान में फिरोजाबाद के अंदर करीब 160 कारखाने संचालित हैं। पहले कोयले की भट्टी में काम किया जाता था। अब गैस की भट्टियों से चूड़ी बनाने का काम किया जा रहा है। बताया जाता है कि पहले सोने की कमी नहीं थी। देश को सोने की चिड़िया कहा जाता था। इसलिए हिल्ल की चूड़ियां बनाई जाती थीं। इनमें सोना लगाया जाता था। सोना उस समय नालियों में बहता था। वर्ष 1995 में फिरोजाबाद के अंदर गैस आ गई थी। इन कारखानों में तकरीबन ढाई से तीन लाख मजदूर काम करते हैं।

महाराष्ट्र में बनाने गए थे चूड़ी

करीब 18 साल पहले शहर के सत्यप्रकाश मित्तल उर्फ सत्तो लाला फिरोजाबाद से कारीगर लेकर महाराष्ट्र चूड़ी का कारोबार शुरू करने गए थे लेकिन सफलता न मिलती देख वापस आ गए थे। वर्तमान में ओमप्रकाश बंसल, बालकिशन गुप्ता, सुरेश चन्द्र, राजकुमार मित्तल, ईकरी खानदान, पम्मी मित्तल, देवीचरन अग्रवाल प्रमुख उद्यमी हैं।

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