# पत्रिका सरोकार - एक दो फुट जमीन बढ़ाने के चक्कर में बरसों पुराने पेड़ों का कत्लेआम

शासन प्रशासन नहीं कर रहा कार्रवाई : आए दिन कट रहे सैकड़ों वृक्ष

By: arun shrivastava

Published: 27 Nov 2019, 05:53 PM IST

सालीचौका-गाडरवारा। एकओर अनेक संस्थाओं नागरिकों द्वारा प्रकृति को हरियाली चुनर ओढ़ाने के लिए समय समय पर पौधारपेण किया जाता है। दूसरी ओर पेड़ों का कत्लेआम भी जारी है। बढ़ते प्रदूषण को रोकने में पेड़ काफी हद तक मददगार होते हैं। लेकिन कुछ लोग अपने स्वार्थ के लिए तो कई जगह विकास के नाम पर हरे भरे पेड़ काट दिए जाते हैं।
इसी प्रकार जिला प्रशासन की लचर कार्यप्रणाली का परिणाम है कि लगातार मीडिया की सुर्खियों में आए दिन पेड़ों का कत्लेआम होने की खबरें छप रही हैं। उसके बावजूद पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए किसी भी प्रकार की कोई गाइड लाइन जिला प्रशासन द्वारा नहीं बनाई गई। जिसके चलते कुछ कृषक अपने ही खेत में एक- दो फुट जगह बढ़ाने के लालच में बरसों पुराने वृक्षों का खुलेआम कत्लेआम कर रहे हैं। वहीं किसी के रोकने पर यह किसान सीना तान के बोलते हैं, तुम्हारा क्या जा रहा है। हमारी लगानी जमीन के हम अपने यह वृक्ष काट रहे हैं। जबकि शासन, प्रशासन के नियम हैं यदि कोई भी बरसों पुराना पेड़ काटा जाता है तो उसके लिए प्रशासन से अनुमति ली जाती है और संबंधित पेड़ काटने की वजह भी बताई जाती है। लेकिन सालीचौका क्षेत्र में न तो वजह है और न शिकायत। प्रशासनिक उदासीनता के चलते लोग सरेआम प्रतिदिन बड़े, बड़े पेड़ों का कत्लेआम कर रहे हैं। जिसके चलते क्षेत्र की फिजाओं रुख तो बदलेगा ही, आने वाली पीढिय़ों के लिए भी यह बड़ा दुखदाई होगा। वहीं इस कुछ समाजसेवी संस्थाएं पौधारोपण कर रही हैं। कुछ ऐसे भी समाज सेवी हैं जो प्रतिदिन एक पेड़ लगा रहे हैं। लेकिन पर्यावरण के दुश्मन कुछ लोग प्रतिदिन बड़े, बड़े वृक्षों को काटकर शासन प्रशासन के नियमों कानूनों की धज्जियां उड़ाई जा रहे हैं। जनहित में लोगों की मांग है इस गंभीर समस्या को लेकर जिला प्रशासन को सख्त निर्देश जारी करना होगा कि कोई भी कृषक या आम व्यक्ति अगर वृक्ष की एक टहनी भी काटता है तो उस पर भी सख्त कार्रवाई की जा। तभी सही मायनों में पर्यावरण प्रदूषण को बचाया जा सकता है।
सड़क किनारे से कम हो रहे हरे पेड़
अब से लगभग डेढ़ दो दशक पहले नगर से बस द्वारा पिपरिया, सांईखेड़ा या करेली-नरसिंहपुर जाने पर सड़क किनारे इतने हरे पेड़ रहते थे कि गर्मी के दिनों में लगभग पूरी सड़क पर छाया बनी रहती थी। इनमें सबसे अधिक आम के पेड़ होते थे। आज भी कुछ सड़कों किनारे ऐसे पेड़ बचे हुए हैं। बताया जाता है इन पेड़ों को काटने के लिए समीपी किसान एवं ग्रामीण पहले पेड़ की जड़ में केमिकल, हींग आदि रख देते हैं। पेड़ सूखने पर उसे धीरे धीरे काट दिया जाता है। कई बार सूखा पेड़ कई दिनों तक खड़ा रहता है एवं सड़क किनारे हादसों को दावत देता रहता है।
खुलेआम होता कटे पेड़ों का परिवहन
न केवल स्वार्थ के लिए पेड़ काटे जा रहे हैं, बल्कि रोजाना गाडरवारा नगर से दिन दहाड़े कटे पेड़ लादे ट्रेक्टर ट्रालियों को दौड़ते देखा जा सकता है। ईंट भटठों, इमारती कामकाज एवं जलाने के लिए लकड़ी की पूर्ति पेड़ों से ही होती है। बहरहाल लोगों का कहना है पर्यावरण का सही मायने में संरक्षण तभी हो सकता है जब लोग एक एक पेड़ की कीमत पहचानें, यदि कोई पेड़ काटना भी पड़े तो नियमानुसार विधिवत प्रशासन की अनुमति लेकर काटें एवं एक पेड़ के बदले में दो पेड़ लगाएं।
कलेक्टर को दी जानकारी
इस बारे में जिला कलेक्टर दीपक सक्सेना को यह बताने पर कि सालीचौका क्षेत्र के कई किसान अपनी एक दो फुट जमीन बढ़ाने के चक्कर में बड़े, बड़े वृक्षों का कत्लेआम कर रहे हैं। उन्होंने पूछा कटे हुए पेड़ कौन से हैं। उन्हे बताया गया अधिकतर पेड़ महुआ और बबूल के हैं। इस पर कलेक्टर दीपक सक्सेना ने इसकी जांच कराने का आश्वासन दिया।

arun shrivastava Reporting
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