ओशो मृत्यु महोत्सव पर तीन दिवसीय ध्यान शिविर संपन्न

आध्यात्मिक यात्रा में जबलपुर का अहम योगदान

गाडरवारा। विश्व प्रसिद्ध दार्शनिक एवं आध्यात्मिक गुरु रजनीश ओशो की क्रीड़ा स्थली, स्थानीय ओशो लीला आश्रम में ओशो के मृत्यु महोत्सव अवसर पर तीन दिवसीय ध्यान शिविर का 18, 19 एवं 20 जनवरी को शिविर संचालक स्वामी ध्यान पुलक के सानिध्य में आयोजन हुआ। जिसमें बाहर से आए तथा स्थानीय ओशो सन्यासियों ने ओशो की विविध ध्यान विधियों को साक्षी भाव से आत्मसात कर आनंद लिया। शिविर में मुख्य रूप से 19 जनवरी को ओशो के मृत्यु महोत्सव पर भोपाल यूनिवर्सिटी से दर्शनशास्त्र के एचओडी प्रो. डॉक्टर जेएस दुबे ने ओशो और शिक्षा पर एक सेमिनार में निजी स्कूली शिक्षक एवं उपस्थित ओशो सन्यासियों को संबोधित करते हुए बताया कि ओशो से ऐसा कोई विषय अछूता नहीं रह गया, जिस पर उन्होंने अपनी किताबें लिखी एवं सटीक एवं तार्किक प्रसंग भी किए। हमारा उद्देश्य है कि लोगों में जनचेतना जागृत हो और ओशो के प्रति उनकी अवधारणा बदल, समाज में अध्यात्म को नई परिभाषा के रूप में जान सकें। वर्तमान परिवेश में पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की जरूरत है। ताकि बच्चों में मौलिक ज्ञान के साथ ही रचनात्मकता मिल सके। हम देश के अनेकों स्थानों पर सेमिनार एवं वर्कशॉप कर चुके हैं। आगामी मई, जून माह में भोपाल, सागर, जबलपुर गाडरवारा एवं कुचवाड़ा आदि स्थानों पर बड़े सेमिनार आयोजित करेंंगे। शिविर में ओशो प्रवचन माला से जन्म और मृत्यु महोत्सव अंश की देशना बताई गई। ओशो का मानना है कि जिस तरह जन्म होने पर उत्सव मनाते हैं उसी तरह मृत्यु को भी महोत्सवमय मनाया जाना चाहिए। कम से कम एक अवस्था के बाद जरूर। क्योंकि जन्म और मृत्यु के बीच जीवन होता है जीवन भी तब तक जब तक शरीर में सांसें हैं सांसे समाप्त शरीर नश्वर ब्रह्मलीन हो जाता है। यही कारण है कि जीवन में सांसों का बड़ा महत्व होता है। ध्यानी के लिए सांस ही मूल मंत्र होता है।
आध्यात्मिक यात्रा में जबलपुर का अहम योगदान
रजनीश चंद्र जैन(ओशो) का जन्म पिता बाबूलाल एवं माता सरस्वती जैन के यहां रायसेन जिले के कुचवाड़ा गांव में 11 दिसंबर 1931 को हुआ था। पांंच साल की अवस्था में उन्हे गाडरवारा लाया गया। सहीं हायर सेकेंडरी तक शिक्षा प्राप्त की और उनकी अनेकों क्रीड़ा लीलाएं करने से नगर को ओशो की क्रीड़ा स्थली के नाम से जानते हैं। ओशो ने बचपन से ही अद्भुत मृत्यु प्रयोग ध्यान साधना करना शुरू कर दिया था। उन्हें 14 वर्ष की बाल अवस्था में ही वर्तमान ओशो लीला आश्रम प्रांगण में मृत्यु बोध हुआ था, यहीं संबोधि स्थली का निर्माण किया गया है। जिसके बाद 21 वर्ष की आयु में जबलपुर के भंवरताल स्थित बोधि वृक्ष के नीचे मूल संबोधि घटित हुई थी। जहां से उनकी आध्यात्मिक यात्रा का शुभारंभ हुआ। ओशो रजनीश ने अपनी आध्यात्मिक यात्रा में जबलपुर का महत्वपूर्ण योगदान माना है। यहीं से उन्होंने प्रवचन देना शुरू किया था। फिर आध्यात्मिक यात्रा आगे बढ़कर मुंबई इंटरनेशनल कम्यून पुणे, अमेरिका के ओरेगान के साथ ही विश्व पटल पर स्वर्णिम ख्याति अर्जित की। उनकी मृत्यु 19 जनवरी 1990 में पुणे इंटरनेशनल कम्यून में हुई जिनकी अंतिम यात्रा महोत्सवमय मनाई गई। इसीलिए 19 जनवरी को महापरिनिर्वाण एवं मृत्यु महोत्सव के रूप में मनाया जाता है।

arun shrivastava Reporting
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