scriptHoli celebrated after Ravana Dahan in this village | ऐसा गांव जहां रावण दहन के बाद मनाई जाती  होली, रामलीला का मंचन ना होने पर दैवीय प्रकोप से परेशान होते गांव वासी | Patrika News

ऐसा गांव जहां रावण दहन के बाद मनाई जाती  होली, रामलीला का मंचन ना होने पर दैवीय प्रकोप से परेशान होते गांव वासी

Holi एक ऐसा गांव जहां करीब 500 वर्षों से नवरात्र पर्व पर नहीं बल्कि होली त्यौहार से पूर्व रामलीला का मंचन किया जाता है । यहां पर रावण दहन के बाद ही होलिका दहन होती है । ऐसी लोक परंपराएं व धार्मिक मान्यता है कि एक बार विपरीत परिस्थितियों में रामलीला का मंचन नहीं हो सका। तो अचानक लगी आग से गांव के कई दर्जन घर जलकर खाक हो गए । तथा गांव के अधिकांश लोग गंभीर बीमारियों से ग्रसित हो गए ।

गोंडा

Published: March 05, 2022 05:49:10 pm

गोंडा जनपद के हलधर मऊ विकासखंड की ग्राम पंचायत पहाड़पुर ऐसी अनोखी धार्मिक मान्यताओं को सजोए टेढ़ी नदी के तट पर बसे इस गांव के पश्चिमी छोर पर एक विशालकाय तालाब इसी तालाब के तट पर एक प्रसिद्ध राम चबूतरा बना हुआ है । गांव के लोग तालाब के उस पार खाली पड़ी जमीन को लंका मानते हैं । यहां की रामलीला की विशेषता यह है । की 10 से 15 वर्ष आयु के के बच्चे भगवान राम बनते हैं तथा 10 वर्ष की बच्चियों को सीता बनाया जाता है ।
Holi
6 अलग-अलग परिवार के लोग 200 वर्षों से निभा रहे हनुमान, अंगद, सुग्रीव, जामवंत नल व नील का किरदार

रामलीला मंचन में हनुमान जी के किरदार की भूमिका निभा रहे विनायक राम ने बताया करीब 200 वर्षों से उनके परिवार के लोग पीढ़ी दर पीढ़ी हनुमान जी का किरदार निभाते चले आ रहे हैं । अब वर्तमान समय में हुए खुद हनुमान जी के किरदार के रूप में रामलीला का मंचन करते हैं । इसी तरह से चंद्रभान शुक्ला बताते हैं उनके परिवार के लोग डेढ़ सौ वर्षों से अंगद का रोल लेते थे । अब खुद यह जिम्मेदारी संभाल रहे हैं । सुग्रीव के किरदार की भूमिका निभा रहे घनश्याम बताते हैं । सैकड़ों वर्षो से उनके पूर्वज सुग्रीव का किरदार निभाते रहे । अब रामलीला में वे इसकी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं । इसी तरह से दीपक व टिंकु पीढ़ी दर पीढ़ी नल नील का मंचन करते चले आ रहे हैं ।
5 सौ वर्षों से चली आ रही परंपरा

पहाड़पुर गांव में करीब पांच सौ वर्षों पहले से ही होली पर्व के पूर्व रामलीला का मंचन होता चला आ रहा है । इस रामलीला के मंचन में परंपरागत रूप से गांव की कुछ परिवारों के लोग पीढ़ी दर पीढ़ी से पात्र बनते चले आ रहे हैं । यहां भी मान्यता है कि जिस परिवार से जो व्यक्ति जिस किरदार की भूमिका अदा करता है। यदि उसके स्थान पर किसी दूसरे परिवार के लोगों ने उस किरदार की भूमिका निभाई तो कुछ ना कुछ अनहोनी घट जाती है।
1992 में गांव में अचानक लगी थी आग

गांव के लोग बताते हैं कि आज से 30 वर्ष पहले सन् 1992 में दैवीय प्रकोप के कारण गांव में रामलीला का कार्यक्रम रोक दिया गया। इसका नतीजा रहा कि गांव में अचानक आग लग गई और लगभग 200 घर जलकर खाक हो गए। गांव के बुजुर्ग लायक राम शुक्ल बताते हैं कि जिस तरह हनुमान जी ने लंका जलाई थी। ठीक उसी तरह रावण का किरदार निभाने वाले हनुमान प्रसाद शुक्ल का घर अचानक धू-धू कर जलने लगा। इसके बाद आग सीधे पश्चिमी छोर से पूर्वी छोर पर पहुंच गई। इस तरह गांव के सभी घर जल गए, लेकिन विभीषण का किरदार निभाने वाले निलांबुज शुक्ला का घर बच गया।
फागुन मास में होती है रामलीला

ग्रामवासी श्रीनाथ रस्तोगी बताते हैं कि रामलीला समिति के नेतृत्व में हर साल बसंत ऋतु के बाद फागुन मास में रामलीला का कार्यक्रम होता है। वर्तमान में समिति के अध्यक्ष शांतीचंद्र शुक्ला के अगुआई में रामलीला सम्पन्न हो रही है। वैसे तो पूरे रामलीला मंचन के दौरान आसपास के लोग बड़ी संख्या में जुटते हैं किन्तु लंका दहन और रावण वध के दिन यहां विशाल मेला लगता है। मेले में दूर दूर से व्यवसायी आकर दुकानें लगाते हैं। शाम चार बजे से शुरु होकर कार्यक्रम रात भर चलता हैै।
विमान उठाने को लगती होड़-

पहाड़ापुर गांव के निकट तालाब और टेढ़ी नदी के बीच बने रामलीला मैदान में ही रामलीला होती है। गांव के तमाम बुर्जुग बताते हैं कि पहले तालाब के पानी से होकर ही मैदान तक पहुंचा जा सकता था। लिहाजा गांव में ब्रहमादीन के घर से सज धज कर भगवान निकलते थे। तो उन्हें कंधे पर बिठाकर तालाब पार कराया जाता था। फिर उन्हें 15 सीढ़ी वाले एक भारी भरकम विमान में बिठाया जाता था। तब भगवान को कंधे पर बिठाने के लिए होड़ लगी रहती थी। अब छोटा सा पुल बन जाने के बाद भी यह परम्परा कायम है। अब भी भगवान को कंधे पर बिठाने और सात सीढ़ी वाले विमान को उठाने की होड़ लगती है।

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