गोरखपुर

सीएम योगी को गुरु ने सौंपी थी यह सीट, अब इसे जीतने के लिए संगठन बहा रहा पसीना

लोकसभा चुनाव

गोरखपुरMar 18, 2019 / 12:45 pm

धीरेन्द्र विक्रमादित्य

Gorakhnath mandir

लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। सारे रणनीतिकार अपनी पार्टी को जिताने में जुट गए हैं। गोरखनाथ मंदिर के प्रभाव क्षेत्र वाले गोरखपुर सीट पर सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। सीएम योगी किसी भी सूरत में यह सीट पुनः पाना चाहेंगे। जबकि महागठबंधन पर कब्जा बरकरार रख यह संदेश देना चाहेगा कि पिछड़ों-दलित की एकता हर किला फतह करने में सक्षम है।
उपचुनाव में तीन दशक बाद मंदिर के इतर कोई जीता

तीन दशक बाद गोरखपुर के सांसद का पता बीते उपचुनाव में बदला था। 1989 में अखिल भारतीय हिंदू महासभा से महंत अवेद्यनाथ सांसद बने थे, तबसे 2014 तक हुए चुनाव तक गोरखनाथ मंदिर के पीठाधीश्वर ही सांसद चुने गए। लेकिन तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद बीते साल उन्होंने संसदीय सीट से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद हुए उपचुनाव में सपा प्रत्याशी संयुक्त विपक्ष के प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में आए। भाजपा ने अपने तत्कालीन क्षेत्रीय अध्यक्ष उपेंद्र दत्त शुक्ल को चुनाव लड़ाया। उपचुनाव में संयुक्त विपक्ष की रणनीति सफल रही और भाजपा चुनाव हार गई।
मंदिर के महंतों के विजय रथ को कोई रोक नहीं पाता था

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गोरखपुर संसदीय क्षेत्र में रहने वालों का पूर्वान्चल के प्रसिद्ध पीठ गुरु गोरखनाथ मंदिर से गहरी आस्था रही है। यही वजह है कि इस मंदिर का आशीर्वाद लेकर जो भी प्रत्याशी चुनाव लड़ता रहा वह जीतता रहा। गोरखनाथ मंदिर के महंत रहे कई गुरुओं ने राजनीति में रूचि दिखाई और लोगों ने हाथोंहाथ लिया। हालांकि, आजादी मिलने के बाद शुरूआती दिनों में गोरखनाथ मंदिर के महंत दिग्विजयनाथ को हार का भी सामना करना पड़ा था। 1951 में पहला चुनाव लड़े महंत दिग्विजयनाथ को हार का सामना करना पड़ा था। पहला चुनाव वह दो जगह गोरखपुर दक्षिण और गोरखपुर पश्चिम से लड़े थे। दूसरा चुनाव महंत दिग्विजयनाथ 1962 में लड़े लेकिन कांग्रेस के सिंहासन सिंह से हार गए। 1967 में ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ पहली बार गोरखपुर से संसदीय चुनाव जीते। लेकिन वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। उनके ब्रह्मलीन होने के बाद महंत अवेद्यनाथ ने संसदीय उपचुनाव में भाग लिया। जनता ने महंत अवेद्यनाथ को भी सांसद के रूप में स्वीकार किया। संसदीय चुनाव लड़ने के दौरान महंत अवेद्यनाथ मानीराम से विधायक थे। लेकिन 1971 में महंत अवेद्यनाथ को भी संसदीय चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। कांग्रेस के नरसिंह नारायण पांडेय से हारने के बाद महंत अवेद्यनाथ ने विधानसभा की राजनीति ही करने का फैसला किया और विधायक होते रहे। 1989 में उन्होंने संसदीय राजनीति में उतरने का फिर निर्णय लिया। और अखिल भारतीय हिंदू महासभा से महंत अवेद्यनाथ फिर गोरखपुर के सांसद चुने गए। इसके बाद वह लगातार गोरखपुर संसदीय चुनाव जीतते रहे।
राजनीति से सन्यास लेकर योगी आदित्यनाथ को किया आगे

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1998 में महंत अवेद्यनाथ ने राजनीति से संन्यास लेने के बाद अपनी सीट उत्तराधिकारी योगी आदित्यनाथ को सौंप दी। 1998 में गोरखपुर से 12वीं लोकसभा का चुनाव जीतकर योगी आदित्यनाथ संसद पहुंचे तो वह सबसे कम उम्र के सांसद थे। योगी आदित्यनाथ 26 साल की उम्र में पहली बार सांसद बने थे। योगी आदित्यनाथ 1998 से लगातार गोरखपुर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। 2014 में पांचवी बार वह गोरखपुर से सांसद बने थे। लेकिन 2017 में उनके मुख्यमंत्री बनने और एमएलसी निर्वाचित होने के बाद गोरखपुर संसदीय सीट खाली थी। इस सीट पर 11 मार्च को मतदान हुआ। 14 मार्च 2018 को नया सांसद चुन लिया गया।
निषाद मतों को जोड़कर सपा जीतने में रही सफल

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गोरखपुर के समीकरण को समझे तो यहां पिछड़े व दलित वोटरों की बहुलता है। मुस्लिम समाज की भी व्यापकता इस लोकसभा क्षेत्र में है।
चूंकि, विपक्ष ने रणनीतिक रूप से निषाद पार्टी के अध्यक्ष डाॅ.संजय निषाद के पुत्र वर्तमान सांसद प्रवीण निषाद को प्रत्याशी बनाया है। ऐसे में समाजवादी पार्टी का बेस वोट यादव, बसपा का बेस वोटबैंक दलित के साथ निषाद भी संयुक्त प्रत्याशी के पक्ष में आ जाए इसकी उम्मीद विपक्ष को है। जानकार मानते हैं कि मुस्लिम समाज का अधिसंख्य हिस्सा बीजेपी के खिलाफ रहता ही है। सो, वह भी संयुक्त विपक्ष के प्रत्याशी के पक्ष में आ सकता है। हालांकि, भाजपा ने चुनाव के ऐन वक्त पहले ही निषाद समाज के कद्दावर नेता पूर्व मंत्री जमुना निषाद के परिवार को तोड़ने में सफलता हासिल कर ली है। बीते दिनों ही स्वर्गीय जमुना निषाद की पत्नी पूर्व विधायक राजमति निषाद व पुत्र अमरेंद्र निषाद भाजपाई हो गए। इसी के साथ निषाद समाज के कई नेताओं को राज्यमंत्री का दर्जा भी चुनाव के पहले दे दिया गया है। इस नए समीकरण से संभव है कि निषाद वोटरों में उहापोह की स्थिति कायम रहे और वोटों का बंटवारा हो। हालांकि, जानकार यह भी कहते हैं कि भाजपा अगर निषाद प्रत्याशी उतारते हैं तो ही वोटों में बिखराव संभव है नहीं तो निषाद वोटों को तोड़ना थोड़ा मुश्किल भरा काम होगा।
मंदिर से जुड़ा रहा है निषाद समाज

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निषाद समाज गोरखनाथ मंदिर से भी जुड़ा हुआ रहा है। 2014 लोकसभा चुनाव तक काफी संख्या में वोट योगी आदित्यनाथ को मिला था। लेकिन निषाद पार्टी के गठन व कई कद्दावर निषाद नेताओं के अन्य दलों में प्रभावी होने के बाद समीकरण काफी बदल गए हैं। जानकार मानते हैं कि उपचुनाव में मंदिर से जुड़ा कोई प्रत्याशी मैदान में नहीं था, इसलिए आस्था का कार्ड भी उपचुनाव में नहीं चला। बीजेपी की यादव से दूरी बनाए रखने से यादव वोटर भी विपक्ष के साथ खड़ा रहा। यही नहीं बीजेपी को ब्राह्मण वोटर को भी पूर्णरूप से अपने पाले में करने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ी। मंदिर व हाता के वर्चस्व को भी विपक्ष भुनाने में सफल रहा। उस पर योगी सरकार में कद्दावर ब्राह्मण नेता पूर्व मंत्री पंडित हरिशंकर तिवारी के घर पड़े छापे ने भी आग में घी का काम किया।
अभी तक किसी दल ने नहीं खोला पत्ता

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लोकसभा चुनावों का ऐलान हो चुका है। सातवें चरण में गोरखपुर संसदीय क्षेत्र में वोट पडे़ंगे। भाजपा, सपा हो या कांग्रेस अभी तक किसी दल ने साफ नहीं किया है कि उसक प्रत्याशी कौन होगा। हालांकि, महागठबंधन में गोरखपुर सीट सपा के पास है, ऐसे में समझा जा रहा है कि वह अपने सिटिंग एमपी प्रवीण निषाद को ही प्रत्याशी बनाएगी। जबकि भाजपा से यह साफ नहीं हो सका है कि वह उपेंद्र दत्त शुक्ल पर फिर दांव लगाएगी या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पंसद वाले किसी प्रत्याशी को मैदान में उतारेगी।
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