इस थाने में रहती हैं आत्माएं, लॉकअप में बंद कैदी कभी नहीं लौटा जिंदा

इस थाने में रहती हैं आत्माएं, लॉकअप में बंद कैदी कभी नहीं लौटा जिंदा
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थाने के निर्माण में ही तीन मजदूरों की ले ली बलि

गोरखपुर. कभी कभी कुछ अनहोनी घटनाएं मन को झंकझोर देने के साथ अन्धविश्वास पर सहज ही भरोसा करने को मजबूर कर देती हैं। गोरखपुर का शाहपुर थाना ऐसे ही अन्धविश्वास की चपेट में है। इस थाने के लॉकअप में अब किसी भी अपराधी को पुलिसवाले बंद नहीं करते। वजह यह कि थाने के निर्माण के बाद उस लॉकअप में जो भी रात भर उसमें रखा गया वह बंद तो ज़िंदा हुआ लेकिन बाहर निकला मुर्दा के रूप में। अव्वल यह कि ढेर सारे पुलिसवालों को अपनी वर्दी भी गंवानी पड़ी। आलम यह कि अब उस भूतहा लॉकअप में कोई अपराधी गलती से भी नहीं रखा जाता। खौफ यह कि दूसरे लॉकअप भी पुलिस वाले अकेले किसी भी बंदी को रखने से परहेज करते हैं।





थाने के निर्माण में ही तीन मजदूरों की ले ली बलि

बात 1980 की है। शाहपुर थाने का निर्माण हो रहा था। छत डालने के दौरान अचानक निर्माण कार्य भरभराकर गिर गया। मलबे में कई मजदूर दब गए जिसमें तीन की मौत हो गई। इस वारदात ने इस थाने में काले अध्याय की शुरुआत तो की ही साथ ही साथ इसे 'हॉन्टेड' बना दिया। इसके बाद तो हुई कई अनहोनी ने पुलिस को भी सहमा दिया। आलम यह कि शाहपीर थाना भूतहा थाना के रूप में प्रसिद्ध हो गया।







निर्माण के बाद ही लॉकअप में हुई दीपू की मौत, तीन ने वर्दी गवाईं
1983 में गोरखपुर के शाहपुर थाने के लॉकअप में दीपू नाम का एक युवक बंद हुआ। बताया जा रहा कि दीपू की पुलिस ने पिटाई कर लॉकअप में डाल दिया। सुबह जब देखा गया तो दीपू मृत पड़ा था। पुलिस ने इतनी भी पिटाई नहीं की थी कि दीपू की जान पर बन आये लेकिन सारे सबूत खिलाफ थे और तीन पुलिसवालों को अपनी नौकरी से हाथ धोनी पड़ी। उस घटना से अभी शाहपुर पुलिस उबरी नहीं थी कि लॉकअप में एक और जान चली गई। 1985 में राजू नाम के एक और युवक को किसी अपराध में पुलिस ने पकड़ी और उसकी पिटाई कर लॉकअप में डाल दी। राजू की भी लाश निकली। इसके बाद तो अपराधी ही नहीं पुलिस के मन में भी एक अंधविश्वास घर कर गई कि इस थाने के लॉकअप में जो भी बंद किया जाता वह ज़िंदा बाहर नहीं आता। 






2001 में अचानक से एक और मौत ने सहमा दिया

अब भूतहा थाने का लॉकअप पूरी तरह से अभिशप्त मान लिया गया था लेकिन समय के साथ इस अन्धविश्वास को लोग भूलते गए। 2001 में शाहपुर थाने की पुलिस ने फिर एक गलती दोहरा दी। राजेश शर्मा को हिरासत में लेकर पूछताछ की और लॉकअप में डाल दिया। किन्हीं परिस्थितियों में उसकी मौत हो गई। मामला तूल पकड़ा। तत्कालीन थानेदार संजय सिंह व दो सिपाहियों पर आरोप लगा और इनको जेल की हवा खानी पड़ी। 







पुलिस वालों की वर्दी का दुश्मन है यह थाना

निर्माण के साथ ही इस थाने की कहानियां भी खूब कही सुनी जाती हैं। किसी न किसी रूप में इस थाने में पुलिसवाले मुसीबत में पड़ते रहे हैं। 2003 में जन्माष्टमी का आयोजन हुआ था। शाहपुर थाने में ऑर्केस्ट्रा का आयोजन हुआ था। रीना राय नाम की ऑर्केस्ट्रा डांसर स्टेज़ पर थी। जोश में किसी सिपाही ने हवाई फायर किया लेकिन वह गोली रीना को लगी। रीना की मौत ने बवाल मचा दिया। सिपाही गिरफ्तार हुआ और आलम यह कि कोई भी पुलिसवाला यहाँ पोस्टिंग से घबराने लगा। इसके बाद 2005 में सिद्दार्थ मिश्र नाम के एक युवक को जली हालत में अस्पताल में भर्ती कराया जहाँ उसकी मौत हो गई। मृतक की माँ के अनुसार पुलिसवालों ने किराया के मामूली विवाद में पेट्रोल डाल कर उसके बेटे को जला दिया था। 
इसके बाद 2006 में शाहपुर पुलिस ने टैम्पों चोरी के आरोप में सुनील साहनी नाम के व्यक्ति को उठाया। हिरासत में सुनील की मौत हो गई। आरोप है कि लॉकअप में मौत के बाद पुलिस ने लाश को ठीकाने लगा दिया। बाद में यह मामला तूल पकड़ा। शहर में बवाल हुआ और फिर दो पुलिसवालों पर कार्रवाई हुई। 






मंदिर की हुई स्थापना
शापित थाने के रूप में प्रसिद्ध हो चुके शाहपुर थाने में पुलिसवाले पूरी तरह अंधविश्वास की चपेट में आ चुके थे। सबको अपनी वर्दी की चिंता सताने लगी। इसके बाद तय हुआ कि हनुमान जी की मंदिर की स्थापना हो। पूरे विधि विधान से थाने में हनुमान जी की मूर्ति स्थापित की गई। शाहपुर थाने पर तैनात पुलिसवाले बताते हैं कि अब उनकी दिनचर्या पूजा के साथ शुरू होती है। 






आज भी लॉकअप में कोई नहीं रखा जाता 

शाहपुर थाने के हनुमान जी की मूर्ति स्थापित होने के बाद भले ही सबकुछ ठीकठाक मान लिया गया हो लेकिन आज भी खाकी अन्धविश्वास से उबर नहीं पाई है। थाने के दीवान बताते हैं कि उस लॉकअप में अब कोई भी रखा नहीं जाता है। गलती से किसी बंदी को रखा न जाए इसलिए उसमें कबाड़ व पुरानी फाइल्स आदि रख कर भर दिया गया है। उन्होंने बताया कि इस लॉकअप के अलावा दूसरे लॉकअप में भी वह लोग किसी अपराधी को अकेले बंद नहीं करते हैं। 





थानेदार भी अपने कमरे को अपशकुनी मानते

शाहपुर थाने के निर्माण के वक़्त थानेदार के लिए भी एक कमरा बना है। लेकिन खौफ ऐसा कि वह कभी भी उसमें नहीं बैठते। कुछ दिन पहले थाना परिसर में ही एक नया भवन बना जिसमें थानेदार अब बैठते हैं।
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