गोरखनाथ खिचड़ी मेलाः आज भी कांगड़ा में ज्वाला देवी का अदहन खौल रहा बाबा गोरखनाथ के खप्पर भरने के इंतजार में

Dheerendra Vikramdittya

Publish: Jan, 14 2018 06:36:55 PM (IST) | Updated: Jan, 14 2018 06:47:07 PM (IST)

Gorakhnath, Gorakhpur, Uttar Pradesh, India

गोरखपुर। पूर्वांचल ही नहीं देश के सबसे बड़े आस्था के केंद्रों में एक गोरखनाथ मंदिर भी है। गोरखनाथ मंदिर में मकरसंक्रांति पर शुरू होने वाला खिचड़ी मेला अपने आप में अनूठा मेला है। इस खिचड़ी मेले का आदि शक्ति देवी मां के 52 स्थापित पीठों में एक ज्वाला देवी का गहरा संबंध है।
मान्यता है क? नाथ थ संप्रदाय के प्रणेता गुरुगोरक्षनाथ एक बार हिमाचल के कांगड़ा क्षेत्र में घूमते हुए जा रहे थे। जब वे ज्वाला देवी धाम को देखते हुए वहां से गुजर रहे थे, तब उन्हें देखकर ज्वाला देवी प्रकट हुई और धाम में आतिथ्य स्वीकार करने का आग्रह किया। वहां पर मद्य-मांस का भोग लगता था और गोरक्षनाथ जी योगी थे। लेकिन मां ज्वाला देवी के आग्रह को नकार नहीं सकते थे। तो उन्होंने कहा कि वह खिचड़ी खाते हैं वह भी मधुकरी से।

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मां ज्वाला देवी ने गुरु गोरक्षनाथ से कहा कि आप भिक्षा मांगकर अन्न ले आइये और वे चूल्हा जलाकर पानी गर्म कर रही। देवी ने पात्र में जल भरकर चूल्हे पर चढ़ा दिया।

Mandir

गुरु गोरखनाथ भिक्षा मांगते हुए कौशल प्रदेश के सरयू पार वन क्षेत्र में पहुंच गए। ताप्ती और रोहिन नदियों के संगम पर यहां चारो तरफ जंगल था। यह क्षेत्र वर्तमान गोरखपुर कहलाता। त्रेता युग में यह क्षेत्र वन से घिरा हुआ था। बाबा गोरक्षनाथ जी को वनाच्छादित यह क्षेत्र तप करने के लिये अच्छा लगा और वो यहां तप करने लगे। भक्तों ने गुरु गोरक्षनाथजी के लिये एक कुटिया बना दी। गुरु गोरखनाथ यहीं समाधिस्थ हो गए। तप कर रहे बाबा गोरखनाथ के खप्पर में लोग खिचड़ी चढ़ाने लगे। लेकिन मान्यता है कि यह खप्पर कभी भरा नहीं। न बाबा का खप्पर भरता न ही वे वापस कांगड़ा लौटे। यह मकरसंक्रांति की तिथि थी। बस तभी से हर साल गोरक्षनाथ मंदिर में खिचड़ी का महापर्व मनाया जाता है। उसी समय से गोरक्षनाथ मंदिर में खिचड़ी मेला लगता है। कहा जाता है कि तभी से लोग आकर गुरु गोरख के खप्पर में खिचड़ी चढ़ाते हैं लेकिन आज तक वह खप्पर भरा नहीं। ज्वाला देवी स्थान पर देवी के तप से अदहन आज भी खौल रहा है ।

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