Ayodhya Ram Manidr संत मोरारी बापू ने राममंदिर को लेकर दे दिया बड़ा बयान

Ayodhya Ram Manidr संत मोरारी बापू ने राममंदिर को लेकर दे दिया बड़ा बयान
Murari Bapu Rama Katha

Dheerendra Vikramadittya | Publish: Oct, 11 2019 12:45:57 PM (IST) | Updated: Oct, 11 2019 12:45:58 PM (IST) Gorakhpur, Gorakhpur, Uttar Pradesh, India

  • आजकल लोग मंदिर जाते हैं सत्ता को खोजने के लिए
  • रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को बताया सच्चा क्षत्रिय
  • नौ दिनी रामकथा कहने गोरखपुर आए हैं संत मोरारी बापू

गोरखपुर में रामकथा सुना रहे कथावाचक मोरारी बापू ने कहा कि सभी धर्म के लोगों को मिलकर राममंदिर बनाने में सहयोग करना चाहिए। इस देश के लोग भारतीय हैं चाहें वह मुसलमान हो, हिंदू हों, सिख हो या ईसाई। सभी धर्माें के लोगों को प्राथमिकता से आध्यात्मिक स्थलों की गरिमा बनाए रखने में सहयोग करना चाहिए। राममंदिर की भी गरिमा बनाए रखने के लिए उसका निर्माण जरूरी है।
मोरारी बापू गोरखनाथ मन्दिर व श्रीराम कथा प्रेम यज्ञ समिति के तत्वावधान में ब्रह्मलीन महन्त अवेद्यनाथ की स्मृति में आयोजित नौ दिवसीय राम कथा के छठवें दिन रामकथा सुना रहे थे।

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कथा के दौरान मोरारी बापू दर्शकों के सवालों के जवाब भी दे रहे थे।
एक सवाल आया कि बापू जैसे आप ने यजमानों आयोजको एवं स्वयं सेवको के लिए पंचशील सूत्र बताया है, कृपया उसी प्रकार श्रोताओं, श्रद्धालुओं के लिए भी पंचशील बतायें।
प्रश्न के जवाब में सात्विक, तात्विक संवाद करते हुए कहा कि मैं अपने श्रोताओं के लिए पंचशील सूत्र बताने से पूर्व वक्ता के लिए मानस में बताए गए पंचशील बताउंगा।
मानस के आधार पर वक्ता (कथा वक्ता) के लिए पंचशील निम्नलिखित है-
1. शिव के समान कोई वक्ता हुआ ही नहीं। शकल कला गुण धाम।
वक्ता का शील कैलाश पर्वत को तरह अटल होना चाहिए। छोटी-छोटी बातों से उसका शील भंग नहीं होना चाहिए। पहला शील-अटल, अदम्य विश्वास।
2. परम विविकी- वक्ता को गुरू कृपा से परम विवेक होना चाहिए। खाली (केवल) विवेक से काम नहीं चलेगा उसे परम विवेकी होना चाहिए। विवेक व परम विवेक में अंतर शुद्धता का है। परम विवेकी राजहंस की तरह शुद्ध होता है।
3. वक्ता को परम व प्रवीण ज्ञानी होता चाहिए। भुसुण्डी को उन्होंने परम प्रवीण ज्ञानी बताते हुए कहा हमें तो जन्म-जन्मांतर तक यही जनम् चाहिए जिसमें राम नाम व राम कथा की वाचन करने को मिले।
अर्थात वक्ता राम भक्ति के पथ में परम प्रवीण होना चाहिए।
4. वक्ताओं को परम विश्वासी एवं परम विश्रामी होना चाहिए। वह राम को इसी जन्म में पा ले फिर भी वह बार-बार यही कहे कि मुझे रामतत्व ही चाहिए आजीवन। वह स्वयं को सतत् अनुभव करें। चित से परम विश्वास का अनुभव करें व विचारों से स्थिर रहें।
5. वक्ता को चरित्रवान होना चाहिए। अर्थात मन, कर्म और वचन तीनों से वह लंबार न हो। चरित्रवान वक्ता वह है, जो अंतः मन से भी स्खलित न हो। वह दूसरों के प्रति ईष्र्या का भाव न रखें। वह सदैव पुष्टि मार्ग पर चल कर अपने से छोटों पर उदारता व प्रेम का भाव रख उनका मार्गदर्शन करें।

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बापू ने बताया कि नाथ चरित्र में भी शाबर मंत्रों की श्रृृखंला है और मानस में भी शाबर मंत्र का उल्लेख है। उन्होंने कहा शाबर का प्रतीक अर्थ हेाता है। ग्राम्य अथवा अपरिष्कृत। अत्यंत सरल भाषा में पाए जाने वाले सभी मंत्र शाबर की श्रेणी में आते है।
गोस्वामी तुलसीदास के अनुसार-
अनमिल आखर अरथ न जापू,
प्रगट प्रभाव, महेश प्रतापू।
शाबर मंत्रो का जन्म प्रायः सिद्ध साधको द्वारा हुआ है। ये अंत करण से निकले मंत्र है। बापू ने कहा पूरी नाथ धारा ने शाबर मंत्रो को सिद्ध किया है। ये मंत्र केवल त्रिभुवन गुरू का प्रकाश देते है। इनमें कोई छन्दबद्धता नहीं है। इनका दिया प्रकाश ही छन्दबद्धता है।
बापू ने कथा को विस्तारित करते हुए कहा कलयुग में मन, कर्म व वचन से लबार अर्थात विमुख होना ही शील भंग है। उन्होने गुरू मत्स्येन्द्रनाथ व शिष्य गोरखनाथ के संवाद का उदाहरण देते हुए कहा-
एक बार शिष्य गोरखनाथ ने गुरू जी से प्रश्न किया कि गुरू का उपदेश क्या है?
गुरू मत्स्येन्द्रनाथ ने उत्तर दिया- ‘गुरू का आदेश ही उपदेश है’ गुरू के आदेश पर पुरा वेद खड़े हो जाते है। नाथ परंपरा का भी मूल मंत्र है- आदेश।
उन्होने श्रद्धालुओं की तरफ श्रद्धापूर्वक प्रणाम करते हुए कहा कि आपे सभी (श्रद्धालुगण) हमें (मोरारी बापू) को आशीर्वाद दे कि हम वक्ता के लिए मानस में वर्णित पंचशील का निर्वहन कर सके।
उन्होने कहा वक्ता की भक्ति ऐसी होनी चाहिए कि भक्ति में साक्षात माॅ कौशल्या आ जाये। हमें बहुकालिन वस्तु का अनुभव होने लगे। राम के साक्षात दर्शन होने के बाद भी हम (वक्ता) विनम्र बने रहें।

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बापू ने इसके उपरांत श्रोताओं के लिए पंचशील सूत्र को बताते हुए हास्य रूप में कहा कि अब (20-20 क्रिकेट के स्लांग ओवर में फ्री हीटींग का समय है)
उन्होने कहा श्रोता का पहला शील है-
1 सुमतिवान होना। मानस के अनुसार श्रोता को किसी गूढ़ विषय पर तर्क वान होना ही उसके सुमतिवान होने का प्रमाण है।
आप सभी तर्क करो परन्तु दुष्ट तर्क, कुतर्क मत करो। इससे शील भंग होता है।
अर्थात श्रोता का सुशील होना चाहिए। कथा में जहां भी उसे स्थान प्राप्त हो जाये। वहा दूसरो को परेशान किये बिना बैठे जाना चािहए, तब वह सुशील है।
प्रत्येक श्रोता चाहे वे निर्धन हो अथवा धनी हो, राजा हो या रंक हो उसे कथा के समय सुमतिवाहन व सुशील होना ही चाहिए। जो अंति पंक्ति में बैठे सुशील होता है। से प्रभु की प्राप्ति पहले होती है।
2 दूसरा शील- श्रोता को कथा के बाद जहां भी रूकने व ठहरने के लिए स्थान मिले वहा बिना शिकवा-शिकायत के प्रेम पूर्वक ठहर जाना चाहिए। उसे विलासी नहीं होना चाहिए। हरि भजन व राम भक्त को सुविधा की लालसा नहीं होती चाहिए।
3 जो अथवा प्रसाद प्राप्त हो उसे आदर पूर्वक ग्रहण करना चाहिए। ‘श्रोता को सुचि’ होना चाहिए। अर्थात व वाह्य का अपनाना चाहिए।
4 श्रोता को कथा (रामकथा) में रस मिले तो ही आना चाहिए। शोभा में वृद्धि के लिए राम कथा में मत आओं।
बापू ने कहा कथा (राम कथा) रंगीन नहीं होती है, ये रसीली होती हैै। राम कथा में नव रस विद्यमान है। अगर आप को राम कथा के बीच में नींद आ जाये तो समझ लेना आप राम-रसिक नहीं हो। कथा सुनने के बाद मन का समस्त संदेह दूर हो जाना चाहिए। आप रम जाओ राम कथा में।
5 श्रोता को भगवत चरण का किंकर अथवा दास होना चाहिए। सुमति सुशील, सूचि, रसत्व और दासत्व ये पंचशील है श्रोताओं के लिए।
बापू ने चर्चा करते हुए बतया कि शील कैसे आता है? अर्थात व्यक्ति शीलवान कैसे बन सकता है।
ऽ बापू ने कहा सर्वप्रथम घर में बैठे अपने बड़े-बुजुर्गों के चरणस्पर्श करने से शील आता है।
ऽ घर व समाज के बुद्ध पुरूषों की सेवा करने से शील आता है। एक उदाहरण देते हुए बापू ने कहा अगर आप व्यासपीठ पर आकर 1 लाख रूपये का भेंट अर्पण कर दो तो शील की प्राप्ति कभी नहीं होगी। यहां केवल फोटों खींची जायेगी। अगर आप ने अपने वृद्ध माता-पिता को वृद्धाश्रम नहीं भेजा और उनकी सेवा की है तो आप को शील प्राप्त होगा। अर्थात श्रेष्ठ की सेवा करो।
ऽ पड़ोसियों की मदत करों उनकी सेवा करो, उनसे प्रेम पूर्वक व्यवहार करो तो शील आयेगा।
बापू ने सेवा शब्द पर गुरू नानक जी का 550वाॅ प्रकाशवर्ष याद दिलाते हुए भजन किया- ‘गुरू अंधकूप ते माया’ और सबको गुरू सम्मान में शीश ढ़करने को निवेदन किये।

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मोरारी बापू ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को मानस से दीक्षित (प्रवीण) व्यक्ति बताते हुए कहा- बापू प्रबुद्ध थे, वे स्वयं एक संत थे। महात्मा गांधी ने कहा था- कुछ धार्मिक व सामाजिक संस्थायें धर्म के नाम पर धंधा कर रही है। ये वे संस्थाएं है जो वैष्णव नहीं है। आजादी के लड़ाई में ऐसे लोगों ने अंगेजो का साथ दिया था। ये कतई वैष्णव नहीं हो सकते। ये भारत माता के शत्रु है। बापू ने महात्मा गांधी के सम्मान में “वैष्णव जन ता तेने कहिए” अत्यंत लोक प्रिय भजन गा कर वैष्णव होने का अर्थ बताया।
मर्मज्ञ बापू ने नौ दिवसी कथा के छठवे दिन वक्ता-श्रोता पंचशील सिद्धांत, लघु कथाओं के माध्यम से मानव स्वभाव, मानव आचरण, मानव प्रवृति, अंतकरण, अनुशासन, विवेकशीलता जैसे गुणों पर प्रकाश डालते हुए कहा सम्पन्न (कुलीन) लोगों को इस जीवन यात्रा में प्रारब्ध के कारण जो धन प्राप्त हुआ है। उसे मानव मात्र के सेवा में लगाना चाहिए। ये स्थायी नहीं है। इसलिए अधिक से अधिक दीन-दुखियों की सहायता में इसे लगाओं।
बापू ने महाभारत के बाद कृष्ण-गांधारी संवाद का वर्णन करते हुए कहा- मैं तुम्हें दो शाप देती हूॅ-
1. 36 वर्षों में तुम्हारा वंश समाप्त हो जायेगा।
2. और तुम्हारी मृत्यु के समय तुम्हारा कोई अपना साथ में नहीं होगा। 36 वर्ष तक तु सो नहीं पाओंगे। तुम ठीक से भोजन नही कर पाओगे।
केवल इतने पर भी उदारता से मुस्कुराते रहे। दो दिन बात कृष्ण के द्वारका जाने की सारी तैयारी हो गइ। तब वे दुःख में इस युद्ध में मेरी नारायणी सेना समाप्त हो गइ। मैं द्वारका जाने पर उन विधवा माताओं-बहनों को क्या जवाब दूंगा। उन्होने उधव से कहा कभी भी धर्म के लिए युद्ध नहीं होना चाहिए। हमें धर्म के लिए युद्ध को नहीं बुद्ध को आंमंत्रित करना चाहिए। अतः धर्म के लिए युद्ध नहीं होना चाहिए। धर्म युद्ध की विषय वस्तु नहीं है। यह धारण करने की विषय वस्तु है।
उधव को कृष्ण कहते हैं मैं द्वारका जाने से पहले एक बार कुरूक्षेत्र का दर्शन करना चाहता हूॅ। राम के अंधेरे में उधव केशव को कुरूक्षेत्र ले गयें। वहां कृष्ण के पैर मे कुछ टकराया तो कृष्ण ने दुखी होकर पूछा हे मृतको के चिताओं का अंतिम संस्कार भी नहीं हुआ क्या? उधव ने उत्तर दिया हे प्रभु दाह संस्कार करना संभव ही नहीं है। यह अग्नि को जलाने के लिए कुछ शेष बचा ही नहीं है। इस पर श्री कृष्ण बोले हमें इस महाभारत से सीख लेनी चाहिए। ये दो परिवारों को युद्ध नहीं था ये समस्त संसार का महाभारत था।
बापू ने इस प्रसंग के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को यशस्वी बताते हुये कहा कि हमारे लिए ये गर्व का विषय है कि प्रधानमंत्री ने यूनाइटेड नेशन जैसे पटल पर अपने भाषण में कहा कि- ‘भारत ने जगत को बुद्ध दिया है। युद्ध नहीं’ यह भारत की मूल धारा है।
बापू ने रक्षामंत्री राजनाथ सिंह का जिक्र करते हुए कहा कि वे एक सच्चे क्षत्रिय है जिन्होने भारत को मिले राफेल लडाकू विमान पर ‘ऊॅ’ लिखकर पूजा-अर्चना की है। परन्तु मुझे आश्चर्य होता है कि इस पर भी कुछ तथाकथित लोगों को समस्या है और वे विवाद का विषय बना रहे है।
साथ ही साथ बापू ने आज के ढोगी नेताअें पर भी जनता को सावधान करते हुए कहा कि- मेरा हनुमान मन्दिर-मन्दिर गया था सीता को खोजने के लिए और आजकल लोग मन्दिर-मन्दिर जाते हैं। सत्ता को खोजने के लिए।
बापू ने कहा साधू हूॅ निंदा करना मेरा विषय नहीं पर निदान जरूर करूंगा। ये कर्तव्य है।

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