संतकबीरनगर प्रकरण के बाद पूर्वांचल में फिर न तेज हो क्षत्रिय-ब्राह्मण वर्चस्व की जंग

संतकबीरनगर प्रकरण के बाद पूर्वांचल में फिर न तेज हो क्षत्रिय-ब्राह्मण वर्चस्व की जंग

Dheerendra Vikramadittya | Updated: 08 Mar 2019, 11:12:42 AM (IST) Gorakhpur, Gorakhpur, Uttar Pradesh, India


दशकों पुरानी है दोनों जातियों के बीच वर्चस्व की जंग

संतकबीनगर में भाजपा सांसद शरद त्रिपाठी व विधायक राकेश बघेल के बीच जूतमपैजार के बाद पूर्वांचल में ब्राह्मण-ठाकुर वर्चस्व की लड़ाई और तेज हो सकती है। लोकसभा चुनाव के ठीक पहले दोनों जातियों के बीच चैड़ी हुई खाई से भाजपा की मुश्किलें और बढ़े इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। कल तक जो भाजपा निषाद वोटरों की एकजुटता को तोड़ने के लिए निषाद नेताओं को तोड़ने में लगी थी, अब संगठन ब्राह्मण-क्षत्रिय जातियों के बीच दूरी न पनपे इसको लेकर गोरखपुर व आसपास क्षेत्रों में कवायद करनी शुरू कर दी है।

दशकों पहले पड़ी थी वर्चस्व के जंग की नींव

दरअसल, पूर्वांचल के गोरखपुर और आसपास क्षेत्र में दशकों से ब्राह्मण-क्षत्रिय वर्चस्व की लड़ाई देखने को मिलता रहा है। हालांकि, वक्त के साथ यह फिलहाल थोड़ा मद्धिम पड़ा था लेकिन एक बार फिर इस खाई के बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। वर्चस्व के लिए बदले की यह आग कई दशक पहले धधकी थी जो सुलगते-सुलगते कभी तेज हो जाती है। जानकार बताते हैं कि गोरखनाथ मंदिर में ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ के समय की बात है। गोरखपुर के कलक्टर रह चुके सूरतिनारायण मणि त्रिपाठी का किसी बात को लेकर महंत दिग्विजयनाथ की ठन गई। महंत दिग्विजयनाथ ने इस प्रशासनिक अधिकारी के साथ दुव्र्यवहार कर दिया। बताया जाता है कि यह बात मणि खेमे को नागवार लगी। उस वक्त पूर्व मंत्री पंडित हरिशंकर तिवारी काफी युवा थे। बदला लेने के लिए वह आगे आए और एक कार्यक्रम में बदला ले लिया।
इस घटना के बाद ब्राह्मण-ठाकुर वर्चस्व की लड़ाई सड़क पर आ गई। छात्रसंघ चुनाव से लेकर हर छोटे-बड़े चुनाव में दोनों के बीच गुटबंदी सड़क पर आने लगी। एक तरफ ब्राह्मणों का संरक्षण ‘हाता’ यानी पूर्व मंत्री हरिशंकर तिवारी के आवास से मिलता तो ‘मंदिर’ केंद्र रहता क्षत्रियों का। यह बात दीगर है कि बाहुबली वीरेंद्र प्रताप शाही जबतक जीवित रहे तबतक सीधे तौर पर क्षत्रियों की ओर से मोर्चा वहीं संभालते रहे। हालांकि, योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक इंट्री के बाद पूर्वांचल की क्षत्रिय राजनीति उनके आसपास केंद्रित होती गई।

गोरखपुर के दो मुख्यमंत्री हुए, दोनों के कार्यकाल में हाता पर कार्रवाई

गोरखपुर में ब्राह्मण-क्षत्रिय वर्चस्व हर स्तर पर देखने को मिला है। जानकार बताते हैं कि सरकार किसी की भी रही हो लेकिन पूर्व मंत्री हरिशंकर तिवारी का सिक्का हर सरकार में चलता रहा है। परंतु गोरखपुर के कद्दावर नेता क्षत्रिय जाति से ताल्लुक रखने वाले वीर बहादुर सिंह जब मुख्यमंत्री बने थे तो उन्होंने पूर्व मंत्री पर कार्रवाई करायी थी। दुबारा जब योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने तो उनके शासनकाल में हाता में पुलिसवाले कार्रवाई के लिए घुसे थे। हालांकि, इस कार्रवाई के बाद पूरे प्रदेश का ब्राह्मण मुखर हो गया था। वह इसे बदले की कार्रवाई बताने लगा।

पूर्व मंत्री शिव प्रताप शुक्ला को भी होना पड़ा था शिकार

गोरखपुर नगर सीट से भाजपा के सिंबल पर चार बार विधायक और दो बार सूबे का मंत्री रहने वाले शिव प्रताप शुक्ल को भी वर्चस्व की लड़ाई का शिकार होना पड़ा था। भाजपा के सिटिंग विधायक शिव प्रताप शुक्ल को योगी आदित्यनाथ ने अखिल भारतीय हिंदू महासभा से प्रत्याशी उतार हरवाया था। वर्तमान सीएम योगी उस वक्त खुद ही महासभा प्रत्याशी के प्रचार की कमान संभाले हुए थे। हालांकि, इस चुनाव के बाद भी दोनों जातियों के बीच ‘राजनैतिक बदले’ की लकीर गहरी हुई।

2017 में बीजेपी ने की डेमेज कंट्रोल की कोशिश

चूंकि, बीजेपी का मुख्य वोटबैंक अगड़ी जाति का ही मतदाता रहा है ऐसे में 2017 के विधानसभा चुनाव के पहले बीजेपी के नीति निर्धारकों ने ब्राह्मण-क्षत्रिय वर्चस्व की लड़ाई का प्रभाव चुनावी गणित पर न पड़े इसकी काफी कोशिशें की। विधानसभा चुनाव के ऐन वक्त पहले ही करीब चैदह साल से हाशिए पर पहुंच चुके पूर्व मंत्री शिव प्रताप शुक्ल को अचानक से राज्यसभा में भेज दिया गया। यही नहीं मोदी ने मंत्रीमंडल के विस्तार में उनको केंद्रीय मंत्रीमंडल में भी शामिल कर लिया तो यूपी में सरकार बनने के बाद अचानक से योगी आदित्यनाथ को सूबे की कमान दे दी। यह संदेश दिया गया कि दोनों जातियों को पार्टी बराबर सम्मान दे रही। यही नहीं लोकसभा उप चुनाव में योगी आदित्यनाथ की छोड़ी गई सीट पर ब्राह्मण जाति के तत्कालीन क्षेत्रीय अध्यक्ष उपेंद्र दत्त शुक्ल को प्रत्याशी बना दिया गया। इस निर्णय के साथ बीजेपी ने यह संदेश दिया कि दोनों जातियों के बीच दूरियां मिट गई हैं और एक दूसरे के साथ आकर चुनाव जिताएंगे। हालांकि, उपचुनाव में हार के बाद दोनों ने हार के लिए एक दूसरे पर ठीकरा फोड़ना शुरू कर दिया।

भाजपा विधायक कुछ माह पहले ही ब्राह्मणों पर टिप्पणी कर फंसे थे

हिंदू युवा वाहिनी के कोटे से भाजपा की टिकट पाने में सफल हुए मेंहदावल विधायक राकेश सिंह बघेल बीते दिसंबर महीना में ब्राह्मणों पर टिप्पणी कर फंस गए थे। उन्होंने अपने जिले के दो थानेदारों के प्रकरण पर बातचीत के दौरान ब्राह्मणों को विटामीन बी बता दिया था। इस टिप्पणी के बाद मामला राजनैतिक हो गया। ब्राह्मणों के कई संगठनों ने विधायक के खिलाफ प्रदर्शन भी किया था।

सांसद का विधायक को पीटना तमाम लोग जातिगत चश्में से देख रहे

बीजेपी सांसद शरद त्रिपाठी व विधायक राकेश बघेल के बीच मारपीट को लोग जातियता के आधार पर गुटबंदी के रूप में देख रहे हैं। लोगों का मानना है कि संतकबीरनगर में सांसद शरद त्रिपाठी ब्राह्मणों की अगुवाई करते हैं तो विधायक राकेश बघेल क्षत्रियों की। दोनों काफी दिनों से इसी आधार पर गुटबंदी कर रहे थे। कहा यह जा रहा है कि विधायक राकेश बघेल इसी संसदीय सीट से अपनी दावेदारी भी जता रहे थे।

सबसे अधिक मुश्किल में भाजपा

भारतीय जनता पार्टी संतकबीरनगर प्रकरण को लेकर असमंजस में है। फौरी तौर पर पार्टी ने दोनों जनप्रतिनिधियों को निलंबित तो कर दिया है लेकिन चुनाव में इन दोनों के बीच की दूरी पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित होती। जानकार बताते हैं कि अगर पार्टी ने लोकसभा चुनाव में सांसद शरद त्रिपाठी को टिकट दिया तो विधायक पक्ष विरोध तो करेगा ही क्षत्रिय जाति भी अपनी नाराजगी दिखा सकती है तो दूसरी ओर अगर शरद त्रिपाठी का टिकट काटा गया तो ब्राह्मण नाराज हो जाएगा। ऐसे में सबसे अधिक मुश्किल में बीजेपी है।

 

 

Show More
खबरें और लेख पढ़ने का आपका अनुभव बेहतर हो और आप तक आपकी पसंद का कंटेंट पहुंचे , यह सुनिश्चित करने के लिए हम अपनी वेबसाइट में कूकीज (Cookies) का इस्तेमाल करते हैं। हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति (Privacy Policy ) और कूकीज नीति (Cookies Policy ) से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned