दो दो सीएम, राज्यपाल, कई मंत्रियों को देने वाले जिले का बदहाल लोकसभा क्षेत्र

दो दो सीएम, राज्यपाल, कई मंत्रियों को देने वाले जिले का बदहाल लोकसभा क्षेत्र

Dheerendra Vikramadittya | Publish: May, 17 2019 11:10:56 PM (IST) Gorakhpur, Gorakhpur, Uttar Pradesh, India


बाढ़ का दंश झेल रहे कई क्षेत्र, सड़क-स्वास्थ्य-पेयजल की सुविधाओं की दरकार

धीरेंद्र विक्रमादित्य गोपाल
दो-दो मुख्यमंत्री, राज्यपाल सहित कई मंत्रियों को देने वाला जिला गोरखपुर का बांसगांव लोकसभा क्षेत्र अपने अस्तित्व के साथ ही एससी के लिए आरक्षित रहा है। देश के जाने माने दिग्गज कांग्रेसी नेता महावीर प्रसाद की कर्मस्थली रहे इस क्षेत्र ने गोरखपुर क्षेत्र को पहला और एकमात्र महिला सांसद दे चुका है। आजादी के बाद से ही चर्चा में रहने वाले इस क्षेत्र में रोजगार के लिए पलायन, बेहतर स्वास्थ्य सुविधा, शिक्षा सबसे बड़ा मुद्दा है। कई हिस्से आज भी बाढ़ की त्रासदी झेलने को मजबूर हैं। कई गांव तो इस क्षेत्र में ऐसे हैं जहां चार पहिया वाहन भी बमुश्किल से पहुंच सके। कहने को तो करोड़ों-अरबों सड़कों को बनाने में खर्च हो रहे हैं लेकिन लोकसभा क्षेत्र के कछार इलाके में आने पर सड़कों के दावों की पोल खुल जाती है।

दो जिलों में फैला है यह लोकसभा क्षेत्र

बांसगांव लोकसभा क्षेत्र दो जनपदों गोरखपुर से लेकर देवरिया तक फैला है। बांसगांव लोकसभा क्षेत्र में पांच विधानसभाएं हैं। चैरीचैरा विधानसभा क्षेत्र, चिल्लूपार विधानसभा क्षेत्र और बांसगांव विधानसभा क्षेत्र गोरखपुर जनपद में है तो रूद्रपुर व बरहज विधानसभा क्षेत्र देवरिया जिले में है। बांसगांव विधानसभा क्षेत्र अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है।

बाढ़ की त्रासदी भोगने को मजबूर लोग, मूलभूत सुविधाओं का अभाव

बांसगांव लोकसभा क्षेत्र का कई हिस्सा हर साल बाढ़ की त्रासदी को झेलने को मजबूर है। सरकारी साहबानों की लूटनीति से हर साल बंधों को बचाने और बाढ़ बचाव के लिए लाखों-करोड़ों खर्च तो होते हैं लेकिन बंधे दिन ब दिन जर्जर होते गए। बाढ़ का पानी घटने के बाद खराब सड़कें, उजड़े घरों को संवारने की मंशा पर रोजी रोजगार का संकट भी भारी पड़ने लगता है। लोकसभा क्षेत्र के रहने वाले चैरीचैरा अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष एडवोकेट हरिहर प्रसाद बताते हैं कि लोकसभा क्षेत्र के दर्जनों गांव ऐसे हैं जहां आने जाने के लिए ठीक सड़क तक नहीं है। हालत यह कि अगर कोई प्रत्याशी भी इन गांवों में अपनी गाड़ी लेकर नहीं पहुंच पाता। तमाम गांव एक दूसरे से कटे हुए हैं इनको जोड़ने वाली सड़कों या पुल-पुलिया का अभाव है। क्षेत्र के अरुण कुमार बताते हैं कि स्वास्थ्य सुविधाओं का इस लोकसभा क्षेत्र में सर्वथा अभाव है। सीएचसी/पीएचसी तो खुल गए हैं लेकिन डाॅक्टर या स्वास्थ्य कर्मी ही नहीं हैं। कोई इस इलाके में आना ही नहीं चाहता।
बार एसोसिएशन के हरिहर प्रसाद बताते हैं कि क्षेत्र के राजधानी गांव से लेकर मटिहरवा घाट, इटहवा आदि दर्जनों गांव ऐसे हैं जहां विकास के नाम पर केवल कागजों में काम हुए हों। वह बताते हैं कि राजधानी गांव के पास भरोहिया गांव है। इस गांव में 1997 के बाद से कोई सड़क नहीं बनी। गांव में कोई गाड़ी नहीं जा सकती है।
बांसगांव लोकसभा क्षेत्र के रूद्रपुर विधानसभा के कछार क्षेत्र का भी हाल कोई बदला नहीं है। रूद्रपुर के मझवां पवरिया के प्रियेश शुक्ला बताते हैं कि क्षेत्र के कई गांव ऐसे हैं जहां सड़क तक जाने के लिए नहीं है। सबसे बुरा हाल कछार इलाके का है। वहां सड़क के अभाव में बहुत से बच्चे स्कूल तक नहीं जा पाते। बंधों की हालत बेहद दयनीय है। वह बताते हैं कि इसी क्षेत्र में एकौना थाना है, यहां फरियाद लेकर जाने वालों को दस मिनट का रास्ता तय करने में एक से डेढ़ घंटा तक समय लग सकता है।

रोजगार के लिए बाहर जाने को मजबूर

लोकसभा क्षेत्र की अधिकतर आबादी खेती-किसानी, मजदूरी पर निर्भर है। क्षेत्र में रोजगार का बेहतर विकल्प नहीं होने की वजह से बाहर जाकर रोजी रोटी कमाने के लिए काफी संख्या में लोग आए दिन पलायन करते रहते हैं।

यहां बसपा को छोड़कर हर दल को मिला मौका

बांसगांव लोकसभा क्षेत्र गोरखपुर-बस्ती मंडल की एकमात्र सुरक्षित लोकसभा क्षेत्र है। सन् 1962 में अस्तित्व में आए गोरखपुर जिले की इस लोकसभा सीट पर पहली जीत कांग्रेस महादेव प्रसाद ने हासिल की थी। 1967 में इस सीट से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के मोलहू 89770 मत पाकर जीत हासिल किए। 1971 में कांग्रेस के रामसूरत तो 1977 में भारतीय लोकदल के प्रत्याशी फिरंगी प्रसाद यहां से सांसद बने। 1980 में पूर्व राज्यपाल महावीर प्रसाद पहली बार यहां से संसद पहुंचे।
को पहली बार जीताकर संसद में भेजा। महावीर प्रसाद लगातार तीन बार कांग्रेस से सांसद चुने जाते रहे। वीपी सिंह की जनता लहर में भी वह 1989 में चुनाव जीतने में कामयाब रहे थे। 1991 में रामलहर में पहली बार भारतीय जनता पार्टी के राजनारायण पासी ने जीतकर खाता खोला। लेकिन 1996 में पहली बार महिला सांसद के रूप में सुभावती पासवान यहां से जीत दर्ज की। सुभावती पासवान अपने पति व क्षेत्र के दबंग विधायक ओम प्रकाश पासवान की हत्या के बाद सपा की प्रत्याशी बनी थीं। पर 1998 व 1999 में भाजपा के राजनारायण पासी जीतने में कामयाब रहे। 2004 के लोकसभा चुनाव में पूर्व राज्यपाल महावीर प्रसाद को फिर जनता ने भरोसा जताया। 2009 में भाजपा के टिकट पर पूर्व विधायक ओम प्रकाश पासवान के बेटे कमलेश पासवान ने चुनाव जीता तो 2014 में भी वह भाजपा के टिकट पर संसद में पहुंचने में कामयाब रहे।

भाजपा का रथ रोकने के लिए महागठबंधन ने लगाया जोर

बांसगांव लोकसभा क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी ने क्षेत्र के सबसे बड़े राजनैतिक परिवार पर दांव लगाया है। इस बार भी भाजपा ने निवर्तमान सांसद कमलेश पासवान को चुनाव मैदान में उतारा है। कमलेश जीत की हैट्रिक के लिए चुनाव मैदान में हैं। कमलेश की मां सुभावती पासवान 1996 में यहां से सांसद रह चुकी हैं। जबकि उनके पिता ओम प्रकाश पासवान, चाचा चंद्रेश पासवान, वह खुद बांसगांव सीट से विधायक रह चुके हैं। इस बार बांसगांव सुरक्षित सीट से भाई डाॅ.विमलेश पासवान विधायक हैं।
भाजपा प्रत्याशी कमलेश पासवान का इस बार सीधा मुकाबला महागठबध्ंान की ओर से उतरे बसपा प्रत्याशी सदल प्रसाद से है। सदल प्रसाद कई बार चुनाव लड़ चुके हैं लेकिन वह जीतने में असफल रहे हैं। इस बार उनको सपा-बसपा गठबंधन से बदले समीकरण पर भरोसा है।

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