यूपी की इन तीन सीटों पर अपने ही 'चक्रव्यूह' में फंसी भाजपा

यूपी की इन तीन सीटों पर अपने ही 'चक्रव्यूह' में फंसी भाजपा

Dheerendra Vikramadittya | Publish: Apr, 17 2019 01:48:32 PM (IST) | Updated: Apr, 17 2019 01:48:33 PM (IST) Gorakhpur, Gorakhpur, Uttar Pradesh, India


2014 में मोदी मैजिक वाले रथ पर सवार भाजपा के लिए 2019 का रण हो सकता है मुश्किल

2014 के लोकसभा चुनाव में गोरखपुर क्षेत्र में मोदी मैजिक वाले रथ पर सवार बीजेपी के लिए गोरखपुर क्षेत्र का 2019 का रण मुश्किलों भरा हो सकता है। गोरखपुर-बस्ती मंडल की नौ सीटों को एकतरफा जीतने वाली भाजपा कई सीटों पर अपने फैसले से ही जूझती नजर आ रही है। यहां इन सीटों पर विपक्षी हमले झेलने के पहले अंतर्कलह से पार होना भी पार्टी के लिए एक बड़ी चुनौती है।
गोरखपुर-बस्ती मंडल की नौ सीटों में भारतीय जनता पार्टी को तीन प्रमुख सीटों पर पिछले कई महीनों से मंथन व गुणा-भाग करना पड़ा। आलम यह कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की गोरखपुर सीट, जूताकांड से चर्चित हुई निवर्तमान सांसद शरद त्रिपाठी का संसदीय क्षेत्र संतकबीरनगर व कद्दावर नेता कलराज मिश्र की देवरिया संसदीय सीट पर एक अदद अजात शत्रु प्रत्याशी ‘पार्टी विद डिफरेंस’ को नहीं मिल पा रहे थे।
काफी सोच-विचार के बाद संगठन ने इन तीनों सीटों पर प्रत्याशियों के नाम का ऐलान तो कर दिया लेकिन ‘स्काईलैब’ की तरह गिराए गए इन बाहरियों से पार्टी के अंदर ही घमासान मचा हुआ है। भाजपाई रणनीतिकार इस निर्णय को आंतरिक गुटबाजी को कम करने के लिए उठाया गया कदम मान रहे तो राजनीति को समझने-बुझने वाले यह कह रहे हैं कि भाजपा के इस फैसले से वह खुद ही फंस चुकी है। स्थानीय कार्यकर्ता खुद को छला हुआ महसूस कर रहा है।

 

Praveen Nishad

उपेंद्र दत्त के प्रति सहानुभूति पहुंचा सकता बीजेपी को ही नुकसान

गोरखपुर संसदीय सीट भारतीय जनता पार्टी के पास वाया गोरखनाथ मंदिर तीस सालों तक रही है। हिंदूत्व के प्रखर चेहरे के रूप में यहां से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पांच बार संसद पहुंच चुके हैं। उपचुनाव में इस सीट पर तत्कालीन क्षेत्रीय अध्यक्ष उपेंद्र दत्त शुक्ल को चुनाव मैदान में उतारा गया। संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार के रूप में सपा के टिकट पर लड़ रहे प्रवीण निषाद ने करीब 22 हजार मतों से यह चुनाव जीत लिया। इस चुनाव में भाजपा की हार के पीछे हियुवा के असहयोग, यूपी में सत्ता होने के बावजूद आम कार्यकर्ताओं की कहीं सुनवाई नहीं होना, दशकों से चले आ रहे ब्राह्मण-क्षत्रिय वर्चस्व को जोड़कर भी देखा गया। हालांकि, संसदीय चुनाव में महज 20-25 हजार वोटों से हार के बाद उपेंद्र दत्त शुक्ल लगातार क्षेत्र में बने रहे। 2019 आते आते बीजेपी ने कई और समीकरणों को साध लिया जिसमें क्षेत्र के दो बड़े निषाद नेताओं को साथ लेना प्रमुख रहा। भाजपा ने पूर्व मंत्री जमुना निषाद के बेटे व पत्नी को पार्टी में शामिल कराने के साथ ही महागठबंधन से निषाद पार्टी को तोड़ लिया। यह बीजेपी का मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा था। पार्टी आश्वस्त हो चुकी थी कि अब गोरखपुर संसदीय सीट बीजेपी के लिए आसान हो गई। लेकिन चेहरों के चयन को लेकर पार्टी का असमंजस बरकरार रहा। हालांकि, दो दिन पहले पार्टी ने एक स्काई लैब प्रत्याशी के रूप में भोजपुरी फिल्म स्टार रवि किशन को उतार दिया। रविकिशन मूल रूप से ब्राह्मण जाति के हैं और फिल्म इंडस्ट्री से आने की वजह से उनका क्रेज है। लेकिन उपेंद्र दत्त शुक्ल की अनदेखी पार्टी के लिए भारी नुकसानदायक भी साबित हो सकता है। जानकार मानते हैं कि रविकिशन का चेहरा ग्लैमर वाला हो सकता है लेकिन आम ब्राह्मण परिवार उनको कितना अपनाएगा यह अभी भी सवाल ही है। उपेंद्र दत्त शुक्ला से सहानुभूमि रखने वाले इस चुनाव में नुकसान कर सकते हैं। विपक्ष भी उपेंद्र दत्त शुक्ल को हथियार बनाकर अपनी रणनीति सेट करे इससे इनकार नहीं किया जा सकता। यही नहीं जिन अन्य दावेदारों के टिकट कटे हैं वह भी आंतरिक नुकसान पहुंचा सकते हैं। स्थानीयता का मुद्दा भी अब यहां के चुनाव को प्रभावित कर सकता है। चैथा यह कि निषाद पार्टी को साथ लेने के बाद भी निषाद मतों का बंटवारा बीजेपी कराते नहीं दिख पा रही है। इन चार वजहों को टारगेट कर ‘सबकुछ ठीक-ठाक’ करना पार्टी के चुनावी रणनीतिकारों के लिए एक मुश्किल भरा काम साबित होने वाला है।

 

Rakesh Sharad

सबको खुश करने के चक्कर में फंस गई बीजेपी

संतकबीरनगर संसदीय क्षेत्र में भाजपा के कद्दावर नेता पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी के सुपुत्र शरद त्रिपाठी की प्रत्याशिता पर ग्रहण लग चुका है। सबको खुश करने के चक्कर में पार्टी ने यहां से निवर्तमान सांसद शरद त्रिपाठी का टिकट काट दिया है। यहां से प्रत्याशी बनाए गए हैं प्रवीण निषाद। निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय निषाद के सुपुत्र प्रवीण निषाद को बीजेपी ने अपने सिंबल पर लड़ाकर सबको खुश करने की कोशिश की है। जूताकांड के बाद सांसद शरद त्रिपाठी पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं खफा थे और चिट्टी लिखकर कार्रवाई की मांग कर रहे थे। यहां विधायक राकेश बघेल के साथ क्षत्रिय समाज शरद त्रिपाठी के विरोध में था, उनके साथ बीजेपी के एक अन्य विधायक जय चौबे भी थे। चैबे खुद टिकट की आस में थे। इसके अलावा गोरखपुर से टिकट कटने से नाराज निषाद पार्टी को खुश करने और निषाद वोटबैंक की लालच में बीजेपी एक कोई सीट निषाद पार्टी के कहने पर देना चाह रही थी। ऐसे में संतकबीरनगर सीट बीजेपी के लिए सबसे सेफ लगी। यहां निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद को गोरखपुर से संतकबीरनगर शिफ्ट कर यह संदेश दे दिया कि निषाद समाज को टिकट दिया है। दूसरा यह भी कि क्षत्रिय वोटरों को नाराज न करते हुए शरद त्रिपाठी का टिकट काट दिया है। लेकिन बीजेपी का यह निर्णय कहीं खुद के लिए घातक न हो जाए यह भी एक आशंका जताई जा रही है। जानकारों की मानें तो संतकबीनगर में ब्राह्मण मतदाताओं की अच्छी खासी संख्या है। महागठबंधन से पूर्व मंत्री हरिशंकर तिवारी के पुत्र कुशल तिवारी प्रत्याशी हैं। कुशल यहां से दो बार सांसद रह चुके हैं। हरिशंकर तिवारी पूर्वांचल के ब्राह्मणों के बड़े नेता माने जाते हैं। ऐसे में बीजेपी को यहां ब्राह्मण मतों को सहेजना काफी मुश्किलों भरा दौर हो सकता है। यहां का ब्राह्मण सजातीय प्रत्याशी के टिकट कटने से नाराज है। सवाल यह कि एक ब्राह्मण चेहरे के मैदान में होने के बावजूद वह निषाद जाति के उम्मीदवार को अपना वोट किस खुशी में देगा। दूसरा यह कि शरद त्रिपाठी व उनकी टीम किसी सूरत में अपने संसदीय क्षेत्र से पार्टी के निर्णय को सही साबित नहीं होने देंगे जो आगे चलकर नजीर बन जाए। जानकार बताते हैं कि निषाद वोटरों की संख्या इस क्षेत्र में कोई खास नहीं है। ऐसे में बीजेपी के पास किसी ऐसी रणनीति की जरूरत होगी जो ब्राह्मण वोटरों को रोक सके।

 

kalraj and Ramapati

रमापति राम त्रिपाठी को भी झेलना होगा बाहरी होने का दंश

देवरिया संसदीय सीट पर कलराज मिश्र का टिकट कटने के बाद गुटबाजी को खत्म करने के लिए और संतकबीरनगर के ब्राह्मणों को मैनेज करने के लिए सांसद शरद त्रिपाठी के पिता पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी को देवरिया संसदीय क्षेत्र से प्रत्याशी बनाया गया है। ब्राह्मण बाहुल्य इस क्षेत्र से चुनाव लड़ने आ रहे रमापति राम त्रिपाठी के लिए यहां के स्थानीय नेताओं को मनाना काफी टेढ़ी खीर साबित होगी। बीते लोकसभा चुनाव में कलराज मिश्र के प्रत्याशी बनाए जाने के बाद भी बीजेपी का अंतकर्लह सड़कों पर आ गया था लेकिन अपने कद का इस्तेमाल कर कलराज ने सबको मना लिया। वह बड़े अंतर से चुनाव जीत भी गए लेकिन पूरे पांच साल उनको भारी विरोध का सामना करना पड़ा। उम्र का हवाला देकर पार्टी ने उनको यहां की चुनावी राजनीति से बाहर तो कर दिया है लेकिन देवरिया की परिस्थितियां अभी भी जस की तस हैं। यहां के विभिन्न धु्र्रव टिकटों के दावेदार थे। वे सब मजबूती से अपनी बात रख रहे थे और किसी भी स्तर पर जाकर अपने विरोधी का विरोध कर रहे थे। पार्टी ने इन सबको ‘ठीक’ करते हुए बाहर से प्रत्याशी भेज दिया है। जानकार बताते हैं कि पार्टी द्वारा घोषित प्रत्याशी का इतना बड़ा कद नहीं है जो देवरिया की आंतरिक गुटबाजी को रोक सके। सबसे अहम बात यह कि रमापति राम त्रिपाठी का गोरखपुर क्षेत्र की बीजेपी संगठन की राजनीति में अहम भूमिका रही है। पार्टी में ही हर जिले में उनके पक्ष व विपक्ष के लोग हैं। ऐसे में देवरिया संसदीय क्षेत्र में सभी गुटों को एक साथ लाना उनके लिए मुश्किल साबित होने वाला है। हर बार बाहरी का दंश झेल रहे देवरिया के भाजपाई भी खुलेमन से प्रचार करें यह कहना थोड़ा जल्दबाजी होगा।

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