ये है जिला अस्पताल, जहां पर्चा बनवाने से लेकर भर्ती होने तक मरीज को मिलता है दर्द

जिले में 32 विशेषज्ञों की तैनाती, जिला अस्पताल में सिर्फ 4 मेडिकल ऑफीसर

गुना. ये है जिला अस्पताल। जहां छह सौ से आठ सौ की प्रतिदिन ओपीडी रहती है। यहां आकर कोई देखे तो उसको पर्चा बनवाने से लेकर भर्ती के पर्चे बनवाने तक लंबी लाइन लगी दिखेगी। प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री तुलसी सिलावट और कलेक्टर भास्कर लाक्षाकार के आदेश के बाद भी जिला अस्पताल की व्यवस्थाएं सुधरने को तैयार नहीं हैं। न तो मरीजों को यहां इलाज मिलता है और न भर्ती होने के समय कोई सुविधा। खाना भी मिलता है घटिया।

जांच के नाम पर डॉक्टर व स्टाफ जिला अस्पताल की जगह प्राइवेट लैब में जांच कराने के साथ-साथ इलाज न होने की बात कहकर प्राइवेट अस्पताल में इलाज कराने की सलाह देने में भी पीछे नहीं हैं। जिला अस्पताल में एक दशक बाद भी जहां एक ओर डॉक्टरों की कमी है वही दूसरी तरफ जिले में 32 डॉक्टर की तैनाती का दावा स्वास्थ्य विभाग कर रहा हो, लेकिन सच्चाई ये है कि जिला अस्पताल में चार मेडिकल ऑफिसरों से क्षमता से अधिक काम लिया जा रहा है, एक ही समय में दो-दो जगह ड्यूटी देना पड़ रही है।

वहीं दूसरी ओर आरोन व रूठियाई में विशेषज्ञों के रूप में तीन से पांच डॉक्टर तैनात हैं, उन डॉक्टरों में से किसी को भी यहां जिला अस्पताल में मेडिकल ऑफिसर के रूप में नहीं लगाया जा रहा है।जिससे कुछ डॉक्टरों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। इसके साथ ही डॉक्टरों की ओपीडी या कक्ष में डॉक्टरों के न मिलने से मरीजों को सुविधा की जगह परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। मरीजों को यहां पर्चा बनवाने से लेकर भर्ती होने तक एक नहीं कई दर्द सहना पड़ रहे हैं। उनकी जांच भी समय पर नहीं हो पाती हैं। इससे दिक्कत हो रही है।

ये दिखी ओपीडी में स्थिति

पत्रिका टीम जब जिला अस्पताल पहुंची तो वहां ओपीडी में मेडिकल ऑफिसर के रूप में नाक,कान व गला के विशेषज्ञ डॉ. रीतेश कांसल और दूसरे मेडिकल ऑफिसर विकास राजपूत बैठे हुए मिले। इसके साथ ही दूसरे कक्ष में डॉ. गौरव तिवारी बैठे थे। दूसरे विशेषज्ञों के चैंबर देखे तो उनके कक्ष खाली होकर उन कमरों की शोभा बढ़ा रहे थे। एक-दो एमबीबीएस डॉक्टर भी मरीजों को देख रहे थे। जिला अस्पताल के एक सीनियर डॉक्टर का कहना था कि जिला अस्पताल में तैनात चार मेडिकल ऑफिसरों से जमकर काम लिया जा रहा है, इनमें डॉ. रीतेश कांसल, विकास राजपूत, डॉ. एसडी बरुआ और सतीश सनोरिया शामिल हैं। बाकी विशेषज्ञ तो शासकीय सेवा कम निजी अस्पतालों में अपनी सेवाएं देकर ड्यूटी कर रहे हैं।

शोपीस बनी हेल्पडेस्क

हाल ही में आई कायाकल्प की राज्य स्तरीय टीम के समक्ष अपने नंबर बढ़वाने के लिए जिला अस्पताल प्रबंधन ने मरीजों की मदद के लिए हेल्प डेस्क की स्थापना की थी। जिसके लिए हजारों रुपए खर्च कर बकायदा एक बूथ बनाया गया। उसकी डेंटिग पेेंटिग पर भी पैसा खर्च किया गया। टीम को दिखाने के लिए एक कर्मचारी की नियुक्त रोगी कल्याण समिति से बताई गई। लेकिन यह कर्मचारी कायाकल्प टीम के जाने के कुछ घंटे बाद से ही गायब है। अब तक उसे हेल्पडेस्क में नहीं देखा गया। पत्रिका टीम सोमवार को 12 बजे जब अस्पताल पहुंची तो हेल्पडेस्क में कोई मौजूद नहीं था।

दोपहर बाद नहीं होती अल्ट्रासाउंड

शासन ने अस्पताल प्रबंधन को लिखित निर्देश दिए हैं कि मरीजों की जांच उसी दिन की जाए और रिपोर्ट भी दी जाए। लेकिन इन निर्देशों का पालन अस्पताल में नहीं हो रहा है। यहां आने वाली गर्भवती महिलाओं को सोनोग्राफी के लिए कई चक्कर लगाने पड़ रहे हंै। स्टाफ ने बताया कि सोनोग्राफी करने वाले डॉक्टर को हर दिन कोर्ट पेशी पर जाना होता है इसलिए वे सुबह की ओपीडी टाइम में ही सोनोग्राफी कर चले जाते हैं। ऐसी स्थिति में ग्रामीण महिला मरीजों को सबसे ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

Manoj vishwakarma Desk
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