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अधर में अटका गुनिया को गंगा बनाने का सपना, प्रबुद्वजनों ने दिए सुझाव

जीवनदायिनी गुनिया नदी का खत्म होता जा रहा है अस्तित्व
-नदी की भूमि को पाटकर भू कारोबारी कर रहे हैं प्लाटिंग

गुना

Published: April 26, 2022 12:10:27 pm

गुना। मैं गुनिया नदी हूं...। मेरा नाम आपके शहर के लोगों ने ही रखा है। मुझे गर्व है कि मैं उन चुनिंदा नदियों में शामिल हूं जिसके किनारे मानव सभ्यता का कोई शहर विकसित हुआ और यही मेरा दुर्भाग्य भी है कि एक विकसित शहर ने मेरे ही अस्तित्व को नकारते हुए मुझे नष्ट होने के लिए छोड़ दिया।
नदियों की उम्र नहीं होती। हां इतिहास होता है, जो आप लोग ही बनाते हैं। मुझे इतना याद है कि सदियों से मैं उन अनगिनत धाराओं में बेपरवाह बहती रहती थी, जो बारिश के दौरान पैदा होती थी। फिर 1844 में मेरी तमाम बहती धाराओं को एक जगह पर रोक दिया गया। वहां एक तालाब बना, जिसे आप सिंगवासा के नाम से जानते हैं। यहां से आपके शहर और मेरे बीच एक साझेदारी की शुरूआत हुई। मैंने उसे अपना पानी दिया। बदले में उसने मेरा संरक्षण दिया। यहां से आपके गुना का एक शहर के रूप में विकसित होन का सिलसिला भी शुरू हुआ। सिंगवासा से आगे करीब 500 मीटर तक मेरा पानी आज भी बहुत हद तक बना हुआ है। अंग्रेजों के समय बनाए गए स्टॉप डेम के पीछे मेरे पानी का इस्तेमाल लोग घरेलू जरूरतों के लिए करते हैं। यहां मैं 200 से 250 अधिक फुट तक फैल जाती हूं पर मेरे अस्तित्व के पुराने चिन्ह यहीं खत्म हो जाते हैं। इसके लिए कालापाठा तक आते-आते आपके शहर के नदी और नाले मुझमें मिलने लगते हैं। मेरा रंग अब काला पडऩे लगा है। फिर भी बांसखेड़ी तक मैं अबोध बहती रहती हूं।
मैं हैरान हूं कि आपका कानून मेरे करीब 500 मीटर के अस्तित्व को पूरी तरह नकार देता है और उसके बाद मैं फिर अचानक पैदा हो जाती हूं। घनी बस्तियों के बीच में बहते हुए कई पुल-पुलियों से होकर बहती रहती हूं। घोसीपुरा, हनुमान कॉलोनी, राधा कॉलोनी, विद्युत मंडल की कॉलोनी ऐसी तमाम बस्तियां मेरे किनारे पर हैं जहां से मेरे शरीर पर रोजाना लाखों लीटर गंदा पानी डाला जाता है।
आज की पीढ़ी को तो मेरी हालत देखकर यकीन ही नहीं होगा कि सिर्फ पचास साल से मैं शहर की जलापूर्ति का अह्म हिस्सा थी, सन् 1960 तक बड़े पुल के पास शहर की जल सप्लाई मेरे पानी से होती थी। यही नहीं 1980 तक यहां से कुछ ही दूरी पर एक धोबीघाट भी था, जहां मेरे पानी से आपके कपड़े साफ होते थे। आज इस जगह पानी आपके कपड़े गंदे कर देगा।
तमाम गंदगी को समेटे हुए मैं हूं। आपके शहर के रपटे के बाद पहुंचकर मुझे फिर याद आता है कि यहां मुझे देवी की तरह पूजा जाता था। शहर की नई पीढ़ी भी मंदिर घाट को जानती है। वहां मुझमें भुजरिया सिराई जाती थीं। लोग नहाते थे। उत्सवों के दौरान पूजा-पाठ होते थे। लोग मेरे पानी से पवित्र हो जाते थे और आज... अगर मेरे पानी के छीटें मंदिर जाते हुए किसी शख्स पर प
अधर में अटका गुनिया को गंगा बनाने का सपना, प्रबुद्वजनों ने दिए सुझाव
अधर में अटका गुनिया को गंगा बनाने का सपना, प्रबुद्वजनों ने दिए सुझाव
ड़ जाएं तो उसे दुबारा नहाने जाना पड़ता है।
रपटे से आगे जाते हुए मैं और गंदी होती जाती हूं। 40 साल पहले यहां शहर का ड्रेनेज सीधे मुझमे खोल दिया गया। अपने सफर के अंतिम चरण में मैं सब्जी के खेतों के पास से गुजरती हूं। मेरा इतिहास और वर्तमान यही है। मैं जीवनदायिनी नदी से एक गंभीर खतरे में तब्दील हो चुकी हूं मेरे इतिहास के उस दुष्चक्र को पूरा कर दिया है जिसमें आज हर नदी फंसी है।
गुनिया नदी अतिक्रमण की चपेट में
गुनिया नदी जिसमें कभी साफ पानी बहता था, वह आजकल जहां एक ओर अतिक्रमण से सकरी हो गई है, वहीं दूसरी ओर बड़े पुल के पास बन रहे सीवर ट्रीटमेन्ट की मिट्टी और मुरम ने इस नदी को और सकरी कर दिया है। सौ फीट चौड़ी नदी आज काला पाठा, लूशन का बगीचा और बसंत बिहार कालोनी आदि के आसपास 100 फीट की गुनिया नदी 20 फीट में तब्दील हो गई।इसके साथ ही पानी के मुहाने भी बंद हो गए हैं।
नदी में बना दिए गए मकान
सिंगवासा से बहकर आ रही गुनिया नदी में कई जगह लोगों ने नदी में ही मकान बना लिए हैं। कई लोगोंं ने नदी किनारे खाली पड़ी जमीन को अपनी बताकर मनमाने भाव में बेच कर लाखों कमाए। इनमें वे भी लोग शामिल हैं जो सत्ता से जुड़े संगठन में महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। शहर के करीब 10 वार्डों से बहकर पिपरौदा में जाकर नेगरी नदी में मिलने वाली इस नदी में कई जगह अतिक्रमण हो गया है। इसके अलावा कुछ लोगों ने मकान के हिस्से बढ़ाकर नदी में पिलर खड़े कर दिए। तेज बहाव में यहां पर खतरा बना रहता है। इसके बाद भी प्रशासन ने यहां पर सख्ती नहीं की।
लगातार अनदेखी से नदी बनी गई गंदा नाला
शहर के बीच से गुजरी जीवनदायिनी गुनिया नदी का फिर से जीर्णोद्धार करने इसे मिनी स्मार्ट सिटी में शामिल काफी समय पहले ही शामिल कर लिया गया था। जिसके बाद नदी का सर्वे भी हो चुका था। डीपीआर तैयार कर प्रोजेक्ट पर काम करने की बात कही गई। लेकिन धरातल पर आज तक ठीक से काम नहीं हो सका है। यही वजह है कि आज भी गुनिया नदी में घरों से निकले सीवर को बहाया जा रहा है। घरों से निकला सभी तरह का कचरा भी इसी में डाला जा रहा है। वर्तमान में इसकी हालत देख कोई यह नहीं कह सकता है कि जीवनदायिनी नदी है। बल्कि देखने पर गंदे नाले की तरह नजर आती है।
प्रबुद्धजनों ने ये दिए सुझाव
- नदी के दोनों ओर रोड बनाकर रिकवर किया जा सकता है।
- जगह-जगह पार्किंग की जगह निकल सकती है।
- अतिक्रमण हटाकर पूरी तरह से साफ किया जाए।
- कब्जा करने वालों पर एफआईआर कर जेल भेजा जाए।
- प्रशासन सख्ती से काम करे, नागरिक उनके साथ हैं।
- सरकार अपने आधिपत्य में ले और काम करने फंड उपलब्ध कराए।

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