उच्च शिक्षा मंत्री के प्रभार वाले जिले में ही प्रोफेसरों के आधे पद खाली

उच्च शिक्षा मंत्री के प्रभार वाले जिले में ही प्रोफेसरों के आधे पद खाली

Brajesh Kumar Tiwari | Updated: 17 Jul 2018, 10:16:57 AM (IST) Guna, Madhya Pradesh, India

उच्च शिक्षा मंत्री जयभानसिंह पवैया के प्रभार वाले जिले में ही उच्च शिक्षा खतरे में है। यहां प्रोफसर्स के आधे से अधिक पद खाली पड़े हैं।

गुना. उच्च शिक्षा मंत्री जयभानसिंह पवैया के प्रभार वाले जिले में ही उच्च शिक्षा खतरे में है। यहां प्रोफसर्स के आधे से अधिक पद खाली पड़े हैं। कुंभराज में तो तीन सालों से प्राचार्य ही पदस्थ नहीं है। यहां केवल एक प्रोफेसर कॉलेज को संभाल रहे हैं। पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह के गृह नगर राघौगढ़ में भी यही हालात हैं।

जिले में पीजी कॉलेज सहित कुल 8 कॉलेज हैं। जिनमें वर्तमान कुल छात्र संख्या 10 हजार 741 है। इसके मुकाबले केवल 55 प्राध्यापक ही पदस्थ हैं। जबकि 70 पद खाली पड़े हुए हैं। सभी कॉलेजों में वर्तमान पद स्वीकृति के मुताबिक 116 प्रोफेसर्स होने चाहिए।

 

स्टाफ की कमी के कारण कॉलेजों में विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। उन्हें गाइडों व कुंजियों का सहारा लेना पड़ रहा है। कॉलेज केवल नाम के ही बचे हैं। जिला मुख्यालय पर पीजी कॉलेज की बात करें तो यहां कुल 46 पद स्वीकृत हैं, जबकि इसके विरुद्ध मात्र 22 पद ही भरे हैं और 24 खाली हैं।

यहां एमएससी जूलॉजी व एमए अर्थशास्त्र के लिए तो एक भी प्राध्यापक पदस्थ नहीं है। यह स्थिति आजकल की नहीं है, बल्कि लंबे समय से यही हालात बने हुए हैं। वहीं लॉ कॉलेज भी कई सालों से केवल एक प्राध्यापक के भरोसे हैं। यहां कुल 5 पद स्वीकृत हैं। एक ही प्राध्यापक को सारा काम देखना पड़ रहा है। कस्तूरबा कॉलेज में यूजी व पीजी दोनों ही पाठ्यक्रम संचालित हैं। लेकिन यहां भी ४०० विद्यार्थियों पर केवल ४ प्राध्यापक ही हैं। कुल स्वीकृत पद 8 हैं।

 

चाचौड़ा गल्र्स कॉलेज में सारे पद खाली
जिला मुख्यालय के अलावा अन्य कॉलेजों में भी स्टाफ का टोटा है। सबसे बुरी हालत चाचौड़ा के गल्र्स कॉलेज की है। कुल स्वीकृत छह पदों में से छह ही खाली हैं इसके बाद कुंभराज कॉलेज में 6 में से 5पद खाली पड़े हुए हैं। वहीं आरोन कॉलेज में १९ में से केवल ६ पद ही भरे हैं और 13 खाली हैं। राघौगढ़ में 14 में से 7 और चाचौड़ा बॉयज कॉलेज में 12 में से 7 पद खाली हैं।

अतिथियों के भरोसे उच्च शिक्षा
स्टाफ को कमी को अतिथि शिक्षकों के सहारे पूरा किया जा रहा है। नियमित भर्ती न होते हुए भी उनसे उसी तरह काम लिया जाता है, जैसे नियमित प्राध्यापकों से। लेकिन उनकी तरह छुट्टी या अन्य कोई पात्रता उनके पास नहीं है। जिसके कारण अतिथि शिक्षक भी खुद को ठगा सा महसूस करते हैं और अपने नियमितीकरण के लिए कई बार प्रदर्शन भी कर चुके हैं।

नहीं हो सकी भर्ती
सरकार ने कॉलेजों में खाली पड़े पदों पर नियमित भर्ती के लिए परीक्षा का आयोजन को करवाया था। लेकिन अभी तक प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो सकी। यदि प्रक्रिया को पूरा किया भी जाए तो उसमें करीब 5-6 माह का समय लग जाएगा और ये सत्र भी प्रोफेसरों के अभाव में ही बीतेगा। वहीं भर्ती होने के बाद कॉलेजों में पढ़ा रहे अतिथि शिक्षकों का भविष्य भी खतरे में आ जाएगा। कई सालों से प्रदेश की उच्च शिक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अतिथियों के सिर पर भी बेरोजगार होने की तलवार लटक रही है।

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