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पड़ौसी जिले शिवपुरी से सबक नहीं लिया तो भविष्य में होंगे गंभीर परिणाम

भू-जल स्तर गिरने से हर साल गर्मी की शुरूआत में ही सैकड़ों जल स्त्रोत छोड़ देते हैं साथ
प्रशासन ने इन इलाकों में अब तक नहीं किए जल संरक्षण के प्रयास
- न तालाब बनाए और न स्टॉप डेम, निजी भवनों से लेकर सरकारी आवासों में भी रूफ वाटर हार्वेस्टिंग लगाने पर अमल नहीं
- कागजों में बन रहे स्टॉप डेम, नहीं रुक पा रहा पानी

गुना

Published: April 09, 2022 01:20:50 pm

गुना. यदि हम इसी तरह लगातार पानी का दोहन करते रहे और समय पर जल संरक्षण के पर्याप्त और पुख्ता इंतजाम नहीं किए तो वह दिन दूर नहीं जब पड़ौसी जिले शिवपुरी जैसे हालात निर्मित हो जाएंगे। जहां पर्याप्त प्राकृतिक जल स्त्रोत नदी, तालाब, कुंड होने के बावजूद पेयजल के लिए कई किमी दूर मड़ीखेड़ा डेम से पानी लाना पड़ रहा है। सुखद बात यह है कि अब तक ऐसी स्थिति गुना में निर्मित नहीं हुई है। लेकिन वर्ष 2017 से लेकर अब तक के भूजल स्तर के जो आंकड़े सामने आए हैं, वह अलर्ट करने के लिए पर्याप्त हैं। जिले के बमोरी क्षेत्र में भूजल स्तर की स्थिति काफी चिंताजनक है। जहां हर साल लगातार भूजल स्तर में गिरावट आ रही है। यही वजह है कि हर साल ट्ूयूबवैल दम तोड़ रहे हैं और पेयजल के लिए नवीन बोर और ज्यादा गहराई पर खोदने पड़ रहे हैं। इस तरह के हालात के लगभग सभी विकासखंड में है। यह बात अलग है कि कुछ हिस्सों में अभी ऐसी स्थिति नहीं है।
पत्रिका पड़ताल में सामने आया है कि गुना जिले में साल दर साल भूजल स्तर की स्थिति बिगडऩे की वजह बारिश के पानी का ठहराव न करना, भूजल का जरुरत से ज्यादा उपयोग करना तथा जल संरक्षण के प्रयास पर्याप्त और ठोस न करना है। भले ही सरकार जल संरक्षण की दिशा में कई योजनाएं संचालित कर रही है। यही नहीं मनरेगा के तहत हर साल सोख्ता गड्ढा, स्टॉप डेम, चेक डेम तथा तालाब निर्माण की बात कह रही है। लेकिन इस दावे की हकीकत जब ग्राउंड लेवल पर पता की तो हालात चिंताजनक हैं। क्योंकि जो काम कागजों में दर्शाया जा रहा है वह धरातल पर ठीक तरह से हुआ ही नहीं है। जिसके उदाहरण हाल ही में कोरोना के दौरान मनरेगा के तहत बमोरी इलाके में बनवाए गए चेक डेम हैं। जहां मजदूरों से सिर्फ पत्थर की दीवार खड़ी करवा दी गई। जो पानी को रोकने में कतई सक्षम नहीं है। इस तरह स्टॉप डेम भी मानक के अनुसार नहीं बने हैं।
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न नये बनाए और न पुरानों का जीर्णोद्धार
जल संरक्षण को लेकर प्रशासनिक दावों की जमीनी हकीकत यह है कि पिछले तीन सालों में नए तालाब नहीं बनाए गए। जो पुराने तालाब हैं उनका जीर्णोद्धार भी नहीं कराया गया। यह हकीकत जानने के लिए ग्रामीण अंचल में जाने की भी जरूरत नहीं है। जिला मुख्यालय पर सिंगवासा तालाब, गोपालपुरा तालाब इसके उदाहरण है। वहीं शहर से निकली गुनिया और पनरिया नदी के क्या हाल हैं यह किसी से छुपे नहीं हैं। बाहर का कोई भी व्यक्ति इसे देखकर नदी की वजाए गंदा नाला ही कहेगा।
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इन उदाहरणों से समझें जल संरक्षण और जल स्तर की स्थिति
जिला मुख्यालय के नजदीकी ग्राम सकतपुर और बजरंगगढ़ पिछले कई सालों से पेयजल संकट का दंश झेल रहे हैं। यहां के नागरिक पूरे साल हैंडपंप व दूसरे बोरों से पानी ढोने को मजबूर हैं। सकतपुर में बोर सफल नहीं है। जब भी नया बोर कराते हैं तो उसमें बहुत कम पानी निकलता है। इसी तरह के हालात बजरंगगढ़ तथा बमोरी में है।
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चंद मीटर के फासले में ही अलग-अलग स्थिति
जिले में लगातार भूजल स्तर की स्थिति कैसे बदल रही है इसका एक उदाहरण है म्याना कस्बा है। जहां रेलवे फाटक के एक हिस्से में पानी की कोई समस्या नहीं है। जबकि दूसरी हिस्से में म्याना चौराहा के पास बसी बस्ती 500 से 600 फीट गहरे बोर में भी पानी नहीं मिल पा रहा है। गर्मी की शुरूआत में ही टैंकरों का सहारा लेना पड़ता है।
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जरा इनकी भी सुनो
मैं म्याना में चौराहा के पास बस्ती में पिछले कई सालों से निवास कर रहा हंू। एक समय था जब 50 फीट पर ही पानी मिल जाता था। लेकिन अब हालात इतने ज्यादा खराब हो चुके हैं कि 600 फीट बोर कराने पर भी पूरे साल भर पानी नहीं मिल पाता। गांव में एक नहीं बल्कि तीन तालाब हैं लेकिन उनके गहरीकरण पर कोई ध्यान नहीं दे रहा।
पूरन जाटव, ग्रामीण
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बमोरी के इन गांवों में हालात ज्यादा खराब
भूजल स्तर के आंकड़े बताते हैं कि जिले में सबसे गंभीर हालात बमोरी के हैं। इनमें प्रमुख गांव हैं कपासी, जौहरी, जेतपुरा सिलावटी, धनोरिया। इन गांवों में मई- जून महीने में 800 से 900 फीट पर भी पानी नहीं मिल पाता। गांव से बाहर खेतों पर जो बोर पानी देते हैं वहां से ढोकर लाना पड़ता है। या फिर निजी बोरों से 400 से 500 रुपए प्रति माह में पानी खरीदना पड़ता है। जो गरीब वर्ग के लिए संभव नहीं हो पाता। इस इलाके में नदी, तालाब नहीं है। जल संरक्षण के लिए जो प्रयास हुए वे धरातल पर ठीक नहीं हैं। लगातार भूजल स्तर गिरने की वजह से ही नलजल योजनाएं दम तोड़ रही हैं। वहीं स्कूलों में लगे हैंडपंप उपयोगविहीन होते जा रहे हैं।
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नहीं हो पा रहा वर्षा जल संग्रह
नगरीय क्षेत्रों में वर्षा के जल को संरक्षण करने के उद्देश्य से मप्र भूमि विकास निगम की धारा 78 (4) के अनुसार भवन अनुज्ञा के लिए वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम अनिवार्य किया गया है लेकिन थोड़ी सी शिथिलता से कहीं भी इस दिशा में कोई कार्य नहीं हो सके हैं। जिले से लेकर पंचायत स्तर पर रि-वाटर हार्वेस्टिंग को लेकर कोई प्लान नहीं बनाया गया है, जिसके चलते तेजी से गिरते भूजल स्तर को रोकना असंभव हो रहा है। कुल मिलाकर जिम्मेदार इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं, जिसके कारण रि-वाटर हार्वेस्टिंग प्लान फ्लाप होता दिख रहा है।
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यह हैं नियम
मप्र भूमि विकास निगम की धारा 78 (4) के अनुसार भवन अनुज्ञा के लिए वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम अनिवार्य किया गया है। यह वर्ष 2009 से लागू है। इसके तहत 0 से 15 वर्ग फुट तक 2500 रुपए की संयुक्त सावधि जमा (एफडीआर) होती है। यह राशि बतौर अमानत होती है। नगरीय निकाय यह सुनिश्चित कर लेता है कि भवन अनुज्ञा लेने वाले व्यक्ति ने बताए नक्शे के अनुसार वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम बना लिया है, तो उसे यह राशि तीन वर्षों के अंतराल में वापस कर दी जाती है और अगर व्यक्ति वह सिस्टम नहीं बनाता है, तो यह राशि नगरीय निकाय राजसात कर लेता है।
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नहीं हुई कार्रवाई
जिले में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को लेकर किसी भी नगरीय निकाय ने किसी एक मकान मालिक को नोटिस नहीं थमाया है, जबकि नियमों के मुताबिक ऐसे मकान मालिकों पर प्रभावी कार्रवाई की जाना चाहिए थी। एक तरह से नगरपालिका इस नियम को पूरी तरह भूलती नजर आ रही है।
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गुना में विकासखंड वार औसत जल स्तर 2020
विकासखंड मार्च जून अक्टूबर
गुना 46.00 48.00 28.65
बमोरी 70.25 75.80 49.38
आरोन 39.00 41.50 18.50
राघौगढ़ 45.55 47.90 39.30
चांचौड़ा 37.20 40.70 31.80
कुल 238.00 253.90 167.40
औसत जल स्तर 47.6 50.78 33.48
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गुना में विकासखंड वार औसत जल स्तर 2021
विकासखंड मार्च जून अक्टूबर
गुना 33.00 36.50 28.10
बमोरी 70.50 76.60 45.30
आरोन 31.20 35.00 18.10
राघौगढ़ 46.40 47.60 37.40
चांचौड़ा 38.40 43.40 30.80
कुल 219.80 239.10 159.70
औसत जल स्तर 43.96 47.82 31.94
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विकासखंड मार्च 2022
गुना 42.60
बमोरी 66.77
आरोन 29.01
राघौगढ़ 45.00
चांचौड़ा 38.10
जिला गुना 44.30
नोट : जल स्तर मीटर में है।
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