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पत्रिका फोकस : अधिकांश सरकारी स्कूलों में बच्चों को बैठने फर्नीचर और पेयजल की सुविधा नहीं

- टाट पट्टी पर अधिक देर तक बैठने में बच्चों को होती है परेशानी
- शहरी क्षेत्र के स्कूलों में शुद्ध पेयजल न मिलने से बच्चे घर से लाते हैं बॉटल, ग्रामीण में हैंडपंप के भरोसे
- सफाई कर्मचारी का अभाव, न कक्षों की ठीक से हो रही सफाई और न टॉयलेट
- बच्चे बोले, उनकी शिकायत पर नहीं होती सुनवाई, प्रबंधन बताता है बजट का अभाव

गुना

Published: November 17, 2021 12:47:26 pm

गुना. सरकार जनता को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए विभिन्न जनहितैषी योजनाओं के माध्मय से हर साल करोड़ों रुपए का बजट खर्च कर रही है। बजट का एक बड़ा हिस्सा शिक्षा के क्षेत्र में भी खर्च किया जा रहा है। लेकिन इसके बावजूद शिक्षा के क्षेत्र में ज्यादा सुधार नहीं आ सका है। अधिकांश सरकारी स्कूल अच्छे भवन, फर्नीचर, पेयजल, बिजली और सफाई जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में विभिन्न समस्याओं से जूझ रहे हैंं। लेकिन उनकी सुनवाई प्रशासनिक और शासन स्तर पर नहीं हो रही है। जिसके कारण बच्चों को समस्याओं से जूझते ही पढ़ाई करनी पड़ रही है। ऐसे हाल जिला मुख्यालय सहित अंचल केे अधिकांश सरकारी स्कूलों के हैं। यही कारण है कि कई अभिभावक तो सिर्फ इसलिए सरकारी स्कूलों में बच्चों को भर्ती नहीं करा पा रहे, क्योंकि वहां बच्चों के लिए जरूरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।
जानकारी के मुताबिक दो साल तक चले कोरोना के प्रकोप ने सभी की आर्थिक हालत कमजोर की है। गरीब और ज्यादा गरीब हो गया, वहीं मध्यम वर्गीय परिवार की आर्थिक स्थिति और भी ज्यादा गंभीर हो गई। यही कारण है कि इन दो सालों में सरकारी स्कूलों में एडमिशन लेने वाले बच्चों की संख्या काफी ज्यादा बढ़ी है। आर्थिक परेशानी के चलते अधिकांश पालकों ने बच्चों को सरकारी स्कूल में भर्ती तो करा दिया लेकिन अब धीरे-धीरे इन स्कूलों की कमियां उजागर होनेे लगी हैं।
सरकारी स्कूलों में सबसे पहली कमी अच्छे भवन का अभाव का है। अपवाद स्वरूप नई बिल्डिंगों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश स्कूलों के भवनों की हालत बिल्कुल ठीक नहीं नहीं है। दूसरी बड़ी समस्या फर्नीचर का अभाव है। स्थिति यह है कि प्राइमरी से मिडिल तक जिले के लगभग किसी भी स्कूल में फर्नीचर की व्यवस्था नहीं है। इस कमी को लेकर प्रबंधन जहां बजट का अभाव बताकर शासन से निर्देश होना बताता है। जबकि प्राइवेट स्कूलों में नर्सरी से ही बच्चों को फर्नीचर पर बिठाया जाता है। सरकारी स्कूल के बच्चों का कहना है कि उन्हें टाटपट्टी पर बैठकर पढऩा बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता। ज्यादा देर तक फर्श पर बैठने से पैर दर्द करने लगने लगते हैं। यही नहीं उन्हें जूते उतारकर बैठना पड़ता है। टॉयलेट के लिए जाने पर फिर से जूते पहनने पड़ते हैं। वहीं जब वे पड़ौसी मित्र से मिलते हैं तो उन्हें हीन भावना का भी एहसास होता है कि प्राइवेट स्कूल में छोटे बच्चे भी फर्नीचर व कुर्सी पर बैठते हैं लेकिन सरकारी में जमीन पर।
सरकारी स्कूलों में तीसरी बड़ी समस्या नियमित सफाई कर्मचारी का न होना है। जिसके कारण न तो कक्षों में नियमित रूप से झाडू लग पा रही है और न ही शौचालय व टॉयलेट ठीक ढंग से साफ हो रहे हैं। बच्चों बताया कि टॉयलेट की हालत इतनी बुरी है कि वह चाहकर भी वहां नहीं जा पाते। क्लास के टीचर को जब यह समस्या बताई जाती है तो उनका तर्क होता है कि शासन ने सफाई के लिए अलग से कोई व्यवस्था नहीं की है। उन्हें यह काम तो निजी खर्च से ही कराना पड़ता है। शासन से जो कंटनजेंसी का बजट मिलता है वह इसके लिए नाकाफी है।
चौथी बड़ी समस्या शुद्ध पेयजल उपलब्ध न होना है। सरकारी स्कूलों में पेयजल स्त्रोत के नाम पर ट्यूबवैल लगवा लिए हैं लेकिन इसके उपयोग के लिए उचित व्यवस्था नहीं की गई है। कुछ स्कूलों में प्लास्टिक की टंकियां रखवाई गई हैं, जिन्हें भर भी दिया जाता है लेकिन समय-समय पर ठीक से सफाई न होने के कारण कोई भी इस पानी का इस्तेमाल पेयजल के रूप में नहीं करता। अधिकांश बच्चे घर से ही बॉटल लेकर आते हैं। वहीं जिला मुख्यालय पर स्कूल स्टाफ या तो पानी घर से लाता है या फिर आरओ का पानी मंगवाता है। वहीं ग्रामीण क्षेत्र के स्कूलों में हैंडपंप ही पेयजल का एक मात्र सहारा है। स्कूल परिसर में बाउंड्रीवॉल न होने से इसका इस्तेमाल गांव वाले भी करते हैं। जिससे कई बार हैंडपंप खराब हो जाता है। सबसे ज्यादा छोटे बच्चों को पानी पीने में दिक्कत आती है।
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पत्रिका फोकस : अधिकांश सरकारी स्कूलों में बच्चों को बैठने फर्नीचर और पेयजल की सुविधा नहीं
पत्रिका फोकस : अधिकांश सरकारी स्कूलों में बच्चों को बैठने फर्नीचर और पेयजल की सुविधा नहीं

मच्छरों से जूझ रहे बच्चे
सरकारी स्कूल में पढऩे वाले बच्चों के लिए इन दिनों मच्छर बड़ी परेशानी का कारण बने हुए हैं। जिसका अब तक प्रबंधन कोई ठोस निदान नहीं कर सका है। बच्चों ने बताया कि जब उन्होंने यह समस्या क्लास टीचर के समक्ष रखी तो उनका कहना था कि स्टूडेंट्स आपस में पैसा एकत्रित कर मच्छर मारने वाली कॉइल ले आएं। लेकिन यह विकल्प न तो मच्छर मारने के सही है और न ही इससे समस्या का निदान पूरी तरह से हो सकता है। असली वजह कक्षों में ठीक से सफाई न होना तथा खिड़कियों में मच्छर रोधी जाली न लगाए जाना है।
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नपा शिक्षा उपकर वसूलती है लेकिन सुविधा नहीं देती
यह बात बहुत कम लोगों को पता है कि नगर पालिका शहरवासियों से विभिन्न टैक्स के अलावा शिक्षा उपकर भी वसूलती है। जिसके एवज में नगरीय क्षेत्र में स्थित सरकारी स्कूलों में आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराना उसकी भी जिम्मेदारी बनती है। जैसे कि स्कूलों में बाउंड्रीवॉल बनवाना, बिजली उपलब्ध करवाना, पेयजल तथा सफाई व्यवस्था करना। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि शहरी क्षेत्र में कई स्कूल ऐसे हैं जहां न तो बाउंड्रीवॉल है और न ही सफाई व्यवस्था। स्कूल परिसर को शिक्षकों को ही साफ करवाना पड़ता है।
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बच्चों की बढ़ती संख्या और जगह की कमी नई परेशानी
बीते दो सालों में सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या काफी ज्यादा बढ़ गई है। वर्तमान में भले ही कोविड-19 गाइड लाइन के हिसाब से 50 प्रतिशत बच्चों को बिठाया जा रहा है। लेकिन जैसे ही यह बच्चे एक साथ स्कूल में आएंगे तब उन्हें बिठाने की दिक्कत सामने आ सकती है। दीपावली के बाद बोर्ड क्लास के स्टूडेंट की संख्या बढ़ गई है, ऐसे में यह समस्या आने लगी है। ऐसे कक्षा 9 के विद्यार्थियों को टाटपट्टी पर बिठाना पड़ रहा है। क्योंकि फर्नीचर इतने बच्चे बिठाना संभव नहीं हो पा रहा है। कई स्कूल ऐेसे हैं जहां जगह तो पर्याप्त है लेकिन बच्चों की संख्या के हिसाब से कक्ष नहीं हैं। वहीं कुछ स्कूलों में अतिरिक्त कक्ष बनाने पर्याप्त जगह नहीं है।

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