scriptSNC unit of district hospital not upgraded even after 14 years | पत्रिका फोकस : 14 साल बाद भी अपग्रेड नहीं हुई गुना जिला अस्पताल की एसएनसी यूनिट | Patrika News

पत्रिका फोकस : 14 साल बाद भी अपग्रेड नहीं हुई गुना जिला अस्पताल की एसएनसी यूनिट

24 वार्मर रखने की क्षमता, बच्चे ज्यादा हुए तो एक वार्मर में रखने पड़ते हैं 2 से 3 बच्चे
विशेषज्ञ डॉक्टर से लेकर पैरामेडिकल स्टाफ की कमी
वर्षों पुराने भवन की हालत भी जर्जर, कैसे मिले बच्चों को बेहतर इलाज

गुना

Published: February 20, 2022 01:16:42 am

गुना. जिला अस्पताल की नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाई 14 साल बाद भी अपग्रेड नहीं हो सकी है। स्थिति यह है कि स्थापना के समय जो इसकी क्षमता थी, वही आज भी बनी हुई है। यही नहीं जो स्टाफ शासन से स्वीकृत है वह भी पूरा नहीं है। ऐसे में यहां क्षमता से अधिक बच्चे आ रहे हैं। जिन्हेें भर्ती करने न तो पर्याप्त वार्मर उपलब्ध हैं और न ही अतिरिक्त वार्मर रखने पर्याप्त जगह। वहीं वर्षों पुराने भवन का जीर्णोद्धार भी नहीं हो सका है। ऐसे में जीर्णशीर्ण भवन में एसएनसीयू यूनिट संचालित हो रही है। सबसे बड़ा सवाल है कि जरूरी सुविधाओं और व्यवस्थाओं के अभाव में बच्चों को कैसे बेहतर इलाज मिल सकेगा।
जानकारी के मुताबिक शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए सरकार ने जिला अस्पतालों में नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाई की स्थापना की थी। इसी क्रम में गुना के जिला अस्पताल में एसएनसी यूनिट करीब 14 साल पहले शुरू हुई। जिसकी तत्समय क्षमता 20 वार्मर की थी। लेकिन समय के साथ जिला अस्पताल में प्रसव की संख्या बढ़ी और ऐसे केस ज्यादा सामने आने लगे जिनमें बच्चों को जन्म के बाद कोई न कोई गंभीर परेशानी है। यही वजह है कि एसएनसीयू में भर्ती होने वाले बच्चों की संख्या में लगातार इजाफा होने लगा। ऐसे में सबसे ज्यादा परेशानी बच्चों को भर्ती करने में आ रही है। इसे देखते हुए प्रबंधन ने जैसे-तैसे यूनिट में जो जगह थी उसमें अतिरिक्त वार्मर रख लिए। अब यह क्षमता 20 से बढ़कर 24 हो चुकी है और अब अतिरिक्त वार्मर रखने जगह नहीं है।
जिला अस्पताल से मिली जानकारी के मुताबिक मेटरनिटी वार्ड में प्रतिदिन 18 से 22 डिलीवरी (प्रसव) होती हैं। वहीं एसएनसीयू में प्रतिदिन 9 से 10 बच्चे भर्ती होते हैं। ऐसे में समस्या उस समय उत्पन्न होती है जब पहले से सभी वार्मर फुल हैं। नए बच्चे का एडमिशन कैसे किया जाए। बच्चे की गंभीर स्थिति को देखते हुए उसे एक ही वार्मर में दूसरे बच्चे के साथ भर्ती करना पड़ता है। लेकिन इसमें संक्रमण फैलने का खतरा भी रहता है। ऐसे हालातों में मजबूरीवश डॉक्टर को यह कदम उठाना पड़ता है।
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पत्रिका फोकस : 14 साल बाद भी अपग्रेड नहीं हुई गुना जिला अस्पताल की एसएनसी यूनिट
पत्रिका फोकस : 14 साल बाद भी अपग्रेड नहीं हुई गुना जिला अस्पताल की एसएनसी यूनिट

भवन की हालत बेहद जर्जर
एसएनसीयू जिला अस्पताल की बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील इकाई है। क्योंकि यहां लोगों के ऐसे नवजात बच्चों को भर्ती किया जाता है जो किसी न किसी गंभीर बीमरी से पीडि़त हैं। ऐसे में जरा सी लापरवाही स्थिति बिगाड़ सकती है। कई बार ऐसे मौके भी आए जब परिजनों ने डॉक्टर पर इलाज में लापरवाही के आरोप लगाकर उनसे अभद्रता कर दी। एसएनसी यूनिट जिस भवन में संचालित है, वह काफी पुराना है। जिसका अब तक जीर्णोद्धार नहीं कराया गया है। जिससे बारिश के समय यहां ज्यादा परेशानी आती है।
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सुविधाओं के अभाव में यह आ रही परेशानी
जिला अस्पताल के मेटरनिटी वार्ड में यदि महिला की डिलीवरी नार्मल हुई तो उसे दो से तीन दिन तक भर्ती रखा जाता है जबकि सीजेरियन ऑपरेशन होता है तो करीब पांच दिन लग सकते हैं। ऐसे में यदि नवजात शिशु को स्वास्थ्य से संबंधी जटिलता है तो उसे एसएनसीयू में भर्ती किया जाता है। जहां बच्चे को स्वस्थ्य होने में 15 से 25 दिन का समय भी लग सकता है। ऐसे में मां की मेटरनिटी वार्ड से छु्ट्टी कर दी जाती है। वहीं नवजात बच्चों की मां को भर्ती रहने के लिए अलग से वार्ड आरक्षित किए गए हैं। लेकिन जिला अस्पताल में इनकी क्षमता बहुत कम है तथा वहां जरूरी सुविधाओं का अभाव भी है। ऐसे में मां सहित उसके साथ मौजूद अटैंडरों को बहुत ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ता है।
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जिला अस्पताल के अलावा कहीं भी नहीं है एसएनसीयू
नवजात बच्चों के इलाज के लिए जरूरी एसएनसीयू जिला अस्पताल के अलावा कहीं भी नहीं है। जबकि जिले की तहसील और ब्लॉक मुख्यालय पर सामुदायिक व सिविल अस्पताल मौजूद हैं। वहीं जिला मुख्यालय पर ही एक दर्जन से अधिक निजी अस्पताल व नर्सिंग होम मौजूद हैं। लेकिन कहीं भी नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाई नहीं है। ऐसे में जिले भर के बच्चे जिला अस्पताल में ही भर्ती होते हैं। वहीं पड़ौसी जिले अशोकनगर व शिवपुरी जिले के नजदीकी ग्रामों की डिलीवरी भी यहां होती हैं। इसी वजह से यहां के एसएनसीयू पर अधिक दबाव है।
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एसएनसीयू में किन बच्चों को रखा जाता है
एसएनसीयू में किस तरह के नवजात बच्चों को उपचार के लिए भेजा जाना है इसके लिए मापदंड तय है। जिसके तहत नवजात शिशु जिन्हें सांस लेने में परेशानी हो रही है, जिनका जन्म के वक्त वजन 2.50 किलो से कम व 4 किलो अधिक है, अगर बच्चा कोमा में है या फिर उसे दौरे पड़े रहे हैं, बच्चों को अगर बेचैनी हो रही है या उसकी सांस उखड़ रही है, उसे किसी तरह का आघात है या फिर उसे पीलिया है। उसके शरीर का तापमान सही नहीं रह रहा है तो उसे बेहतर इलाज के लिए एसएनसीयू में भर्ती कराने की जरूरत होती है। बच्चे को जितनी जल्दी यहां भर्ती कराया जाएगा बच्चे के बचने की उम्मीद उतनी ही अधिक होगी। यह केंद्र 24 घंटे काम करता है।
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फैक्ट फाइल
एसएनसीयू की स्थापना : 14 साल पहले
वार्मर की कुल क्षमता : 24
कुल पद स्वीकृत : 29
वर्तमान में मौजूद : 23

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