श्रीलंका जैसा गुना में भी एक गांव, पार्वती नदी से चारों ओर घिरे व टापू पर बसा है सोडा

जहां के लोगों को न मिलता है इलाज और न है वहां सड़क
-सोलह साल बाद भी सीएम की घोषणा के बाद दूसरी जगह नहीं बस पाए सोडा वासी

By: praveen mishra

Published: 22 Jul 2021, 12:09 AM IST

गुना। श्रीलंका की तरह गुना जिले की बमौरी में सोडा गांव है, जो पार्वती नदी के पानी से चारों ओर से घिरा टापू पर बसा हुआ है। आजादी के लंबे समय बाद गांव में सड़क तो दूर इलाज की सुविधा भी लोगों को मुहैया नहीं हो पाती है। सन् 2005 में आई बाढ़ के समय वे पानी से चारों ओर से घिर गए थे, उस समय सीएम शिवराज सिंह चौहान स्वयं हेलीकॉप्टर से आए थे। सेना के हेलीकॉप्टर से बाढ़ में फंसे लोगों को लिफ्ट कराकर सुरक्षित स्थान भेजा गया था।इस बाढ़ में गांव के कुछ लोग बह गए थे। उस समय सीएम ने उनको दूसरी जगह बसाने की घोषणा जरूर की थी, लेकिन सोलह साल गुजरने के बाद भी घोषणा अधर में लटकी हुई है। सोडा वासी उस दिन का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं जब उनका पुर्नस्थापन किसी दूसरे स्थान पर हो पाए। जिससे उनको बमौरी विधानसभा क्षेत्र की मुख्य धारा से जोड़ा जा सके, और सरकार की योजनाओं का लाभ मिल सके। कुछ दिनों बारिश और हो गई तो इस गांव का रास्ता पूरी तरह बंद हो जाएगा और वहां रहने वालों को दूसरी जगह रहने के लिए प्रशासन की ओर से नोटिस दे दिए जाएंगे।

ये हाल है सोडा गांव का
बमौरी विधानसभा क्षेत्र के ग्राम पंचायत पाठी के तहत सोडा गांव आता है, जिसकी आबादी 600-700 और मतदाताओं की संख्या 300 के आसपास है। यह गांव पार्वती नदी से चारों ओर से घिरा हुआ है। इस गांव के आसपास नदी के अलावा छह-सात बड़े नाले हैं। यह गांव पाठी से आठ किलोमीटर दूर है। पार्वती नदी के टापू पर बसे इस गांव के लोगों का दर्द ये है कि उनको अभी तक शासन की योजना का लाभ नहीं मिला। महिलाओं का कहना था कि प्रसव या इलाज के लिए सीमा पार राजस्थान के छबड़ा जाना पड़ता है।गुना जिले की सीमा में होने के बाद भी सोडा गांव की महिलाओं को जिला अस्पताल में इलाज कराना पहाड़ चढऩे जैसा है। उन्होंने कहा कि प्रसव के लिए 1400 रुपए मिलते हैं, लेकिन हमारे यहां एक को भी नहीं मिल पाए और न ही जननी एक्सप्रेस का लाभ यहां की प्रसूताओं को मिल पाया। कुछ समय पूर्व इलाज मिलने पर दो महिलाओं की प्रसव के दौरान मौत हो गई थी।
अभी तक गांव में नहीं पहुंच पाई सड़क
जहां हम डिजीटल इंडिया की बात करते हैं वहीं आजादी के 73 वर्ष बाद सोडा गांव में सड़क नहीं पहुंच पाई। वहां के लोगों के लिए आवागमन का साधन कुछ भी नहीं हैं। जबकि राजस्थान जाने के लिए बनियारी की ओर अच्छा सड़क मार्ग बना हुआ है। उनको पांच-छह किलोमीटर दूर बनियारी राजस्थान की छत्री खिरिया छबड़ा नजदीक पड़ता है, जहां खरीददारी और इलाज कराने लोग पहुंचते हैं। सोडा गांव के लोगों का कहना था कि ट्यूब पर बैठकर राशन लेने के लिए नदी-नाले पार करके हमीरपुर आना पड़ता है, पूर्व में तो बारिश के चार महीने का राशन लेप्स हो जाता था। बच्चों की शिक्षा के लिए एक शासकीय प्राइमरी स्कूल है। इसके बाद पढऩे के लिए उनको छबड़ा ही जाना पड़ता है। प्रशासन का इस मामले में कहना है कि नदी-नाले को पाटकर सड़क बनाने में जितना पैसा खर्च होगा उतने में तो दो गांव बस सकते हैं।
बारिश के समय गांव खाली करने का मिलता है नोटिस
यहां रहने वालों ने बताया कि अभी तो यहां कम बारिश हुई है। वैसे हर बार बारिश के मौसम में हम सबको प्रशासन की ओर से नोटिस मिल जाते हैं कि वे गांव खाली करके सुरक्षित स्थान पर चले जाएं। अभी तो हमें कोई नोटिस नहीं मिला है। उस समय यह लगता है कि कहां जाएं, सीएम 2005 में हमें दूसरी जगह बसाने की घोषणा कर गए थे, लेकिन अभी तक हम सुरक्षित स्थान नहीं पहुंच पाए हैं, बारिश के मौसम में चार माह तो हमारी जान हमेशा खतरे में ही बनी रहती है। उनका कहना था कि हमें या तो हमीरपुर में बसा दिया जाए या राजस्थान के छबड़ा जिले के बनियारी गांव में।
बारिश में मजबूरी में रहने जाते हैं दूसरी जगह
सोडा गांव में रहने वालों ने बताया कि बारिश में कई बार लोग ज्यादा पानी के बहाव में बह गए। यहां रहने की समस्या से कुछ लोग राजस्थान और फतेहगढ़ में आकर बस जाते हैं। बारिश खत्म होते ही यह लोग अपने गांव आ जाते हैं।
न वहां कुटीर है और न आवास
इस गांव के लोगों का दर्द है कि यहां किसी के पास प्रधानमंत्री आवास के तहत न तो कुटीर है और न ही शासकीय शौचालय मिला है। यहां कच्चे मकान बने हैं, जो बारिश में बह जाते हैं, जिनको बारिश के बाद पुन: गांव के लोग तैयार करते हैं। इस संबंध में जब सोड़ा गांव के सचिव छीतरमल नागर से चर्चा की गई तो उन्होंने बताया कि यह गांव टापू पर बसा हुआ है, बारिश के समय नदी-नाले उफन आते हैं, गांव तक जाने के लिए पैदल ही एक मात्र रास्ता है। बीते वर्ष उपचुनाव के समय मतदान के लिए अस्थाई रास्ता बनाकर मतदान दल को वहां पहुंचवाया गया
था। टापू पर बसे होने के बाद भी उनको सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।

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