कोरोना महामारी, लॉक डाउन, बढ़ती महंगाई के बाद अब बच्चों की पढ़ाई के खर्च ने पालकों की मुश्किल बढ़ाई

बिना पढ़ाई के पूरी फीस वसूलने से अधिकांश पालकों का सरकारी स्कूल के प्रति रुझान बढ़ा
इस बार भी सरकारी स्कूलों में एडमिशन लेने वालों की संख्या बढ़ी

By: Narendra Kushwah

Published: 03 Jul 2021, 12:05 AM IST

गुना. कोरोना महामारी और लॉकडाउन का असर हर सेक्टर पर पड़ा है। लेकिन इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है एजुकेशन सिस्टम। जो दो साल बाद भी पटरी पर नहीं लौट सका है। शासन-प्रशासन के निर्देश पर शुरू की गई ऑनलाइन पढ़ाई व्यवस्था सिर्फ औपचारिक बनकर रह गई है। जिससे बच्चों का शैक्षणिक स्तर लगातार कमजोर हो रहा है। ऐसे में अभिभावकों को दोहरी चिंता सता रही है। एक तरफ जहां बच्चों की पढ़ाई ठप सी हो गई है तो वहीं निजी स्कूल संचालक बिना पढ़ाई के ही पूरे साल भर की फीस वसूलने पर जोर दे रहे हैं। इस धर्मसंकट में अधिकांश अभिभावक अपने बच्चों को निजी स्कूल से हटाकर सरकारी स्कूल में प्रवेश दिला रहे हैं। नतीजतन में सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या बढऩे लगी है।
सरकारी और निजी स्कूल के शिक्षकों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि कोरोना महामारी को काफी लंबा समय गुजर चुका है। लेकिन शासन अब तक ऐसी व्यवस्था नहीं बना पाई है कि स्कूलों में नियमित कक्षाएं सीमित विद्यार्थियों के साथ लग सकें। वहीं बच्चों की सुरक्षा को लेकर अब तक वैक्सीन भी नहीं आई है, इसलिए अभी कोरोना का खतरा भी बना हुआ है। जिसे लेकर अभिभावक आशंकित हैं और वे अभी अपने बच्चों को इन हालातों में स्कूल भेजने के लिए पूरे मन से तैयार नहीं हैं।
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महंगाई के बीच बच्चों की पढ़ाई का अतिरिक्त बोझ
बीते दो साल से कोरोना और लॉकडाउन का दंश झेल रहा गरीब व मध्यम वर्गीय परिवार अभी तक अपनी आर्थिक स्थिति को नहीं सुधार पाया है। इससे पहले ही उस पर महंगाई की मार पड़ गई। खाद्य सामग्री से लेकर पेट्रोल-डीजल के बाद रसोई गैस की कीमत बढऩे से परिवार का पूरा बजट ही गड़बड़ा गया है। इन परेशानियों के बीच बच्चों की पढ़ाई के अतिरिक्त खर्च ने तो उसे पूरी तरह से ही तोड़ दिया है। यह समस्या उन पालकों को आ रही है जिनके बच्चे प्राइवेट स्कूल में पढ़ते हैं, जहां से वह अपने बच्चों को किन्ही कारण से नहीं निकाल पा रहे हैंं।
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ऑनलाइन क्लासेस ने यह परेशानियां बढ़ाईं
स्कूल सरकारी हों निजी मौजूदा समय में किसी के पास भी ऑनलाइन पढ़ाई के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है। इसी एक मात्र व्यवस्था ने बच्चों के साथ-साथ पालकों के समक्ष विकट समस्या पैदा कर दी है। सबसे पहले तो सभी पालकों के पास स्मार्ट फोन नहीं हैं। यदि हैं भी तो वह बच्चों को जरूरत के समय फोन उपलब्ध नहीं कर सकते। वहीं कुछ अभिभावक ऐसे भी हैं जिनके पास इतना बजट नहीं है कि वह बच्चों को अलग से स्मार्ट फोन दिलवा दें और फिर उसे जरुरत के मुताबिक डेटा भी उपलब्ध करा सकें। वहीं तीसरी समस्या ऑनलाइन पढृाई में बच्चों को कुछ भी समझ न आना भी है। कुल मिलाकर ऑनलाइन पढ़ाई औपचारिक बनकर रह गई है।
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स्वास्थ्य पर विपरीत असर, मोबाइल एडिक्ट हुए बच्चे
कोरोना की वजह से स्कूली पढ़ाई बंद होने का असर बच्चों पर बहुत बुरा पड़ा है। सबसे पहले तो उनकी दिनचर्या पूरी तरह से गड़बड़ा गई है। न तो उठने का समय निश्चित है और न सोने का। दिन भर घर पर रहने से टीव्ही के साथ-साथ मोबाइल के आदी हो गए हंै। ज्यादा समय तक इनका उपयोग करने से उनके स्वास्थ्य पर तो विपरीत असर पड़ ही रहा है साथ ही मोबाइल की लत ने बच्चों को चिड़चिड़ा बना दिया है। यहां तक कई बच्चों का स्वभाव तो हिंसक व जिद्दी हो गया है। छोटी उम्र में ही बच्चों की आंखों पर बुरा असर पड़ रहा है। 90 फीसदी बच्चे मोबाइल एडिक्ट हो गए हंै। स्कूली स्तर से बच्चों की नियमित मॉनीटरिंग न हो पाने से होम वर्क करने की आदत तो खत्म सी हो गई है। मोबाइल चलाने से बच्चों का सामान्य ज्ञान तो बढ़ा है लेकिन फिजिकल एक्टिविटी शून्य हो गई है।
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क्या कहते हैं अभिभावक
मंै ऑटो चालक अपने परिवार का पालन पोषण करता हूं। बीते दो साल से कोरोना और लॉकडाउन का दंश झेल रहा हूं। बच्चों को पढ़ाना तो क्या दो वक्त के खाने की जुगाड़ करना भी मुश्किल हो रहा है। सरकारी योजनाओं का लाभ लेना सामान्य व्यक्ति के वश की बात नहीं रही। ऑफिसों में अधिकारी न तो सही जानकारी देते हैं और न ही मदद करते हैं। स्कूल और ट्रेन बंद रहने से ज्यादातर ऑटो चालकों का धंधा पूरी तरह से ठप हो गया है। पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों ने यात्रियों की संख्या और घटा दी है। ऐसे में बच्चों को किसी भी प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना तो अब संभव ही नहीं रहा है।
क्रांति, अभिभावक
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ऑनलाइन पढ़ाई सिर्फ औपचारिकता भर है। इससे बच्चों को समझने में बहुत ज्यादा दिक्कत आती है। ज्यादातर बच्चों केे पास तो स्मार्ट फोन ही नहीं है। डेटा की समस्या बहुत बड़ी है। जिसे हर पालक पूरी नहीं कर सकता। स्कूल में नियमित कक्षाएं लगाने के लिए विशेष इंतजाम किए जाने चाहिए। कोरोना का डर तो हमेशा बना ही रहेगा चाहे फिर वैक्सीनेशन भी क्यों न हो जाए। दो साल में बच्चों का बहुत ज्यादा नुकसान हो चुका है।
माधवेंद्र प्रताप सिंह, अभिभावक

Narendra Kushwah Reporting
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