कोयला खदान मामला:सर्वोच्च न्यायालय की कड़ी टिपण्णी-बचाव एंव राहत कार्य अर्प्याप्त,जैसे भी हो लोगों को बाहर निकाला जाए

21 दिन के बाद भी इस खदान से न तो पानी को हटाया जा सका और न ही फंसे हुए मजदूरों से संपर्क हो सका...

By: Prateek

Published: 03 Jan 2019, 07:42 PM IST

सुवालाल जांगु की रिपोर्ट...


(शिलोंग): एक वकील की और से दायर जनहित याचिका पर तुरंत सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने मेघालय की पूर्वी जयंतिया हिल्स की एक कोयला खदान में फंसे 15 लोगों को बाहर निकालने के प्रयासों पर असंतोष जताया है। याचिका कर्ता वकील ने खदान में फंसे मजदूरों को बाहर निकालने के लिए तुरंत व तेजी से कार्यवाही करने के लिए राज्य व केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की थी। कोर्ट ने घटना स्थल पर चल रहे बचाव अभियान की धीमी प्रगति पर नाराजगी जताई। याचिकाकर्ता ने खदान व इस प्रकार की अन्य दुर्घटना के समय बचाव कार्यों के लिए सेना, वायु सेना व जल सेना की उच्च स्तरीय तकनीकी शाखा की सेवाएं लेने की मांग की थी।


कोर्ट ने अब तक के बचाव कार्य पर असंतोष जताया है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और एस के कौल की खंडपीठ ने कहा कि हम बचाव अभियान की प्रगति से संतुष्ट नहीं है। यह कोई मामला नहीं है कि अब तक वे जिंदा नहीं बचे है। उनमें से कुछ जिंदा है या कुछ मर चुके। या सभी मर गए या सभी जिंदा है, लेकिन वे जैसे भी है उनको तुरंत बाहर निकाला जाना चाहिए। उनके जिंदा होने की हम भगवान से प्रार्थना करते है। बचाव अभियान के कार्यों का अपर्याप्त और ढील के चलते 21 दिन के बाद भी फंसे हुए लोगों तक संपर्क नहीं हो पाया है। घटना स्थल पर पिछले 19 दिनों से राज्य, केंद्र की एनडीआरएफ व कोल इंडिया लिमिटेड के कर्मियों का संयुक्त बचाव अभियान चल रहा है। 20वें दिन से ओडिशा से नौसेना का एक उच्च स्तरीय क्षमता का एक तकनीकी दल भी बचाव अभियान में शामिल हो गया। लेकिन पहले दिन ही पानी निकालने के लिए नौसेना के उच्च क्षमता के सबमर्सिबल मोटर पंप्स ने तकनीकी खराबी के चलते काम करना बंद कर दिया। नेवी और एनडीआरएफ के गोताखोर भी 370 फुट से ज्यादा पानी में नीचे नहीं उतर सकते है।


उल्लेखनीय है कि 13 दिसंबर को मेघालय की एक अवैध कोयला खदान के अचानक ढ़हने से 15 मजदूर फंस गए थे। 19 दिन बीत जाने के बाद भी 320 फीट गहरी संकरी अवैध खदान में फंसे मजदूरों से बाहर से कोई संपर्क नही हो सका हैं। उनके जिंदा होने की सम्भावना नहीं के बराबर बची हैं। 21 दिन के बाद भी इस खदान से न तो पानी को हटाया जा सका और न ही फंसे हुए मजदूरों से संपर्क हो सका। याचिकाकर्ता ने न्यायालय से खदान जैसे अन्य दुर्घटनाओं के समय बचाव कार्य चलाने की एक उच्चस्तरीय संचालन प्रणाली बनाने की मांग की है। जिसमे तीनों सेनाओं के तकनीकी विशेषज्ञ व साजो- समान शामिल हो।


बचाव दल के सामने भी कई चुनौतियां

मुख्य खदान में 60 मीटर गहराई तक पानी भरा हुआ है। खदान के ढ़हने से नदी का पानी भी सुरंग में भर गया। इस प्रकार की सकड़ी सुरंग में 30 मीटर की गहराई तक ही गोताखोई करने के लिए सुरक्षित सीमा होती हैं। इसलिए 30 मीटर तक खदान में से पानी निकालना पड़ेगा जो अभी तक नही हुआ हैं। फंसे हुए लोगों तक पहुंचने के लिए कम से कम 30 मीटर गहराई तक पानी को हटाना हैं ताकि गोताखोर को खदान की सुरंग में गोताखोरी के दौरान कोई बीमारी नहीं हो हैं। 30 मीटर की गहराई तक जाने के बाद गोताखोर और आगे तभी जायेगा जब खदान की सुरंग में लकड़ी का ढ़ांचा या कोयला या चूहे के बिल जैसी बनी हुई कोई संरचना वहां मौजूद हो। इसके अलावा सुरंग की दीवारों से पानी के स्राव को भी रोकना पड़ेगा। सुरंग में पानी साफ नहीं होने से दृश्यता सिर्फ एक फुट ही हैं।


एनडीआरएफ व कोल इंडिया लिमिटेड के बचाव दल के गोताखौरों ने सुरंग में 3-3 घंटे तक पानी के भीतर में रिमोट से संचालित वाहन की सहायता से प्रयास किया लेकिन कोई सफलता नहीं मिली। खदान में पानी भरने के अगले दिन से ही राष्ट्रीय आपदा एवं बचाव दल की एक टीम बचाव कार्यों में लगी हुयी है। एनडीआरएफ की टीम के गोताखोर 25 पीएच के मोटर पम्पों के साथ अधिकतम 13 मीटर की गहराई तक पहुंच पाए थे। अब नेवी की टीम के गोताखोर 100 पीएच के मोटर पम्प के साथ और ज्यादा गहराई तक जा सकेंगें। खनन कार्यों के विशेषज्ञ जसवंत सिंह गिल ने कहा है कि राज्य सरकार व बचाव व राहत सेवा एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी के चलते यह स्थिति बनी हैं। इसके चलते बचाव कार्य बहुत धीरे चले हैं। घटना स्थल पर बचाव कार्य कोल इण्डिया लिमिटेड कम्पनी की पूर्वोत्तर क्षेत्र के मुख्य प्रबंधक के नेतृत्व में चल रहे है। उम्मीद की जा रही है कि जल्दी ही नेवी की बचाव टीम के प्रयासों को सफलता मिलेगी।

Prateek Desk
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