स्कूली बच्चे की जिद ने बचाई भाषा, अब औरों में भी जगी आशा

स्कूली बच्चे की जिद ने बचाई भाषा, अब औरों में भी जगी आशा
स्कूली बच्चे की जिद ने बचाई भाषा, अब औरों में भी जगी आशा

Nitin Bhal | Updated: 03 Sep 2019, 09:04:03 AM (IST) Guwahati, Kamrup Metropolitan, Assam, India

North East News: भाषा संवाद का सबसे सशक्त माध्यम है। सदियों से भाषा के जरिए ही लोग खुद को दूसरों से जुड़ा या अलग पाते रहे हैं। ग्लोबलाइजेशन के साथ दुनिया गिनी-चुनी...

इटानगर (सुवालाल जांगु). भाषा संवाद का सबसे सशक्त माध्यम है। सदियों से भाषा के जरिए ही लोग खुद को दूसरों से जुड़ा या अलग पाते रहे हैं। ग्लोबलाइजेशन के साथ दुनिया गिनी-चुनी भाषाओं पर ही निर्भर रह गई है। ऐसे में कई भाषाओं पर अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है। भारत में भी आधिकारिक भाषाओं के अलावा सैकड़ों ऐसी भाषाएं हैं जो अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रही हैं। ऐसे वक्त में एक जनजातीय भाषा को बचाने में एक शख्स आगे आता है और उसके लिए लिपि भी बनाता है। अब इससे अधिक भाषा के लिए कोई क्या योगदान दे सकता है। अरुणाचल प्रदेश के लोंगडिंग जिला निवासी बंवंग लोसु ने अपने जनजातीय समुदाय ‘वांचो’ की भाषा की लिपी बना कर इतिहास रच दिया है। अरुणाचल प्रदेश की एक प्राचीन जनजातीय समुदाय वांचो की भाषा ‘वांचो लाईची’ है। लोसु ने वांचो लाईची (भाषा) की नई वर्णमाला और लिपि बना कर इसे विश्व जनजातीय भाषालिपियों में शुमार कर दिया है। लोसु की मेहनत से न केवल वांचो लाईची को लिपि मिली, बल्कि इसको इंटरनेशनल यूनिकोड स्टैंडर्ड में भी जगह मिल गई है। जनजातीय भाषा की लिपि की रचना किसी वैज्ञानिक आविष्कार से कम नही है। अब वांचो लाईची भाषा को अपनी एक स्वतंत्र लिपी मिल जाने से विश्व भाषा संग्रह में स्थान मिल गया है। अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी भाग में वांचो लाईची एक तिब्बती-बर्मी भाषा के रूप में बोली जाती है। इसके अलावा यह भाषा म्यांमार, नगालैंड और असम के कुछ भागों में भी थोड़ी-थोड़ी भिन्नता के साथ बोली जाती है। स्कूली वक्त में पनपी लोसु की जिद ने एक भाषा को मरने से बचाने में अहम भूमिका निभाई है।

उच्च और निम्न स्वर से बदलते अर्थ

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इस जनजातीय भाषा में उच्चारण के उच्च और निम्न स्वर के आधार पर शब्द का अलग-अलग अर्थ निकलता है। जैसे माई शब्द का उच्चारण उच्च और निम्न स्वर में करने से इसका अलग-अलग अर्थ निकलता है। अगर आप माई शब्द को जल्दी बोलोगे तो इसका अर्थ ‘अच्छा’ होता है। अगर माई के ‘ई’ को थोड़ा जोर से बोला जाता है तो इसका अर्थ ‘पंूछ’ होता है। अगर इस पर और ज्यादा जोर देकर बोलते हैं तो इसका अर्थ ‘मांस’ होता है। इसलिए इस जनजाती भाषा में किसी अक्षर या शब्द का अर्थ उसके उच्चारण करने के तरीके पर निर्भर करता है। इस वजह से जनजातीय भाषाओ में स्वर (वोवेल) अपेक्षाकृत ज्यादा होते है। उच्चारणीय भिन्नताओं ने 2001 में 17 वर्षीय स्कूली छात्र लोसु को परेशानी में डाल दिया। वह अपने वांचो जनजाति समुदाय के सामाजिक-आर्थिक जीवन पर दिए गए एक प्रोजेक्ट का इंग्लिश से वांचो भाष में अनुवाद करने की कोशिश कर रहा था। क्योंकि वांचो भाषा को रोमन लिपी में लिखा जाता रहा है जो बहुत कठिन होता है। इस प्रकार लोसु के स्कूली दिनों का एक अनुवाद-प्रोजेक्ट दो दशक की लंबी यात्रा के बाद हकीकत मे बदलते हुए वांचो भाषा की लिपी के तौर पर विकसित हुआ। इस भाषा को अकेले लोंगडिंग जिले में 55000 लोग बोलते हैं। लिपि विकास प्रक्रिया की यह दो दशक की लंबी यात्रा अगस्त माह के दूसरे सप्ताह में समाप्त हुई जब इंटरनेशनल यूनिकोड स्टैंडर्ड में वांचो - भाषा की यूनिकोड प्रकाशित हुई। सामान्य तौर पर यूनिकोड का अर्थ यह हुआ कि अब वांचो - भाषा को एक डिजिटल आइडैनटिटि (अंकीय पहचान) प्राप्त हो गई और जिससे दुनिया भर में अब यह भाषा कम्प्यूटर पर टाइप हो सकेगी। वांचो - भाषा की लिपि को यूनिकोड का दर्जा मिलने की खबर पुणे में पढ़ाई कर रहे बंवंग लोसु को अगस्त के प्रथम सप्ताह में मिली। लोसु इसी साल जुलाई से पुणे के प्रतिष्ठित डेक्कन कॉलेज में भाषा विज्ञान की पढ़ाई कर रहे हैं।


2017 में भेजा था इंटरनेशनल यूनिकोड स्टैंडर्ड

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लोसु और वांचो सांस्कृतिक समाज और छात्र संघ ने 2017 में वांचो - भाषा की लिपि को इंटरनेशनल यूनिकोड स्टैंडर्ड को भेजा था। लोसु ने बताया कि जब मुझे इस बात का समाचार मिला तो मैं अति आनंदित हो गया। क्योंकि यह मेरे जीवन-भर का सपना रहा है। वांचो लिपि में 44 अक्षर हैं। जिनमें 15 स्वर और 29 व्यंजन हैं। बंवंग लोसु ने 2001 में लोंगडिंग जिला उच्च माध्यमिक स्कूल से 12 क्लास पास की थी। इसी समय से लोसु ने अपने भाषा ज्ञान के आधार पर वांचो भाषा के सभी शब्दों और उनकी आवाज को इक_ा करना शुरू कर दिया था। इसके अलावा लोसु ने गांव के बड़े-बुजुर्ग लोगों से भी कई बार भाषा के ज्ञान के बारे में विचार-विमर्श किया। लोसु ने बताया कि हमारी भाषा मौखिक लोककथाओं और कहानियों की है। कुछ शब्द अंग्रेजी और हिन्दी से मिलते-जुलते हैं और कई सारे दूसरे शब्द बहुत ही विलक्षण हैं। कई सालों के शोध के बाद 2012 में लोसु ने अक्षरों की एक सूची तैयार की, एक पेपर पर प्रिंट लिया और अपने दोस्तों को दिखाया। हर कोई इससे प्रभावित हुआ। वांचो सांस्कृतिक समाज और वांचो विद्यार्थी संघ ने लोसु के इस काम को एक प्रोजेक्ट के तौर पर लिया। लोग आगे आए और कई और शब्दों को जुड़ाते गए। इसके लिए कई जगहों पर जागरुकता कार्यशाला भी आयोजित की गईं। 2013 में लोसु ने वांचो लिपि पर एक किताब प्रकाशित की थी। हालांकि वो रोमन लिपि में थी, लेकिन मूल रूप से वांचो लिपि पर यह पहली किताब थी। पिछले 2 सालों से वांचो भाषा को अरुणाचल प्रदेश की कई सरकारी विद्यालयों में एक विषय के तौर पर पढ़ाया जा रहा है। लोसु कहते हैं कि मैंने बिना किसी भाषाविज्ञान के ज्ञान के ये सब किया। स्कूल के दिनों में मैं एक पायलट बनना चाहता था। लेकिन जिंदगी ने मुझे कही और ले आई। 2004-2005 के दौरान, जब लोसु इटानगर स्थित राजीव गांधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय में अग्रेजी विषय में एमए कर रहे थे, उस समय उसको विश्वविद्यालय पुस्तकालय में भाषाविज्ञान और फोनेटिक्स पर एक किताब मिली। लोसु अपनी आपबीती को बताते हुए क़हते हैं कि यह पहली बार था जब मैं भाषा कि तकनीकियों के बारे में पढ़ रहा था। मैं इसमें इतना खो गया कि विश्वविद्यालय से बाहर हो गया और फिर मैंने वांचो लिपि के विकास पर पूरे समय के लिए काम करना शुरू कर दिया।

जरूरी है जनजातीय भाषाएं बचाना

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जनजातीय भाषाएं उत्पति के आधार पर पुरानी और स्वभाव से प्राकृतिक होती हैं। बाहरी भाषाओं से बहुत ही कम संपर्क में होने से मौलिक, प्राकृतिक और शुद्ध होती हैं। इसीलिए भाषा के वर्णमाला की रचना करना बहुत मुश्किल होता है। जनजातीय भाषाओं का प्रचलन मौखिक बोलचाल और स्मृतियों के रूप में होता है। जनजातीय भाषा तब तक ही जिंदा रहती हैं जब तक इसको बोलने वाले हैं। भारत में हर साल बोलियां मर जाती हैं। क्योंकि इनको बोलने वाले नहीं रहते और इनकी लिपि भी नहीं होती। लिपि होने पर भाषा मरती नही है। वर्ष 2017 में अंडमान निकोबार में बोली जाने वाली ‘बो’ भाषा खत्म हो गई क्योंकि इसको बोलने वाली आखरी बो महिला मर गई। पूर्वोत्तर में करीब 250 से अधिक जनजातीय भाषाएं हैं, लेकिन इनमें से करीब एक दर्जन भाषाएं ही लिपिबद्ध हैं। भाषा की लिपि से उस समुदाय की न केवल भाषा बल्कि उसके इतिहास, साहित्य और संस्कृति की जड़ें, विकास और समृद्धि का पता चलता है। अब लिपि के हो जाने से वांचो समुदाय के इतिहास और साहित्य के बारे में कई जानकारियां सामने आएंगी। वांचो भाषा की लिपि और यूनिकोड बन जाने से पूर्वोत्तर राज्यों की सैकड़ों जनजातीय भाषाओं की लिपियों के विकास के प्रयासों को प्रोत्साहन मिलेगा।

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