एनआरसी से अनिश्चय के भंवर में फंसे तीन हजार शरणार्थी

एनआरसी से अनिश्चय के भंवर में फंसे तीन हजार शरणार्थी
image

| Publish: Aug, 02 2018 05:24:11 PM (IST) | Updated: Aug, 02 2018 05:24:12 PM (IST) Guwahati, Assam, India

इन्हें सरकार ने यहां बसाया था। पिछले पांच दशकों तक शांतिपूर्ण तरीके से यहां रहने के बाद इन्हें अंतिम प्रारूप एनआरसी में जगह नहीं मिली।

(राजीव कुमार की रिपोर्ट)
गुवाहाटी। पांच दशक पहले धार्मिक उत्पीड़न के चलते पूर्वी पाकिस्तान से असम आए लगभग तीन हजार शरणार्थियों के नाम राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) के अंतिम प्रारूप में नहीं हैं। फिलहाल ये कामरूप जिले के बनगांव में रह रहे हैं। इन्हें सरकार ने यहां बसाया था। पिछले पांच दशकों तक शांतिपूर्ण तरीके से यहां रहने के बाद इन्हें अंतिम प्रारूप एनआरसी में जगह नहीं मिली।

 

सरकार ने जमीन दी लेकिन एनआरसी में नाम नहीं


अपने इस सफर के बारे में बात करते हुए चौधुरीपाड़ा के रासेंद्र हाजोंग (59) कहते हैं कि वे 1964 में अविभाजित असम में पूर्वी पाकिस्तान के सिलहट से अपनी दादी के साथ आए थे। हम अभी के राज्य मेघालय के तुरा से प्रवेश कर असम आए थे। ग्वालपाड़ा के माटिया में सरकार ने शरणार्थियों को बसाया था। कुछ सालों बाद हमें कामरूप के बामुनीगांव स्थित पारमानेंट लाइबिलीट होम में भेज दिया गया। बाद में पुर्नवास योजना के तहत सरकार ने शरणार्थियों को जमीन आवंटित की। हाजोंग कहते हैं कि हम दशकों से मतदान कर रहे हैं। हमारे पास सरकार द्वारा दी गई जमीन है, लेकिन पहले एनआरसी के प्रारूप और अंतिम एनआरसी प्रारूप में हमारा नाम न देखकर हमें हैरत हुई। हमने कभी अपने को बाहरी नहीं समझा। इन मामले पर कामरूप के जिला उपायुक्त कमल वैश्य का कहना था कि यदि वे 1971 के पहले आने के कागजात हमें दे सकें, तो उनके नाम एनआरसी में शामिल होंगे।

 

कागजात कर दिए खारिज


एक अन्य शरणार्थी अनिल चंद्र चंदा ने कहा कि उनके पास शरणार्थी प्रमाण पत्र है, जिसमें छह लोगों के 1967 में आने का उल्लेख है। अन्य लोगों की तरह ही चंदा को शिलचर के चंद्रनाथपुर से लाकर यहां के पारमानेंट लाइबिलीट होम में रखा गया था। सरकार प्रायोजित पुनर्वास कार्यक्रम के बाद भी हमारी स्थिति अनिश्चय से भरी रही। हमने जरूरी कागजात एनआरसी के लिए दिए, लेकिन वे अधिकारियों को स्वीकार्य नहीं हुए। चंदा कहते हैं कि शरणार्थी प्रमाण पत्र एनआरसी में नाम शामिल करने के लिए पर्याप्त नहीं है, तो क्या हम बिना राज्य के हो जाएंगे। मालूम हो कि एनआरसी के लिए कट ऑफ ईयर 24 मार्च 1971 है। यहां रहनेवाले शरणार्थी इसके पहले आए हैं। उपायुक्त वैश्य कहते हैं कि शरणार्थियों को चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। वे दावे और शिकायतें दर्ज करा पाएंगे, लेकिन इलाके में रहनेवाले युवा मतदाता सुभाष बर्मन का कहना है कि अधिकारी पुराना रिकार्ड ही बजा रहे हैं। इनका रटा-रटाया जवाब है कि चिंता मत करिए।

खबरें और लेख पढ़ने का आपका अनुभव बेहतर हो और आप तक आपकी पसंद का कंटेंट पहुंचे , यह सुनिश्चित करने के लिए हम अपनी वेबसाइट में कूकीज (Cookies) का इस्तेमाल करते हैं। हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति (Privacy Policy ) और कूकीज नीति (Cookies Policy ) से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned