ग्वालियर में मिलावट का दाग

ग्वालियर में मिलावट का दाग
ग्वालियर में इस तरह खतरनाक स्तर पर खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता मिलावटी मिल रही है। पत्रिका फोटो,ग्वालियर के गणेश जनरल स्टोर पर मिलावट उजागर करने के लिए मारे गए छापे के तमाशबीन। पत्रिका फोटो ,ग्वालियर में इस तरह खतरनाक स्तर पर खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता मिलावटी मिल रही है। पत्रिका फोटो,ग्वालियर में इस तरह खतरनाक स्तर पर खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता मिलावटी मिल रही है। पत्रिका फोटो

Hari Om Panjwani | Updated: 12 Oct 2019, 01:39:59 AM (IST) gwalior

मिलावट का धंधा करने वालों ने ग्वालियर का दामन दागदार कर दिया है। प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश में इस अंचल के कई क्षेत्र मिलावटी दूध, मावा और पनीर बनाने के लिए बदनाम हो चुके हैं। मिलावट के मामले सामने आने पर जब शोर मचा तब जिम्मेदारों की नींद खुली, फिर भी कोई बड़ी कार्रवाई करने तब तक नहीं निकले जब तक कि प्रशासनिक दबाव नहीं आया।

प्रसंगवश. ग्वालियर. मिलावट का धंधा करने वालों ने ग्वालियर का दामन दागदार कर दिया है। प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश में इस अंचल के कई क्षेत्र मिलावटी दूध, मावा और पनीर बनाने के लिए बदनाम हो चुके हैं। मिलावट के मामले सामने आने पर जब शोर मचा तब जिम्मेदारों की नींद खुली, फिर भी कोई बड़ी कार्रवाई करने तब तक नहीं निकले जब तक कि प्रशासनिक दबाव नहीं आया। दरअसल, इसी प्रशासनिक सुस्ती ने ग्वालियर अंचल को मिलावट का गढ़ बना दिया है।

अव्वल तो कोई जांच और कार्रवाई करने नहीं निकला, यदि जांच हुई भी तो सैंपल की रिपोर्ट आने में वर्षों गुजर गए। सैंपल फेल हो गया तो भी मामूली सा जुर्माना देकर बच निकले। मिलावट के जिस धंधे में लाखों की कमाई है, उसमें मामूली सा जुर्माना देने से उनको कोई फर्क नहीं पड़ा। अब हालात पूरी तरह बिगड़ चुके हैं। पिछले वर्षों के मुकाबले इस वर्ष मिलावट को लेकर दो गुना सैंपल लिए गए हैं।

आंकड़े भयावह हैं, वर्ष 2016 से 2018 तक मात्र 180 सैंपल लिए गए थे, जो इस साल 358 हो चुके हैं। मिलावट किस तेजी से बढ़ी है, इसका अंदाजा आंकड़ों को देखकर लगाया जा सकता है। अभी सख्ती दिखाई दे रही है, परंतु मिलावट थमने का नाम नहीं ले रही है। इसकी पहली वजह तो नियमित जांच और कार्रवाई नहीं होना है। जिनकी जिम्मेदारी है वो अपनी वार्षिक खानापूर्ति के लिए निर्धारित सैंपल लेकर फुर्सत हो जाते हैं। दूसरी वजह सैंपल की रिपोर्ट आने में देरी है। हाल में जिस तरह की तेजी दिखाई उससे रिपोर्ट तो आने लगी, लेकिन जांच के लिए प्रदेश में एक ही लैबोरेटरी होने से 358 सैंपल की रिपोर्ट आने में कुछ साल लग जाएंगे।

यदि मिलावट को रोकना है तो ग्वालियर में ही लैबोरेटरी बनाना जरूरी है। वैसे भी सिर्फ ग्वालियर में साढ़े चार लाख लीटर दूध की खपत रोज हो रही है, जबकि उत्पादन आधे से भी कम दो लाख दस हजार लीटर है। मान लें कि इसमें पैकेज्ड दूध की खपत भी शामिल है, पर इतना तो स्पष्ट है कि सिंथेटिक दूध की आपूर्ति अभी हो रही है। अब सबसे बड़ा संकट मिलावट के इस धंधे को बंद कराकर इस कलंक को धोने का है। इसके लिए जरूरी है कि संबंधित सरकारी विभाग और उनके अधिकारी जिम्मेदारी को समझें और पूरी जवाबदेही के साथ मिलावट रोकने की मुहिम को आगे बढ़ाएं।

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